Showing posts with label दिल के कोने से. Show all posts
Showing posts with label दिल के कोने से. Show all posts

Mar 24, 2016

The marriage we don't talk about ..




Marriages are an imperative part of the Indian society: Socially and psychologically. Socially because every single person wants to achieve a well thought-of social status and automatically it becomes the reason for psychological importance of marriage. It is natural for us to congratulate and give our best wishes for the future when we come to know that someone is about to get married. But will we do the same or react in a similar fashion if the couple getting married is of the same sex? Most of us will definitely react negatively or at least we would be hesitant in passing our blessings to such a couple. In a country like India where marriages are the legal and social license to have sex, the reservations about same sex marriages have to do more about two individuals indulging in a physical relationship with the person of the same gender than the idea of marriage itself. The idea of being homosexual offends majority of the people because of the long held notion of it being immoral and evil which is the result of the age-old dogmas to which the individuals still subscribe to. Even in heterosexual marriages the topic of sex remains a taboo and as a society we don’t acknowledge it. When such rigidity is displayed in the case of socially approved heterosexual marriages then such taboo marriages will hardly find any approval.

Another argument apart from homosexuality being unnatural is that of conceiving a child in the case of same-sex marriages. For the Indian society conception of a child is not about choice but it is a duty for the married couple to procreate so naturally same sex couples are incapable of it by themselves; even though surrogacy and child adoption can be used to overcome this hurdle.

Section 377 of the Indian Penal Code, a remnant of the colonial era, states that sexual intercourse against the order of the nature is a punishable offence. Even though same-sex relationships have been found to be fairly common in the animal kingdom therefore it should be deemed natural and not unnatural because it goes against our societal or religious views. During the 2000s in some parts of America and Europe the civil movement for legalizing the same sex marriage got significant recognition. Now around 23 countries in the world including the United States of America have legalized same sex marriages.

The self-proclaimed saints and the saviors of the Indian culture are another force who continuously try to derail the processes of social acceptance of same-sex couples. Baba-Ramdev called homosexuality a disease which he assures can be cured with the help of Yoga. The biggest irony here being that even though these the proponents of religion and culture yet they seem to be as ignorant about it as anybody else. As per Hindu mythology, in Shiva Purana the union of Shiva and Mohini results in parturition of Hanumana. In another tale, Aravana the son of Arjun and Ulupi, the Naga princess, has to sacrifice himself in the battle of Kurukshetra for the victory of Pandavas but the only wish he had was that he didn’t want to die unmarried. Shri Krishna then transubstantiates himself into Mohini for one day and even spends the night with Aravana as his wife and the next day even observes the customs of mourning which are expected of a widow when Aravana dies. In the Southern Indian region, the Villagers perform the eighteen day epic kurukshetra and on the last day mourn the death of Aravana like his widows. Transgender form a bulk of these mourners. There are ample of tales and stories which give enough grounds to the fact that same sex marriages have been a part of the Hindu mythology. Similar disapproval can also be found among the religious leaders and the clerics of almost every religion. They do not agree on any single point in the name of religion but they all tend to agree against homosexuality calling it a malady that needs to be deracinated.

The big question remains that how can a mere orientation of affection towards a particular sex appear to be wrong in the eyes of the religion and the law? The constitution of India provides for one’s personal liberty and freedom and ensures that no one is able to deprive an Indian citizen of this fundamental right. The state cannot discriminate anyone on the grounds of religion, sex, race, cast, color, creed or place of birth.  According to the data provided by the Ministry of Health to the Supreme Court in 2012, our population includes 2.5 million homosexuals. So as per the concept of fundamental rights, homosexuals also have an equal liberty lo live life as they want and with whomever they want. Few years back, Delhi High court decriminalized the section 377 that Supreme Court unturned.  Now one of the most marginalized and abused section of our society is hoping to breathe free through gaining social acceptance and recognition. They are asking for nothing more, than to stop discriminating against them on the grounds of sexual orientation.

We definitely need to extend this recognition and acceptance after all the broader the perspective the better will be the growth of mental health of the nation. 


Mar 13, 2016

जवाब

समाज के सवाल हमेशा से एक जैसे थे .. आज की लड़की का जवाब कुछ बदल गया है 

पहले पड़ता था फर्क तुम्हारे कहने से, अब आज़ादी में सांस लेना तुमसे ज्यादा ज़रूरी है. कभी चाहिए था तुम्हारा हाथ सहारे के लिए अब कहो तो हाथ बढ़ा सकती हूँ सहारा देने के लिए. कभी खुलकर हँसना भी था गुनाह तुम्हारी नज़र मे, आज हँसाने का माद्दा रखती हूँ . कभी चाही थी तुमने अग्निपरीक्षा हर एक कदम पर, आज तुमसे सवाल कर पाने की ताकत रखती हूँ.
तुम कहते हो बंधन हमारी सुरक्षा हैं लेकिन क्या कहोगे जब घर में ही बेआबरू होते हैं हम. मेरी जिंदगी के फ़ैसले लेने का हक एक आदमी को देना कैसे जायज़ लगा तुम्हें? शादी न करने की ज़िद पर तुम सब मिलकर मुझे ताने मारते हो और कहते हो कि शादी करने का फ़ैसला मेरा था. अरे फ़ैसला करने का हक था ही कब.. ये सब तुम्हारे नियम हैं जो तुम्हारी सहूलियत के हिसाब से बदल जाया करते हैं. जानते हो एक अच्छी बात क्या है, मैंने तुम्हारी सुनना ही बंद कर दिया है. मेरा दिल अगर कहेगा सही तो वो सही और कहेगा ग़लत तो मेरे क़दम ज़रूर रुक जायेंगे. तुमसे पूछना तो कबका छोड़ दिया मैंने लेकिन बताना भी अब छोड़ रही हूँ. तुमने कहा था कि मुझे दुनियाँदारी की समझ कहाँ, सच कहूँ तो समझ तुम्हें नहीं जो मुझे समझ नहीं पाए. समझ पाते तो यूँ आज मुंह की न खाते. तुम्हारे ही बनाये नियमों में उलझाकर आज एक कोने में समेट न दिए जाते. मुझसे उम्मीद बेमानी है कि मैं वापस आउंगी तुम्हारे हिसाब से जीने. मेरी उडान को रोक पाना तुम्हारे अहं के बस की बात नहीं. लाख़ बुराइयाँ पैदा कर लो अपने अन्दर, लड़ने के लिए मैं पहले से अधिक उत्साहित हूँ. कितना एसिड फेंकोगे, मेरी त्वचा जला सकते हो मेरा द्रढ़ निश्चय नहीं. मेरी इज्ज़त का मखौल बनाना अच्छा लगता है तुम्हें लेकिन तब क्या जब मेरे काम करने की लगन उसे भी परास्त कर दे.

एक अंतिम बार कुछ बताती हूँ तुम्हें, इत्मिनान से सुनो..  हूँ मैं एक नए ख़यालात वाली लड़की लेकिन बिंदी लगाना मुझे बहुत पसंद है. इसलिए नहीं कि मुझे लगानी चाहिए इसलिए क्यूंकि ये मेरे माथे पर अच्छी लगती है. हूँ तो मैं कामकाज़ी लड़की लेकिन चूड़ी पहनना मुझे बहुत पसंद है.. इसलिए नहीं कि हाथ खाली अच्छे नहीं लगते बल्कि इनकी खनक मेरे कानों को भाती है. हूँ तो मैं अपने मन के कपडे पहनने वाली लड़की पर पायल पहनना मुझे बहुत पसंद है.. आप कहेंगे ऐसे कपड़ों पर पायल ? ये मेरा तरीका है अपने पैरों को सजाने का न कि पांव की बेड़ी बनाने का. गहने मुझे वही चाहिए जो मेरे साथी होने का एहसास दिलाते हों न कि किसी दूसरे को घर की इज्ज़त दिखाने भर के लिए एक भार.. हूँ तो मैं इस समाज की एक आम लड़की लेकिन जिंदगी जीने अंदाज़ मेरा अपना है. मेरे सपने मेरा हौसला हैं और मेरी मुस्कराहट मेरी हिम्मत. आगे बढ़ना मेरी नियति और नए लोगों का आना और पुराने लोगों का जाना मेरी किस्मत. आज की लड़की ऐसी ही है. साहसी, सपने देखने और और उनको पूरा करने का दम रखने वाली और समाज की पुरानी बेड़ियों को जड़ से तोड़ कर फेंक देने वाली लेकिन दिल में उतना ही प्यार और समर्पण लिए अपनों के लिए जीने वाली. हमारा क़ायदा सिर्फ एक बात जानता है .. जिंदगी को अपने हिसाब से जीना और अपने देखे हर ख़्वाब को मंज़िल देना. अरे हाँ .. वक़्त बदल गया है, बेहतर है तुम भी बदल जाओ कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी ज़रुरत ही ख़तम हो जाये. हमेशा हमेशा के लिए. 

    

Jan 12, 2016

जद्दोजहद

नौकरी करते करते  2 साल गुज़र गए. उम्र यही कोई सिर्फ 25 साल की है. सब कुछ तो है मेरे पास.. मैं तो खुश हूँ. सच मैं हूँ?
नहीं.. बिलकुल नहीं. अक्सर जब अपने कमरे पर अकेले बैठकर अपनी जिंदगी के बारे में सोचती हूँ तो लगता है कि ये वो जिंदगी बिलकुल नहीं है जो मैंने खुद के लिए कभी सोची थी. सुबह खुद के लिए खाना बनाकर कॉलेज जाना, बच्चों को पढ़ाना और शाम को आकर फिर से घर के काम करने के बाद पढना और लिखना. रविवार इसी ऊहापोह में बीत जाता है कि घर के पचास काम निपटाने हैं और अगले हफ़्ते के लिए कपडे धुलकर रखने हैं. ये सब तो लड़कियों की जिंदगी में अक्सर शादी के बाद हुआ करता है. मैं तो अभी अकेली हूँ. कोई कहने सुनने वाला भी नहीं. दूर से देखने वाले लोग भी कहते हैं.. राधिका ने भी क्या जिंदगी पाई है. कॉलेज ख़तम होते ही नौकरी. पीएचडी चल ही रही है. दो साल में नाम के आगे डॉक्टर लग जायेगा, कोई ज़िम्मेदारी भी नहीं. बस और क्या चाहिए. पर क्या वाकई? यही जिंदगी है? पढाई, अच्छी नौकरी, शादी के सपने.. बस? दिल कहता है सब छोड़ कर कहीं निकल जाऊं कुछ दिन लेकिन फिर दिमाग कहता है नौकरी छोड़ कर जोश में जाने से कुछ नहीं होगा. धीरे धीरे प्लान करके सोच कर आगे बढ़ते हैं. लेकिन वही ढाक के तीन पात. दिन निकलते जाते हैं और कुछ “अलग” जो करना चाहती हूँ सिर्फ ख़्वाब में करके रह जाती हूँ. दिमाग हमेशा जीत जाता है. अक्सर ऐसा उन सभी लोगों के साथ होता है जिनको जिंदगी से कुछ अलग चाहिए. 

मुझे ये सही से नहीं पता कि मुझे क्या चाहिए बस कुछ अलग चाहिए.कभी समाज सेवा, कभी माउंट एवेरेस्ट चढ़ने का ख़्वाब, उस हॉलीवुड पिक्चर वाइल्ड की हीरोइन की तरह अकेले ट्रेकिंग पर जाने का सपना, कभी छत पर कान में ईयरफोन लगा कर गाने सुनते हुए उसी गाने पर एक बड़ी सी स्टेज पर हजारों लोगों के सामने खुद को दिल खोल कर नाचते देखने की चाहत, कभी किसी फ़िल्म में एक्टिंग करने के बारे में सोचना और सबसे बेहतरीन, दुनियां देखने के लिए अकेले निकल जाना. पता नहीं कितने वक़्त के लिए. इनमे से होता कुछ भी नहीं बस होते हैं दुनियां से अलग जाने के अरमान.
न बॉयफ्रेंड, न पति , न पैसा, न रुतबा, न लोग.. कुछ नहीं चाहिए मुझे. बस खुद के अन्दर बैठे उस इन्सान को ख़ुशी से नाचते हुए देखना चाहती हूँ. पर समस्या है कहाँ? मैं कुछ भी करने से डर क्यूँ रही हूँ. पहले तो कभी नहीं डरी. समय से पहले बड़ी हो गयी हूँ शायद. जोख़िम उठाने को हर वक़्त तैयार रहने वाला हिसाब तो बच्चों जैसी बुद्धि वालों का होता है. साफ़ भाषा में उन्हें गधा या बेवकूफ़ कहते हैं. जब ऐसे लोग कभी-कभी जब रिस्क उठाकर आगे बढ़ते हैं लोग तो दो तरह की चीज़ें होती हैं या तो वो कुछ हासिल कर जाते हैं या फिर उस गुमनामी में गुम होकर वापस उसी जिंदगी में लौट आते हैं और लौटने के बाद लोग उसका जीना मुश्किल कर देते हैं. कहेंगे बेवकूफी कर दी. एक बार सलाह ले लेता.
अब मैं क्या करना पसंद करुँगी. डर लगता है जब सोचती हूँ कि इस सधी हुई जिंदगी से दूर  भागकर आखिर मैं क्या हासिल करना चाहती हूँ. कदम रुक जाते हैं. लेकिन फिर मेरे अन्दर की राधिका कहती है कि मत करो ऐसा. कम से कम तुम तो उन लोगों में शुमार नहीं हो सकतीं जो मजबूरियों में जिंदगी बिता देते हैं. तुम्हारे पास परिवार है जो हर तरह से तुम्हारे साथ है, भरोसा करता है, तुम पर भी और तुम्हारे सपनों पर भी. फिर किस बात का डर है. भिड़ जाओ इस जिंदगी से. लड़ लो अपने देखे सपनों के लिए. कदम आगे बढ़ते हैं पता नहीं क्यूँ फिर रुक जाते हैं. दुनियां की बातें सुनने से डरती हूँ शायद.
लेकिन क्यूँ राधिका, फिर मेरे अन्दर की राधिका जवाब देती है: जब आज तक दुनियां की परवाह नहीं की तो अब क्यूँ. तुम्हें याद है जब कॉलेज में तुम्हारे अफेयर के किस्से आम बात हुआ करते थे जिनके बारे में तुम्हें खुद नहीं पता था. लेकिन तब भी तुम लड़ गयीं थीं, तब तुम नहीं हारी, पढ़ती रहीं.. आगे बढती रहीं तुम ... वही लोग तुमसे मदद मागने आने लगे जो कभी हँसा करते थे तुम पर.. तो फिर दुनियां का इतना डर अब क्यूँ ? अब क्यूँ राधिका अब क्यूँ.
लोग बोलते रहेंगे बोलने दो. एक बात याद रखना तुम , तुम्हें बड़ी जिंदगी जीनी है, लम्बी नहीं. इस बार अगर तुमने अपने क़दमों को आगे नहीं बढ़ने दिया तो फिर तुम कभी नहीं कर पाओगी. राधिका कोई तुम्हें पसंद करे न करे, कोई तुम्हें चाहे न चाहे, कोई तुम्हारी जीत के लिए खुश हो न हो, ये तुम्हारे अन्दर बैठी राधिका तुमसे बेपनाह मोहब्बत करती है, तुम्हारे सपनों में जीती है, आगे बढ़ो राधिका.. इस बार रुकना नहीं.
मैं खुश हूँ अब. मैंने अपनी रूममेट से कह दिया है कि कोई और रूममेट ढूढ़ लो. मैं तो चली.. कहाँ ? जिंदगी जीने. नौकरी छोड़कर? हाँ . उसने कहा, “तुमसे न हो पाई है”.
अनसुना कर दिया मैंने.
सब सोच लिया है मैंने . कल जाकर रिज़ाइन करुँगी और फिर पैकिंग. कॉलेज में सब पूछेंगे तो कह दूंगी कि कुछ पर्सनल रीज़न है. सबको क्यूँ बताऊँ कि क्या करने जा रही हूँ. जो सोचना है सोचते रहें.  अभी सामान ज्यादा नहीं ले जाना है. अलमारी अभी दोस्त के यहाँ रख दूंगी. वाटर कूलर छोड़ दूंगी, क्या करुँगी ले ज़ाकर. कूलर यहीं किसी को बेच दूंगी. अपने कमाए पैसों से ख़रीदी टीवी को घर छोड़ दूंगी. बाकी कुछ ऐसा है नहीं. हो जायेगा सब.
मैं अब बिस्तर पर पड़ी नींद के आने के इंतज़ार में हूँ. कल्पना में डूबी हूँ. कल के बाद मेरी जिंदगी बदलने वाली है. सुबह के चार बज गए. आँखों में नींद ही नहीं है. कूलर भी इतना आवाज़ कर रहा कि नींद आएगी कैसे. चेहरे पर एक मुस्कराहट आ गयी. पागल है तू भी.
सुबह के आठ बजे नींद खुली. टिफ़िन पैक करके कॉलेज के लिए निकली. पर ये हुआ क्या है मुझे? वो रात वाली बात क्यूँ नहीं है. अपनी पापा की दी हुई स्कूटी पर भी सोचती रही.. क्या सही कर रही हूँ मैं? कुछ न कर पायी तो? क्या करूँ? करूँ या न करूँ? कॉलेज में स्कूटी स्टैंड पर लगा कर हेलमेट और ग्लव्स उतारते वक़्त दिल कुछ बोला ही नहीं. सर को सामने देखा. गुड मोंर्निंग किया और चली आई स्टाफ रूम में. सामान रखते हुए मेरी रूममेट की बात दिमाग में घूमने लगी. “तुमसे न हो पाई है”
ग्यारहवीं बार 11 बज गए. चलूँ अब.. क्लास लेनी है.


Jul 26, 2015

मदद की एक अपील.. आपसे

एक अपील , आपसे .. जी हाँ आपसे ही. अपील वो नहीं जो आप सोच रहे हैं.. वही घर, वही परिवार की बंदिशें, वही पुराने प्यार का दर्द और आने वाले जीवनसाथी की चाह में बुनी हुई चुनरी की ख्वाहिशें.. वो सब नहीं.. बिलकुल नहीं.
अपील एक लड़की की जिसने अभी अपने पंख सिर्फ फड़फड़ाए हैं, उड़ान नहीं भरी. उससे पहले सोचा आपसे मदद की अपील करूँ. केवल कुछ मिनट का वक़्त देकर मुझे पढ़ लीजिये.

बात कुछ यूँ है कि मुझे डर लगना शुरू हो गया है. बहुत डर जाती हूँ. अक्सर इस डर की वजह से ना घर से बाहर निकलती हूँ ना ही दोस्त बनाती हूँ. अजीब सा डर है. आगे बढ़ने की हिम्मत भी देता है और रास्ते का रोड़ा भी बन जाता है. हूँ तो एक आम लड़की लेकिन सपने बहुत बड़ा नाम कमाने के हैं. पता चला कि एक आम लड़की जब आगे बढ़ने के लिए कदम उठाती है तो ये समाज उसके चरित्र पर बिना काम के खाली बैठे और दूसरों की सफ़लता से शरीर की भीतरी कोशिकाओं तक जले भुने बैठे लोगों की दी हुई कीचड़ की मोटी मोटी गोलियां दागने को तैयार रहता है. समाज बनता किससे है? हम लोगों से ही. मज़ा आता है कहने वालों को भी और सुनने वालों को भी और इस बात को आग की तरह फैला देने का ज़िम्मा कन्धों पर उठाये लोगों को भी. अब किसी ने कुछ कहा है तो कुछ सच्चाई तो होगी ही.. भले ही उस सच्चाई को ठीक से देखा ही न गया हो या सिर्फ उतना देखा हो जितना अफ़वाह के बाज़ार में अपनी धाक बनाने के लिए ज़रूरी है. अब हूँ तो लड़की ही.. कितनी भी हिम्मत दिखाऊ पर कहीं न कहीं उस चोट के दर्द से टूट भी तो जाउंगी. मानसिक तनाव से भी गुज़रना पड़ेगा. हो सकता है कि रो रोकर कई रातें भी काली हों, हो सकता है कि काम करना ही बंद कर दूँ या हो सकता है कि इतनी बिगड़ जाऊं कि सम्हालने की स्थिति ही न बचे या फिर डर डर के जीने की आदत पड़ जाए. जब काम के सिलसिले में कहीं किसी से मिलने की बात हो तो दिल धक् धक् करे कि कहीं अभी ये उस अफवाहों के बाज़ार में मेरी इज्ज़त की नुमाइश देखने तो नहीं गया था ..किसी ने इससे कुछ कहा तो नहीं होगा? बस यहीं पर आगे बढ़ने के रास्ते में एक लेकिन और एक काश ने मेरा हाथ थाम लिया. “लेकिन” मुझे खुद को हर पल लोगों को सफ़ाई देने पर मजबूर करता है और “काश” उन लम्हों को कोसता है जब चेहरे पर मुस्कराहट और हाथ में खंजर लेकर बैठे लोगों से बात की.
कभी कभी ये डर हिम्मत बंधाता है. फिर लगता है कि मुझे फर्क नहीं पड़ता. लोगों का तो काम ही है बोलना. कुछ तो बोलेंगे ही लेकिन खुद से झूठ भी कैसे बोलूं. फ़र्क तो पड़ता है.. दिल तो दुखता ही है.. तकलीफ़ भी बहुत होती है पर आगे बढ़ने का जज़्बा फिर मुझे ले उठ खड़ा होता है. मैं फिर आगे बढ़ तो जाती हूँ लेकिन उसी डर के साथ कि कौन कब क्या बोल देगा मैं नहीं जानती. आगे बढ़ने के लिए लोगों से मिलना भी पड़ेगा. बड़ा नाम बनाने के लिए सामाजिक दायरा भी बड़ा करना पड़ेगा, और समस्या ये है कि मैं एक सीधी सी आम लड़की हूँ जिसको मुंह में गाली रखकर चलना भी नहीं आता और नाम भी कमाना है.
आप सभी लोगों से मदद तो चाहिए ही लेकिन एक सवाल है मेरा कि क्या आप किसी भी लड़की के बारे में ऐसी बातें सुनते वक़्त एक छोटा सा जवाब नहीं दे सकते कि पहले उससे मिल लो फिर मुझे बताना. किसी को बिना जाने समझे इस तरह की बात बोलना ठीक नहीं है वो भी हमारे जैसे देश में जहाँ लड़कियों का आगे बढ़ना कितना मुश्किल है. शादी की बेड़ियाँ बचपन से ही उसके पावों में होती हैं जो वक़्त के साथ उसके पावों को कसती जाती हैं और एक वक़्त वो आता है जब एक जगह रुक जाने के अलावा कुछ नहीं बचता.









मेरी बस थोड़ी मदद कीजिये. मैं आम हूँ, ख़ास भी बन जाउंगी, तब आपको मुझ पर ज़रूर गर्व होगा. लेकिन इस रास्ते को केवल उतना मुश्किल बनाइये जितना आपके परिवार की महिलाएं झेल सकें. मैं आगे बढ़ना तो नहीं छोड़ सकती लेकिन एक रिश्ते के नाते मदद माँग सकती हूँ, रिश्ता खून का नहीं, इंसानियत का. आगे बढूँ तो हिम्मत बढाइये, अगर ग़लती करूँ तो ज़रूर बताइए लेकिन उस ग़लती को अपनी जलन को निकालने का बहाना मत बनाइये. मेरी प्रेरणा वो लड़कियां ज़रूर हैं जो इन सब बातों से ऊपर उठ कर आगे निकलीं लेकिन क्या हर लड़की को दिल में कुछ काले दिन और दर्द लेकर ही आगे बढ़ना ज़रूरी है. नहीं न. मैं बस इतना चाहती हूँ कि जब मैं कभी अपना जिक्र करूँ तो आपके दिए घावों के बदले आपकी की हुई इस छोटी से मदद को याद करूँ.

पहली और आख़िरी अपील है आपसे. निराश मत करियेगा. मुझे समय देने के लिए धन्यवाद.  

Apr 5, 2015

नया हो अब जहाँ हमारा ..

बीबीसी पर औरतों से जुड़े कानूनों के बारे में एक खबर पढ़ी. आप भी एक नज़र डालिए.

दिल्ली में 2012 के निर्भया कांड के बाद दुनिया भर में भारत की थूथू हुई. लेकिन एक साल बाद ही कानून में एक नई धारा जोड़ी गई जिसके मुताबिक अगर पत्नी 15 साल से ज्यादा उम्र की है तो महिला के साथ उसके पति द्वारा यौनकर्म को बलात्कार नहीं माना जाएगा. सिंगापुर में यदि लड़की की उम्र 13 साल से ज्यादा है तो उसके साथ शादीशुदा संबंध में हुआ यौनकर्म बलात्कार नहीं माना जाता.

माल्टा और लेबनान में अगर लड़की को अगवा करने वाला उससे शादी कर लेता है तो उसका अपराध खारिज हो जाता है, यानि उस पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा. अगर शादी फैसला आने के बाद होती है तो तुरंत सजा माफ हो जाएगी. शर्त है कि तलाक पांच साल से पहले ना हो वरना सजा फिर से लागू हो सकती है. ऐसे कानून पहले कोस्टा रीका, इथियोपिया और पेरू जैसे देशों में भी होते थे जिन्हें पिछले दशकों में बदल दिया गया.

नाइजीरिया में अगर कोई पति अपनी पत्नी को उसकी 'गलती सुधारने' के लिए पीटता है तो इसमें कोई गैरकानूनी बात नहीं मानी जाती. पति की घरेलू हिंसा को वैसे ही माफ कर देते हैं जैसे माता पिता या स्कूल मास्टर बच्चों को सुधारने के लिए मारते पीटते हैं.

सऊदी अरब में महिलाओं का गाड़ी चलाना गैरकानूनी है. महिलाओं को सऊदी में ड्राइविंग लाइसेंस ही नहीं दिया जाता. दिसंबर में दो महिलाओं को गाड़ी चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया. इस घटना के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संस्थानों ने आवाज भी उठाई. मिस्र के कानून के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को किसी और मर्द के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखता है और गुस्से में उसका कत्ल कर देता है, तो इस हत्या को उतना बड़ा अपराध नहीं माना जाएगा. ऐसे पुरुष को हिरासत में लिया जा सकता है लेकिन हत्या के अपराध के लिए आमतौर पर होने वाली 20 साल तक के सश्रम कारावास की सजा नहीं दी जाती.

ये दुनियां कितनी भी बदल जाये लेकिन औरतों को लेकर सोच शायद ही कभी बदले. बलात्कार शब्द कह देना जितना आसान होता है उतना ही मुश्किल है उसे समझना. ज़्यादातर लोग बलात्कार को केवल शारीरिक संबध के तौर पर देखते हैं. यह केवल महिलाओं की वर्जिनिटी का हनन है. दुनिया के ऐसे सभी महाशयों से में सिर्फ इतना कहना चाहूंगी के मन की पीड़ा समझना आपके बस की बात नहीं. आपसे समझने की उम्मीद करना ही बेमानी है.

पति ग़लती सुधरने के लिए पीट सकता है, लेकिन ग़लती तो पुरुष भी करते हैं तो औरत क्या करे, लोगों के हिसाब से वो चुप रहकर अपने पत्नी धर्म का पालन करे और बात को जाने दे. न ही हम गाडी चलायें न ही अपने अपहरण करने वाले को सज़ा दें.

लोगों का तो काम ही है बातें करना लेकिन जब क़ानून इस तरह की बात करे तो इससे होने वाली व्यथा का अंदाज़ा लगाना इन कानून बनाने वालों के लिए मुश्किल है.


ये इसलिए नहीं है कि आप हम पर तरस खाएं, जी नहीं, बिलकुल नहीं. सिर्फ आपको बताने के लिए कि  यदि आप हमें हमारे हक़ से दूर रखना जानते हैं तो हमने भी अपना हक छीनना सीखा है और वो हम करेंगे भी. पढेंगे, नौकरी करेंगे, आर्थिक स्वतंत्रता हासिल करेंगे, स्वयं के निर्णय खुद लेंगे और अपने लिए ऐसी छत भी ज़रूर बनायेंगे जहाँ आपकी सड़ी-गली मानसिकता के कीड़े न पहुँच पायें. 


Aug 24, 2014

Loved it

It was really surprising to listen from a police man that " you please don't worry. It is not just my legal duty but the moral one also. Remind me tomorrow in my office timings. I'll definitely try my best to resolve your issue."
I wish I could hear it from every police man. 

Aug 23, 2014

Expressions

Expressions Part one :-


Sometimes words don't matter.. Just expressions...

Story to be continued.. 

Aug 22, 2014

मंजिल



            परिंदों को मिलेगी मंजिल एक दिन, ये फैले हुए उनके पर बोलते हैं..

            वही लोग रहते हैं ख़ामोश अक्सर , ज़माने में जिनके हुनर बोलते हैं..

Aug 21, 2014

अभी नहीं तो कभी नहीं..

हम सोचते रह जाते हैं कि फलां काम हम कल करेंगे, ये वाला काम हम उस दिन करेंगे, दोस्त से मिलने हम उसके जन्मदिन पर जायेंगे, पढाई २ घंटे बाद करेंगे, करियर बना लेंगे बस थोडा मस्ती कर लें, पर दोस्तों वक़्त वाकई हाथ में नहीं आता. आप अपने अगले पल के बारे में भी नहीं जानते होते और प्लानिंग सालों की कर लेते हैं. जो वक़्त अभी है सिर्फ वही है, जो गया वो वापस नहीं आएगा, और जो आने वाला है उसका कुछ पता नहीं कैसा आएगा. यही सही वक़्त है वो करने का जो आप हमेशा से करना चाहते हैं. चाहे वो पढाई हो, जॉब बदलनी हो, प्यार करना हो, कुछ हासिल करना हो, घूमना हो, कुछ भी हो.. बस कर डालिए. रिस्क लेने से डर कैसा, एक विज्ञापन ही कहता है कि डर के आगे जीत है.
एक जिंदगी है, दोबारा मिलने के बारे में पता भी नहीं.. तो सिर्फ सोचने में टाइम ख़राब न कीजिये, इस वक़्त का सही इस्तेमाल कर लीजिये. थोडा जी लिया जाए अब, और हाँ.. अभी नहीं तो कभी नहीं.

Aug 20, 2014

It was lovely to be with you

Another refreshing day.. I love meeting new people.. And sometime some people become important part of my life... When you live alone in a city, a homely environment can give you a kick.. I got mine today.. It was an awesome day.. Loved each and every second of it... 

Aug 18, 2014

एक कथा





एक मंदिर के पुजारी थे. भगवान के बड़े भक्त. सुबह 4 बजे से उठकर पूजा पाठ से ही उनका दिन शुरू होता था.. हर बड़े दिन पर वो मंदिर के लिए दान लेते और बड़े ही जतन से आयोजन करते. मंदिर सजाते, महाआरती करवाते, बड़े बड़े लाऊडस्पीकर लगवा कर अखंडरामायण का पाठ कराते, नवरात्रों में माता की चौकी सजाते और जगराता करवाते. पूरे नौ दिन माता की भेंटे चलती थीं. उनके लिए सिर्फ भगवान का नाम जपना और जपवाना ही सब कुछ था. एक दिन समय आने पर उनकी मृत्यु हो गयी. सबने शोक मनाया कि पुजारी जी स्वर्गवासी हो गए. स्वर्ग के द्वार पर जब वो पहुंचे तो चौकीदार ने उनसे टिकट माँगा. उन्होंने अकड़ कर कहा कैसा टिकट? चौकीदार ने कहा कि अन्दर जाने के लिए एक खास टिकट लगता है जो कि आपके पास है नहीं.. ऐसा लगता है आपको नरक में ही जगह दी गयी होगी. इतना सुनना था कि पुजारी जी भड़क गए. उनकी जिंदगी भर की तपस्या का ऐसा मजाक!! चौकीदार ने उन्हें शांत करते हुए कहा चलिए आपकी मैनेजर से बात करा देते हैं. पुजारी जी पीछे पीछे चले. एक मेज पर फाइलों का अम्बार लगा हुआ था और चश्मा लगाये एक व्यक्ति उन फाइलों को इस तरह से पढ़ रहा था जैसे बस उन्हें घोंट कर पी जायेगा.
पंडित जी ने उन्हें नमस्कार किया. चित्रगुप्त ने उन्हें ऊपर से नीचे देखा और चौकीदार से बोला.. इस साल के बण्डल में से २,३५,५६७ वीं फाइल निकालो, बैठिये बैठिये. पिछले साल आई बाढ़ ने साला काम बढ़ा दिया. वैसे ही रोज़ एक्सीडेंट , ख़ुदकुशी, बीमारियाँ, रोज़ रोज़ होने वाले मर्डर से कम लोग मर रहे थे जो ये मुई बाढ़ और आ गयी. अब तो हर हफ्ते होने वाले प्लेन क्रैश और ट्रेन एक्सीडेंट ने और जान खा रखी है. हर दूसरे दिन फाइलों का नया बण्डल खरीदना पड़ता है. मंहगाई किसी के लिए क्या हमे तो लगता है हमारे लिए आई है.. सरकार कुछ करती नहीं है और काम हमारा बढ़ जाता है. हाँ पुजारी जी.. आप अपनी समस्या बोलिए.
पुजारी जी : जी देखिये चित्रगुप्त जी .. बात ऐसी है कि मैंने अपने जीवन को सिर्फ पूजा पाठ , साधना आदि में लगाया.. कोई बुरी बात नहीं की, कभी किसी महिला को बुरी नज़र से नहीं देखा फिर मुझे नरक क्यों. जिन लोगों ने कभी भगवान की तरफ श्रद्धा की नज़र से भी नहीं देखा क्या, इतने कुकर्म किये , क्या अब मुझे उनके साथ रहना होगा ? कृपा करिए महाराज.. ऐसा अनर्थ आप कैसे कर सकते हैं ?
चित्रगुप्त : जी पुजारी जी , अब आप देखिये, हम तो ठहरे मैनेजर. जो हमारे बॉस यानि आपके भगवान जी ने कहा, हमने किया. अब आपने इतनी पूजा पाठ की है तो चलिए आपको बॉस से मिलवा देते हैं. वही आपको इसका उत्तर बताएँगे.
दोनों ने भगवान के धाम जाने के लिए प्रस्थान किया. पंडित जी रास्ते भर सोचते रहे कि जिन नारायण के गुण गा गाकर जिंदगी बितायी आज उनसे साक्षात्कार होगा. बस उनके चरणों की धूलि मिल जाये. भगवान का नाम जपते हुए जैसे ही वहां पहुंचे, पंडित जी चौंक गए.
पंडित जी : भगवन , आप वैसे तो बिलकुल भी नहीं हैं जैसी मंदिर में फोटो लगी है. आपके  सोने के गहने कहाँ गए भगवन , क्या मंदी ने यहाँ भी अपने पैर जमा लिए? आप तो बेहद ही सौम्य दिखते हैं. (थोडा झेंपते हुए लेकिन मुस्कुराकर उन्होंने आगे जोड़ा) बुरा मत मानियेगा लेकिन अब क्या करें हमे तो आपको वैसे ही देखने की आदत हो गयी है.
भगवान : क्या मैं आपको इतना फ़ालतू दिख रहा हूँ कि आप अपनी ये बकवास किये जा रहे हैं. आप धरती वाले अगर मुझे एक 50 आँखों वाला भी दिखायेंगे तो क्या मैं वैसा हो जाऊंगा.
जो सुनने आये हैं वो सुनिए बस. आपने तीन क़त्ल किये हैं जिनकी वजह से आपकी स्वर्ग की सीट किसी और को दे दी गयी है और आपके इतने पूजा पाठ करने की ही वजह से  नरक में एक सीट बुक कर दी है. अब तो नरक में पांव रखना भी मुश्किल है. सोच रहे है कि दूसरा नरक भी खोल दें.. क्यों चित्रगुप्त जी क्या कहना है आपका.
चित्रगुप्त : जो आज्ञा भगवन .
पंडित जी मन ही मन सोचने लगे . लग रहा है यहाँ भी क्लोनिंग होने लगी है. कैसा भगवान है ये. बोले : भगवान मैंने आपके लिए इतने सद्भाव रखे , इतने व्रत रखे , आप जो चाहे कहिये लेकिन झूठ आपको शोभा नहीं देता. मैंने एक चींटी को भी जानबूझकर नहीं मारा, ३ खून कैसे कर सकता हूँ. आपको शायद कोई ग़लतफ़हमी हुई है.
भगवान जी ने चित्रगुप्त को इशारा किया और वे तीन लोगों को पकड़ लाये.
भगवान : हाँ तो पुजारी जी , इस बूढ़े आदमी को पहचानते हो.
पंडित जी : हाँ बिलकुल. ये तो हमारे ही गाँव का है . मंदिर से 4 घर छोड़ कर इसका घर है. अरे अपने राजेंद्र जी के पिताजी..
भगवान : बताओ तुम कैसे मरे?
बूढा आदमी : मैं बीमार था. मुझे डॉक्टर ने आराम करने के लिए कहा था. शोर शराबे से दूर रहने को कहा था . इन्होने बड़े बड़े स्पीकर पर आपके भजन चलवा दिए तो बैचैनी बढ़ने से दौरा पड़ा और मृत्यु हो गयी.
भगवान ने अब दूसरे लड़के को बुलाया. बताओ तुम कैसे मरे
लड़का : जी मैंने ख़ुदकुशी कर ली थी.
भगवान : क्यों?
लड़का : मैं 12th के एग्जाम मैं फेल हो गया था इसलिए
भगवान : क्यों फेल हुए? पढाई नहीं की थी?
लड़का : कैसे करता भगवान, मेरे एग्जाम के दिनों में इन्होने माता की चौकी लगा दी. दिन रात लाऊडस्पीकर बजता था. मैं पढ़ नहीं पाया और फेल हो गया.
पंडित जी को उस दिन का झगड़ा याद आ गया जब लोगों ने उनसे आवाज़ कम करने को कहा था और उन्होंने उन्हें धर्म विरोधी कहकर भगा दिया था.
भगवान ने अब एक छोटी लड़की को बुलाया और उससे मरने की वजह पूछी , उसने बोला कि मैं माँ के साथ मंदिर गयी थी. वहां से लौटते वक़्त २ लोगों ने मेरा अपहरण करने की कोशिश की. मेरी माँ और मैं मदद के लिए चिल्लाये लेकिन पंडित जी के लगाये लाऊडस्पीकर की आड़ में हमारी आवाज़ दब गयी. वो लोग मुझे ले गए और बाद में मुझे मार दिया.
पंडित जी को अब काटो तो खून नहीं.

भगवान : हाँ तो पंडित जी.. मैं आपसे ये कहना चाहता हूँ कि मैं बहरा नहीं हूँ. दिल के कोने से निकली एक आवाज़ पर ही मैं आ जाता हूँ और वैसे भी मेरा अंश सबमें है तो प्राणिमात्र को तकलीफ़ देने का अर्थ मुझे तकलीफ़ देना ही होता है. गीता में भी मैंने कहा है कि मैं संसार के हर कण में विराजमान हूँ. आपने नाहक स्वर्ग के लिए इतने जतन किये. इन लोगों की परेशानी को समझ लिया होता तो आज आपको यूँ नरक न जाना पड़ता. 


अब पंडित जी क्या कहते , बस सर नीचा करके चल दिए. उनके दिमाग में सिर्फ एक ख्याल था कि नरक में गर्म तेल में पकौड़े तले जाने वाली बात भी झूठ निकले.. 

Aug 17, 2014

Yes.. you are my love

I read somewhere... इश्क़ धीरे धीरे परवान चढ़ता है.
So I was not in a hurry. When he entered into my life, he was just a partner for me, nothing more than that, our relationship started as most relations do 'I didn't like him'. In the very first month of our relationship we fought number of times, sometimes even twice or thrice a day. Gradually I started hating him. I thought it would be better to give time to each other. I said let’s take a break of a week or two. He didn't answer. And then we didn't see each other for a week. At times I did miss him but I pretended as if I didn’t care. When we met again, he again helped me, he tried his best to impress me, but I don’t know for what reason, but I didn't really want to give a fresh start to us again.
One day I had to search data and prepare a report and submit it on paper. I had little 
time, of about 15 minutes. I was not at all prepared for it and I didn't have access to a computer, I didn't want to give any excuse for not being able to complete my work yet I had no other choice than to think of one. It was then at that moment that I found “My day of Love.”  
I realized that I can use internet to search data and can prepare a report on it only.  It had a function that I can transfer data from it to a pen drive. Yessssssss ….  A pen drive can be attached to it like it can be connected to a desktop or a laptop. I transferred the data and got it printed which resulted in a win-win situation. And that was the first time I kissed it. 

My new found love was none other than my cell phone. Without any showoff it just makes my work eeeeeaaasyyy… as it has a biggggggggg screen, it is there when I need it the most and it also keeps me entertained as a small TV. For me it is just awesome.
And now .. we are living happily with each other.


Aug 16, 2014

शुक्रिया..

कभी किसी ने मुझे सिखाया कि कभी खुद से जवाब मत दो चाहे कोई कितना भी बुरा करे तुम्हारे साथ. भगवान् सब देखते हैं. जिसने तुम्हारे साथ बुरा किया ,उसके साथ ठीक वैसा ही होगा जैसे उसने तुम्हारे साथ किया.
मुझे ये नहीं पता कि किसके साथ क्या हुआ और न ही मैं जानना चाहती हूँ लेकिन हाँ मेरे साथ बहुत कुछ अच्छा हुआ. वो सभी लोग जो मेरी जिंदगी को गर्त मैं धकेलने के लिए तैयार थे मुझसे अलग हो गए. उस वक़्त कुछ अच्छे लोगों को मैंने अपने साथ खड़ा पाया. भगवान का शुक्र है कि वो लोग आज भी वैसे ही मेरे साथ है. मेरा परिवार मेरी हिम्मत है और मेरी हिम्मत हमेशा मुझे मेरे बुरे वक़्त में खुद को सम्हालने और फिर से खड़ा होने कि ताकत देती है और कुछ लोग ऐसे मिले कि उनसे जिंदगी भर का रिश्ता बन गया.

आज मैं अपने इस छोटे से दायरे में बहुत खुश हूँ. इन सभी बेनाम लोगों का मेरे जीवन में आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया. 

Aug 15, 2014

इंतज़ार है मुझे.. मेरी आज़ादी का

एक दिन यूँ ही राह से गुज़रते हुए मैंने एक चाय की दुकान पर एक बहुत सुन्दर पिंजरा देखा.. और उस पिंजरे में उससे भी सुन्दर पंछी .. बहुत सारे.. वो दूसरे पंछियों से बहुत अलग थे.. हल्के पीले, हरे, लाल रंग के पंछी , रंगबिरंगे पंख , प्यारी सी चोंच, फुदकते हुए और भी प्यारे लग रहे थे..
रास्ते भर मैंने सोचा कि इतने प्यारे पंछियों को आसमान में उड़ते हुए देखा कितना अच्छा लगेगा.. मैंने सोच लिया था कि काम ख़त्म होने पर वापस जाकर उन पंछियों को उड़ाना ही है अब.. मैं बहुत ज्यादा देर उन्हें आसमान में उड़ते देखने से खुद को रोक नहीं पा रही थी.. मैंने अपने साथ काम करने वाली एक लड़की से कहा कि मुझे उन पंछियों को उड़ाना है.. मैं बहुत देर इंतज़ार नहीं कर पाऊँगी.. उस ने कुछ कहा नहीं बस हंसकर रह गयी.. उस दिन ज़रूरी काम आ जाने की  वजह से मैं भी वापस नहीं जा पायी.
2-3 दिन गुज़र गए. फिर से हम साथ बैठे हुए थे. उसने कहा पता है रेखा तुम्हारी एक बात उस दिन मुझे बहुत अच्छी लगी थी कि तुम्हें उन पंछियों को उड़ाना है. खुले आसमान मैं आज़ाद पंछियों को उड़ते देखकर कितना अच्छा लगता है न.. उन्हें मैंने उसकी तरफ देखा.. आँखों मैं कई सवाल लेकर.. उसने मेरे पूछने का इंतज़ार नहीं किया.. मैं तुम्हारी तरह जिंदगी जीना चाहती हूँ. एक वक़्त था जब मुझे भी आसमान की बुलंदियों पर जाना था.. लेकिन माँ के इस दुनियां से जाने के बाद पिताजी ने समाज और रिश्तेदारों की बात मानकर मेरी शादी कर दी. मैंने सोचा कि मैं अपने ससुराल वालों शादी के बाद काम करने के लिए धीरे धीरे मना लूंगी .. मैंने शादी कर ली.. माँ की याद आती थी तो सासू माँ मैं माँ को ढूँढना शुरू कर दिया. पर मेरी जिंदगी उतनी आसान नहीं रही जितना मैंने सोचा था. काम करने के लिए घर वाले मान तो गए लेकिन मेरे ऊपर जिम्मेदारियों का इतना बोझ लाद दिया है कि मैं अब सिर्फ छटपटा कर रह जाती हूँ. एक शहर मैं रहकर भी अपने बूढ़े और अकेले पिता के पास जाने के लिए मुझे 10 बार पूछना पड़ता है और अगर चली जाऊँ तो समय की पाबन्दी होती है . अगर कुछ कहती हूँ तो सिर्फ एक जवाब किसने कहा है काम करने को. मुझे 3 साल हो गए पर आजतक मैं उन्हें ये नहीं समझा पाई कि मैं सिर्फ इसलिए काम करती हूँ क्यूंकि काम करना मुझे अच्छा लगता है. जितना तुम्हें बताया हालात उससे भी ज्यादा ख़राब हैं. मुझे घूमने की आज़ादी नहीं चाहिए लेकिन हाँ आज भी मुझे अपने सपनों को पूरा करने की आज़ादी का इंतज़ार है. 
खैर मैं अपना सपना तो पूरा नहीं कर पायी लेकिन हाँ मैंने समझौता कर लिया है. अपने इस काम मैं ही ख़ुशी ढूढ़ ली है. बच्चों को पढ़ाती हूँ और उन्हें सिर्फ यही समझाती हूँ कि यही एक जिंदगी है, इस जिंदगी का एक लक्ष्य बनाना और अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए जी जान से जुट जाना. बाद मैं ये आज़ादी मिले न मिले.
मैं बिना देर किये सीधे दुकान के लिए निकल गयी. वहां अब कोई पिंजरा नहीं था. मुझे दुःख हुआ. मुझे देर हो गयी थी. लेकिन पूछने पर पता चला एक लड़की आई थी और खरीद के ले गयी.

होठों पर बस एक हल्की मुस्कराहट आ गयी. 

Aug 6, 2014

आज एक लड़की से मिली.. बेहद खूबसूरत..

आज एक लड़की से मिली.. बेहद खूबसूरत..
हुआ यूँ कि मेरी एक दोस्त ने नया घर खरीदा.. उसके घर के लिए ज़रुरत का सामान लेने हम एक दुकान पर गए.. वहां पर मैं उससे मिली ..
शादी नहीं हुई थी अब तक उसकी.. और उसमे खास दिखने वाली कोई बात भी नहीं थी...
उसने बहुत ही पुराने स्टाइल का सूट पहन रखा था.. वो भी आउटडेटेड.. फैशन की कोई समझ नहीं थी.. लेकिन हाँ.. दुकान के हर सामान और उसकी कीमत की पूरी जानकारी थी..
शायद ही वो कभी पार्लर जाती होगी .. मैंने देखा कि उसके हाथों पर जलने के निशान थे.. जगह जगह बड़े काले धब्बे थे.. बेहद पतली दुबली.. ज्यादा पढ़ी भी नहीं थी.. पढ़ नहीं पाई होगी शायद.
लेकिन वो बहुत खूबसूरत थी... उसने २ छोटे छोटे क्लिप्स लगा रखे थे जो उसे और खूबसूरत बना रहे थे.. और एक चीज़ जो सबसे सुन्दर थी.. वो थी उसकी मुस्कराहट.. एक हल्की मुस्कराहट के साथ हर सामान को बेहद करीने से निकलना.. दिखाना और मुस्कुराकर पूछना इसमें और रंग दिखा दूँ आपको?
ऐसा बिलकुल भी नहीं था कि सिर्फ दुकान पर होने कि वजह से उसे जबरन मुस्कुराना पड़ रहा हो.. वो मुस्कराहट जैसे उस चेहरे के लिए ही थी.. न शिकन , न थकान सिर्फ दुकान का काम. हर बात को धीमी , सधी हुई और मिठास भरी आवाज़ के साथ बोलना और कुछ भी मांगने पर उसी मुस्कराहट के साथ तुरंत सामान ले आना..
जब तक मेरी दोस्त ने सामान लिया.. मैंने उसे देखा... शायद हालातों का शिकार वो भी हुई होगी लेकिन उसके बावजूद कैसे एक मुस्कराहट में सब छिपा लिया होगा .. अपने अरमान, सपने सब कुछ..

मुझे नहीं पता कि अच्छा दिखने या ख़ूबसूरती को मापने के मायने क्या होते हैं लेकिन मेरे लिए वो आज के दिन में मिली सबसे खूबसूरत लड़की थी.. 

May 16, 2014



मोदी जी..
आपको बधाई कि अब आप भारत देश के प्रधानमंत्री कहलाये जायेंगे. आपके कारन ही भाजपा को इतनी बड़ी जीत मिल पायी है. आप अब अपने किये हुए वादों को पूरा करने की ओर बढ़ेंगे जैसा कि सब आपसे उम्मीद कर रहे हैं.  कुछ उम्मीदें भारत कि एक आम लड़की भी रखती है आपसे. मैं जानती हूँ कि आप पर उमीदों का बोझ पहले से ही बहुत है पर आपने अच्छे दिनों के आने का ख्वाब दिखाया है तो मैं भी अपने अच्छे दिनों के आने का इंतजार करुँगी. रोज़ रोज़ अखबारों में बलात्कार, लूट और छेड़खानी की खबरें पढ़कर मैं आहत हो चुकी हूँ इसलिए अपनी उम्मीदों का बोझ भी आपके सर डाल रही हूँ.  आपसे कुछ ऐसी उम्मीदें हैं कि :

मुझे एक ऐसा देश चाहिए जहाँ मुझे अपने हक के लिए रिजर्वेशन की ज़रुरत न पड़े. संविधान में मिले बराबरी के अधिकार को मैं खुलकर जी पाऊं. अपने हक के लिए लड़ने पर मुझे दोयम दर्ज़े का कहकर संबोधित न किया जाए.

मैं जब चाहूँ, घर से बाहर ये सोच कर निकल पाऊं कि हाँ मैं सही सलामत, बिना किसी परेशानी के वापस आ जाउंगी और अगर किसी परेशानी मैं फंस भी जाऊ तो पुलिस के पास जाने में मुझे हिचकिचाहट न हो.

एक ऐसा समाज चाहिए जहाँ मुझे गर्व महसूस हो कि मैं लड़की हूँ. हर बार मुझे ये विचार न कचोटे कि काश में एक लड़का होती. मेरे माता पिता को मेरी शादी के लिए अपना बैंक अकाउंट खाली न करना पड़े और इतना खर्च करने के बाद फिर भी दहेज़ की बलि मुझे न चढ़ाया जाए.

मेरी ज़रुरत सिर्फ नवरात्रों तक ही न हो और मेरे हुनर का दायरा सिर्फ रसोईघर और घर गृहस्थी तक ही सीमित न माना जाए. देश और दुनिया से जुड़े मुद्दों पर मेरी राय को सिर्फ इसलिए न नकारा जाए क्यूंकि मैं एक लड़की हूँ और लड़कियां तो बोलती ही रहती हैं.

अपनी पसंद का करियर चुनने में मुझे अपने लड़की होने को ध्यान में न रखना पड़े. रोज़गार के अवसरों में मेरे लड़की होने को नहीं वरन काबिल होने को ध्यान में रखा जाए.

ट्रेन या बस में शहर से बाहर जाते वक़्त मेरे माता पिता को कभी ये फिकर न करनी पड़े कि मेरी बेटी सही वक़्त और सही तरीके से पहुंची होगी कि नहीं.

आशा करती हूँ कि आप इस आम भारतीय लड़की की इन उम्मीदों को पूरा करने के लिए ईमानदारी से प्रयास करेंगे और मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि अपने आपको साबित करने में कोई कसर नहीं छोडूंगी.


Mar 21, 2014

Finally... तुम मिल गए



कल अचानक एक पुराने दोस्त से बात हुई. हम 8 साल बाद बात बात कर रहे थे, 3 घंटे, उफ्फ्फ... याद भी नहीं कि पिछली बार किसी से इतनी लम्बी बात कब हुई थी, वक़्त का पता ही नहीं चला. हम बातें करते गए, ऐसा लग रहा था कि बताने को कुछ रह ना जाए. 8 सालों में हम दोनों की जिंदगी में जो कुछ भी हुआ, हम एक दूसरे को सब बता देना चाहते थे, कौन नया आया, कौन गया, कितने दोस्त बने, किसे धोखा दिया, किसने तंग किया, पढाई कहाँ की, जॉब कैसी चल रही है.. फ़ोन में घुसकर उसके पास पहुँच जाने का मन कर रहा था, प्लानिंग होने लगी, कैसे मिलना है, कहाँ मिलना है, मिलेंगे तो कहाँ कहाँ घूमेंगे, कैसे वक़्त बिताएंगे.. ख़ुशी का आलम ये था कि अगर फ़ोन से जाने का कोई तरीका होता तो वो अमल में लाया जा चुका होता. उसने कहा.. वक़्त कितनी जल्दी गुज़र गया न, पता ही नहीं चला, ऐसे लग रहा है जैसे कल की ही बात हो. ये छोटी सी बात उसने यूँ ही कही, लेकिन वाकई वक़्त कितना जल्दी गुज़र जाता है, और इस वक़्त की  आपाधापी में हम भूल जाते हैं कि कुछ अपने पीछे छूट गए. वो लोग जो जिनके चेहरे की ख़ुशी की वजह आप ही हैं. बस हम समझ नहीं पाए. बड़े मुकाम हासिल करने कि चाह में उन अपनों की सुधि ही नहीं ली. आज टेक्नोलॉजी बूम के दौर में हम टच में रहने की बजाय आउट ऑफ़ टच होते जा रहे हैं. हमारे पास इतने सारे एप्प्स हैं फिर भी हम रिश्ते सम्हालने में नाकाम हो जाते हैं. आप ही सोचिये कि जब कुछ स्माइली हमारे इमोशन को बयां करती हैं, तो कैसे हम उन रिश्तों को सहेज पायेंगे. इन एप्प्स के चक्कर में हम भूल जाते हैं कि दोस्ती वर्चुअल कभी नहीं हो सकती. मुझे अच्छे से पता है कि आपको ज्ञान लेना पसंद नहीं है. तो सिर्फ एक छोटा सा काम करते हैं. 
, थोड़ी देर के लिए हम कुछ वक़्त पहले की दुनियां में चलते हैं जब हमारी जिंदगी में दोस्तों की  जगह एप्प्स ने नहीं ली थी. थोडा सा वक़्त निकलते हैं उन पुराने दोस्तों के लिए जो आपकी मुस्कराहट के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे. थोड़ी देर उन दोस्तों के साथ बचपन को जीकर देखते हैं. बिना मिलावट की हँसी हसकर देखते हैं.. अपने पुराने रिश्तों को फिर से जिंदा करने की कोशिश करते हैं, और जब आप ये कर लेंगे तो यकीन मानिए आप खुद को पहले से ज्यादा सुकून में पायेंगे. पहले से ज्यादा खुश पायेंगे, और..
ख़ुशी सिर्फ तभी मिलेगी जब आप ख़ुशी को पहचानना सीख लेंगे.    


Mar 13, 2014

बस यूँ ही

कभी कभी सोचती हूँ कि जिंदगी यूँ न होती तो कैसी होती. आप उम्मीदों के साथ आगे बढ़ते हैं, खुद के लिए एक मुकाम तय करते हैं, टूटते हैं, बिखरते हैं, फिर उठ खड़े होते हैं और फिर खुद से नयी उम्मीदें पालते हैं. कहते हैं न कि चलती का नाम जिंदगी.


Mar 9, 2014

आप सोचिये

हॉल में जाने का मौका नहीं मिला तो मैंने लैपटॉप पर कल जय हो देखी. अच्छी लगी. बहुत ख़ुशी हुई ये देखकर कि किस तरह एक आम आदमी इतने सारे बुरे लोगो पर भारी पड़ता है. बहुत अच्छा लगता है जब वो भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ लड़ता है. अपने परिवार की रक्षा करता है खासकर आपनी बहिन की जब फिल्म में एक बुरे चरित्र का व्यक्ति उसकी इज्ज़त पर हाथ डालता है. ज़ाहिर है कि किसी भी आम इंसान को ये देखकर अच्छा ही लगेगा कि कोई तो है जो अच्छा सोचता है और करता है. फिल्म में ही सही.
नहीं नहीं मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ. मैं बस आप सभी से अपने कुछ ओब्ज़र्वेशन शेयर करना चाहती हूँ.

एक सवाल : जो काम उस फिल्म मैं एक हीरो ने किया अगर वही काम एक लड़की करना चाहे तो. एक आम लड़की, जिसके दिल में देश के लिए बेपनाह मोहब्बत है, जो दुखी लोगो को देखकर खुद भी दुखी होती है और उनकी मदद की हरसंभव कोशिश करती है. उसे भी भ्रष्ट राजनेताओं से उतनी ही चिढ़ है, इस सिस्टम के खिलाफ वो भी लड़ना चाहती है पर वो नहीं कर सकती. क्यों ?
जवाब: वैदिक संस्कृति के इस देश में लड़कियों को देवियों का दर्ज़ा तो दे दिया गया लेकिन सिर्फ दर्ज़ा दिया गया, माना नहीं गया. अगर कोई भी लड़की समाज द्वारा बताई गयी उसकी हदों से बहार जाकर कोई काम करना चाहे या करती है तो सबसे पहला काम कि उसके चरित्र का हनन कर दिया जाए. ऐसा कुछ कहा जाए कि वो अपनी नज़रों में ही गिर जाए. इससे काम न चले तो उसके शरीर को हथियार बनाओ. भगवान् ने उसे ऐसा शरीर दिया ही इसीलिये है कि जब जैसी ज़रुरत पड़े, इस्तेमाल करो. इसके बाद भी अगर कुछ कहने की हिम्मत करे तो सामूहिक या अप्राकृतिक बलात्कार जैसे अस्त्र कब काम आयेंगे. इसके बाद उसकी जान ले लेना ही एकमात्र उपाय बचता है जो कि आजकल के दौर में आसान भी है.
थोडा हैवी हो गया ना. होने दीजिये बेहतर है. हर बार चीज़ों को ज्यादा लाइट लेते लेते हम अपनी इंसान होने की जिम्मेदारियां भी भूलते जा रहे हैं शायद. हमारा काम सिर्फ ख़बरें पढ़ लेना और उन पर अफ़सोस भर कर लेना रह गया है. ज्यादा दुःख हुआ तो एक कैंडल मार्च निकल कर तसल्ली दे ली खुद को.
अब एक और सवाल: लड़कियों के सम्मान और मर्यादा के लिए इतनी बातें लिखी जाती है, सुनाई जाती हैं, दिखाई जाती हैं, फिर भी ऐसा क्या है जो आपको रोकता है सही को सही या ग़लत को ग़लत कहने से. इसका जवाब तो अब आपके पास ही होगा.
ये सिर्फ हमारे ही देश में हो सकता है कि नवरात्रों में माता के पूर्ण आशीर्वाद के लिए हम नौ दिन कन्या खिला सकते हैं पर एक कन्या को जन्म नहीं लेने देना चाहते.
अपनी बेटी को विदा करते वक़्त अपने खाली बैंक अकाउंट के लिए ससुराल वालों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं पर वही बैंक अकाउंट भरने के लिए दहेज़ लेने और बहू को गाहे बगाहे तंग करने से नहीं चूकते.
बचपन से लड़कियों को राधा और दुर्गा के रूप में देखकर खुश होते हैं पर ना तो राधा की तरह उन्हें प्यार करने का हक़ है और ना ही दुर्गा कि तरह अपनी शक्तियों को पहचानने का.
किसी भी लड़की को जीने के लिए एक पति नाम के सहारे कि ज़रुरत होती है. हसने वाली ही बात है कि बचपन में देवी रूप में पूजी गयी कन्या को ख़ुशी भी एक सहारे से नसीब होगी और इस नियम के विरूद्ध जाने कि कोशिश कि तो वही एक हथियार.. चरित्रहनन .
लड़कियों से हर बात पर अग्नि परीक्षा की उम्मीद की जाती है. रामायण काल से चला आ रही है ये परंपरा. अकेले चलना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने एवरेस्ट फ़तेह करके दिखा दिया. पढ़ना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने हर बार बोर्ड के पेपरों में लड़कों से अव्वल आकर दिखा दिया. उड़ना चाहा तो भी अग्निपरीक्षा, तो लीजिये हमने अंतरिक्ष तक पहुँच कर दिखा दिया. आत्मनिर्भर होना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने सभी शीर्ष कंपनियों का सरताज बनकर दिखा दिया. एक छोटी सी बात समझने में इस समाज को कितने वर्ष और लगेंगे कि अब वो दौर गया जब भगवान्, समाज, परिवार, दुनियां और इज्ज़त का डर दिखाकर लड़कियों को उनकी मंजिलों तक ना पहुँचने दिया जाता था . बदलाव हो भी रहा है और आगे भी होगा. 
मैं वही एक लड़की हूँ, एक आम लड़की, जिसके दिल में देश के लिए बेपनाह मोहब्बत है, जो दुखी लोगो को देखकर खुद भी दुखी होती है और उनकी मदद की हरसंभव कोशिश करती है. उसे भी भ्रष्ट राजनेताओं से उतनी ही चिढ़ है, इस सिस्टम के खिलाफ वो भी लड़ना चाहती है पर लड़ नहीं सकती. क्यों?
आप सोचिये.