अभी कुछ दिन पहले वैज्ञानिक सोच रखने वाले पूर्व
राष्ट्रपति कलाम साहब के निधन पर पूरा देश रोया लेकिन उनके तरह वैज्ञानिक सोच लेकर
आचरण करने को अभी हम अपना ही नहीं कर पाए. सोशल मीडिया और टीवी पर हमने कई बार
देखा होगा जैसे इस फ़ोटो को शेयर करें और पायें असीम कृपा तुरंत. फलां भगवान् जी
दिलाएंगे आपको वीज़ा. बस एक लॉकेट भर दूर है आपकी किस्मत. अल्लाह लॉकेट को पहनिए,
किस्मत आपके कदम चूमेगी. “होली वाटर” की एक बोतल घर लाइए और ईसामसीह की कृपा से
अपना घर भर दीजिये. एक तरफ जहाँ इन्टरनेट से दुनियां जहान से हम लोग जुड़ रहे हैं
वहीँ इसी इन्टरनेट से अन्धविश्वास की गली को चौड़ा किया जा रहा है. सांप सपेरों की
धरती कहे जाने वाले देश में माउस से खेलने वाले युवाओं से उम्मीद बंधी थी कि अब अंधविश्वासों को काबू किया जा सकेगा लेकिन
इसी माउस की क्लिक से पाखंड को बढ़ावा मिल रहा है. कई सालों से हम धर्म के नाम पर पैसा
कमाने और नफ़रत फैलाने वालों को देखते और सुनते आ रहे हैं और कई ऐसे गुनहगारों को
जेल के पीछे भी देखा है. ज्यादा दूर जाने की ज़रुरत नहीं है. आसाराम बापू का प्रकरण
खूब चर्चा में रहा था. केवल उन पर ही नहीं बल्कि उनके बेटे पर भी यौन उत्पीडन के
आरोप लगे थे. उससे पहले नित्यानंद स्वामी का ऐसा ही प्रकरण सामने आया था. निर्मल
बाबा के दरबार और समागम में समोसा और गोलगप्पे खा लेना ही मानव की समस्याओं का
उपाय है. दक्षिण के मंदिरों में धन के भंडार भरे हैं. सत्य साईं बाबा के देहावसान
के बाद इसका खुलासा भी हुआ था. खुद को राधे माँ कहने वाली एक स्त्री पर दहेज़ उत्पीडन का आरोप लगा है. स्वयं को कबीर का
अवतार बताने वाले रामपाल इन सबसे एक कदम आगे थे. रामपाल के ऊपर ज़मीन पर अवैध कब्ज़े
का आरोप लगा था. उनका आश्रम हर तरह की सुख सुविधाओं से परिपूर्ण था और उन्होंने
सशस्त्र बल भी अपनी सुरक्षा के लिए तैनात कर रखा था और वो भी बहुत बड़ी संख्या में.
ये केवल बड़े कुछ नाम हैं जो चर्चा में रहे. ऐसे ही मुस्लिम समुदाय में कुछ मौलवी,
पीर, फ़कीर जिन्न भागने के नाम पर औरतों के बाल खींच खींच कर पाखंड का प्रदर्शन
करते नज़र आते हैं. 5000 करोड़ की संपत्ति के मालिक डॉ. पॉल दिनाकरण का कहना है कि
स्वयं ईसामसीह ने उन्हें शक्तियां प्रदान कीं. बाकी अख़बारों में तो हम गाहे बगाहे
छोटे मोटे बाबाओं, मौलवियों के बारे में पढ़ते ही रहते हैं. अब भारत के साक्षरों की
बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 74 प्रतिशत लोग साक्षर हैं और इन
धर्म कारोबारियों के व्यापार के फलने फूलने में ज़्यादातर इन्हीं लोगों का अधिक
योगदान रहता है. जेबों में रखे पैसे का उपयोग इनके द्वारा बताये गए उपाय की फीस या
फिर “सेवा” देने में किया जाता है. अपने रोज़ के काम हों या व्यापार के या फिर घर
की सुख शांति के उपाय हों या घर में किसी की शादी, ये सब काम इन्हीं लोगों से पूछ
पूछ कर किये जाते हैं और भगवान के नाम पर डराने वाले लोगों को मानने लोगों के लिए
ये केवल कुछ रुपये हैं लेकिन यही कुछ रुपये बहुत लोगों के मिलाकर इतने भर हो जाते
हैं कि पाखंड का एक शामियाना स्थापित किया जा सके और बस इनकी दुकान चल निकलती है.
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Aug 6, 2015
केवल शिक्षा की तरफ ही कदम आगे बढ़ें न कि गर्त में धकेलते किसी पाखंड की तरफ.
अभी कुछ दिन पहले वैज्ञानिक सोच रखने वाले पूर्व
राष्ट्रपति कलाम साहब के निधन पर पूरा देश रोया लेकिन उनके तरह वैज्ञानिक सोच लेकर
आचरण करने को अभी हम अपना ही नहीं कर पाए. सोशल मीडिया और टीवी पर हमने कई बार
देखा होगा जैसे इस फ़ोटो को शेयर करें और पायें असीम कृपा तुरंत. फलां भगवान् जी
दिलाएंगे आपको वीज़ा. बस एक लॉकेट भर दूर है आपकी किस्मत. अल्लाह लॉकेट को पहनिए,
किस्मत आपके कदम चूमेगी. “होली वाटर” की एक बोतल घर लाइए और ईसामसीह की कृपा से
अपना घर भर दीजिये. एक तरफ जहाँ इन्टरनेट से दुनियां जहान से हम लोग जुड़ रहे हैं
वहीँ इसी इन्टरनेट से अन्धविश्वास की गली को चौड़ा किया जा रहा है. सांप सपेरों की
धरती कहे जाने वाले देश में माउस से खेलने वाले युवाओं से उम्मीद बंधी थी कि अब अंधविश्वासों को काबू किया जा सकेगा लेकिन
इसी माउस की क्लिक से पाखंड को बढ़ावा मिल रहा है. कई सालों से हम धर्म के नाम पर पैसा
कमाने और नफ़रत फैलाने वालों को देखते और सुनते आ रहे हैं और कई ऐसे गुनहगारों को
जेल के पीछे भी देखा है. ज्यादा दूर जाने की ज़रुरत नहीं है. आसाराम बापू का प्रकरण
खूब चर्चा में रहा था. केवल उन पर ही नहीं बल्कि उनके बेटे पर भी यौन उत्पीडन के
आरोप लगे थे. उससे पहले नित्यानंद स्वामी का ऐसा ही प्रकरण सामने आया था. निर्मल
बाबा के दरबार और समागम में समोसा और गोलगप्पे खा लेना ही मानव की समस्याओं का
उपाय है. दक्षिण के मंदिरों में धन के भंडार भरे हैं. सत्य साईं बाबा के देहावसान
के बाद इसका खुलासा भी हुआ था. खुद को राधे माँ कहने वाली एक स्त्री पर दहेज़ उत्पीडन का आरोप लगा है. स्वयं को कबीर का
अवतार बताने वाले रामपाल इन सबसे एक कदम आगे थे. रामपाल के ऊपर ज़मीन पर अवैध कब्ज़े
का आरोप लगा था. उनका आश्रम हर तरह की सुख सुविधाओं से परिपूर्ण था और उन्होंने
सशस्त्र बल भी अपनी सुरक्षा के लिए तैनात कर रखा था और वो भी बहुत बड़ी संख्या में.
ये केवल बड़े कुछ नाम हैं जो चर्चा में रहे. ऐसे ही मुस्लिम समुदाय में कुछ मौलवी,
पीर, फ़कीर जिन्न भागने के नाम पर औरतों के बाल खींच खींच कर पाखंड का प्रदर्शन
करते नज़र आते हैं. 5000 करोड़ की संपत्ति के मालिक डॉ. पॉल दिनाकरण का कहना है कि
स्वयं ईसामसीह ने उन्हें शक्तियां प्रदान कीं. बाकी अख़बारों में तो हम गाहे बगाहे
छोटे मोटे बाबाओं, मौलवियों के बारे में पढ़ते ही रहते हैं. अब भारत के साक्षरों की
बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 74 प्रतिशत लोग साक्षर हैं और इन
धर्म कारोबारियों के व्यापार के फलने फूलने में ज़्यादातर इन्हीं लोगों का अधिक
योगदान रहता है. जेबों में रखे पैसे का उपयोग इनके द्वारा बताये गए उपाय की फीस या
फिर “सेवा” देने में किया जाता है. अपने रोज़ के काम हों या व्यापार के या फिर घर
की सुख शांति के उपाय हों या घर में किसी की शादी, ये सब काम इन्हीं लोगों से पूछ
पूछ कर किये जाते हैं और भगवान के नाम पर डराने वाले लोगों को मानने लोगों के लिए
ये केवल कुछ रुपये हैं लेकिन यही कुछ रुपये बहुत लोगों के मिलाकर इतने भर हो जाते
हैं कि पाखंड का एक शामियाना स्थापित किया जा सके और बस इनकी दुकान चल निकलती है.May 7, 2015
हमें शिद्दत से है सिविक सेंस की दरकार
दुनियां में पैदा होने वाला हर बच्चा पांच सेंस के साथ पैदा होता है. धीरे धीरे बड़े होने पर एक सेंस उसे खुद से सीखना होता है. इस सेंस को हम सिविक सेंस कहते है. सिविक सेंस का अर्थ उन अलिखित नियमों से है जो हमारे और दूसरे की सहूलियत के लिए बनाये जाते हैं. कुछ बातें हमने चलते फिरते पढ़ी होंगी जैसे कृपया यहाँ गन्दा न करें, यहाँ गाडी खड़ी करना मना है, कृपया प्याऊ से पानी बर्बाद न करें, इस दीवार पर पेशाब न करें, यहाँ थूकना मना है, कृपया बाएं हाथ पर चलें, रेड लाइट पर रुकें, कृपया बायीं ओर चलें, चलती सड़क पर न थूकें, यहाँ विज्ञापन लगाना मना है, ज़ेब्रा क्रासिंग पर रुकें, फूल तोडना मना है, नो पार्किंग, सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान न करें, कृपया पेट्रोल पंप पर मोबाइल बंद कर लें... जिन्हें हम गाहे-बगाहे यहाँ वहां पढ़ते रहते हैं. ये सारी सिविक सेंस के अंतर्गत आती हैं. इनमे हमे ज़्यादातर चीज़ों के लिए हमें मना किया जाता है कि ऐसा न करें पर क्यूँ? हमारे ख़ुद को जवाब कुछ इस तरह होते हैं कि अगर हम ऐसा करेंगे भी तो कौन हमें रोकेगा और फिर हम इतनी सारी बातें क्यूँ माने, ये सब तो लोग लिखते ही हैं, अरे ठीक है जो मन आये करो, इतना कौन सोचे, ठीक है हो गया हो गया देखेंगे आगे. ऐसा ही कुछ, है न. या तो हम लोग इन नियमों की अनदेखी कर देते हैं या हम लोगों को इन्हें जानबूझकर तोड़ने में बड़ा मज़ा आता है. इसके पीछे की वजह क्या हो सकती है? आपने कभी सोचा है कि हम लोगों के लिए इतने निर्देश क्यूँ लिखे रहते हैं और क्यों सिविक सेंस जैसी आम चीज़ के लिए भी हम लोगों को बताना पड़ता है.
कभी आपने सोचा की आखिर हमारे देश में सिविक सेन्स लोगों की प्राथमिकता में क्यों नहीं है.बढ़ती जनसँख्या शहरों पर बोझ डाल रही है. इस वक़्त भारत रूरल-अर्बन डिवाइड की समस्या से जूझ रहा है. जो ग्रामीण हैं वो इन सब चीज़ों से अनजान हैं और शहर में रहने वाले लोग इन निर्देशों को अनदेखा करते हुए निकल जाते हैं क्यूंकि उन्हें यहाँ रहते समय हो गया और समय के साथ चीज़ों की अहमियत कम हो जाती है. जो कस्बाई लोग हैं वो जानते हैं कि उन्हें शहर एक या दो दिन के लिए आना है तो वो इन निर्देशों की गंभीरता को नहीं समझते. अपनी सहूलियत का अधिक ख्याल करते हुए लोग कार में से सड़क पर पानी की बोतल, चिप्स के खाली पैकेट और गाड़ी चलाते वक़्त अचानक से गाड़ी का दायाँ दरवाज़ा खोलकर पान की लम्बी पीक बाहर निकालते हैं और सड़क को गन्दा करते हैं या ज़्यादातर लोग ख़ासकर औरतें चलती बस में से बाहर उल्टी कर देते हैं. क़ायदे से वो एक पोलिथीन अपने साथ रख सकते हैं कि अगर उन्हें उल्टी आये तो वो उसका इस्तेमाल करें और बाहर निकल कर उसे कूड़ेदान में फ़ेंक दें लेकिन ऐसा होता नहीं है. रेलवे स्टेशन पर साफ़-साफ़ शब्दों में लिखा रहता है कि यहाँ गंदगी न करें लेकिन लोग चाय के कप, बोतल लोग यूँ ही पटरी पर फेंक देते हैं. हद तब हो जाती है जब छोटे छोटे बच्चों की माएँ अपने बच्चों को वहीँ शौच करवाती हैं या उनके नैपकिन्स वहीँ डाल देती हैं. लोग इस बात से अनभिज्ञ बने रहते हैं कि इस तरह खुले में गंदगी करने से उनके स्वास्थ्य पर ही उल्टा असर पड़ेगा. मन का करना हमेशा अच्छा होता है लेकिन नियमों का पालन भी ज़रूरी होता है खासकर तब जब बात सिविक सेंस की हो. आप किसी गंदगी करेंगे या ग़लत जगह गाड़ी खड़ी करेंगे तो हो सकता है उस दिन आपको सहूलियत हो जाये लेकिन उसके बाद आप उम्मीद नहीं कर सकते कि आपको साफ़ जगह मिलेगी या फिर आप किसी और की ग़लती की वजह से जाम में नहीं फसेंगे. जाम से ख्याल आया शहरों में जाम लगने का सबसे बड़ा कारण गाडी पार्किंग में न खड़ा कर के रोड पर ही आड़ा तिरछा खड़ा कर देना या फिर दूसरे से आगे निकलने की जल्दी में आते हुए ट्रैफिक की दिशा में गाडी घुसा देना जिससे ट्रैफिक की जिस दिशा में जाम नहीं लगा वहां भी जाम लग जाता है .जरा सोचिये अगर हम थोडा देर इन्तजार कर लेते तो शायद जाम उतना लम्बा नहीं होता जितना किसी एक की गलती से हो गया.
सिविक सेन्स एक ऐसी चीज है जिसे कानून बना कर हमारी आदत में शामिल नहीं किया जा सकता वह भी ऐसे देश में तो बिलकुल भी नहीं जहाँ आधी से ज्यादा जनसँख्या निरक्षर हो वहां हर काम सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता .सिविक सेन्स तो लोगों को जागरूक बना कर ही किया जा सकता है.अगर हमें इस बात का एहसास हो जाए कि इसमें ही हम सबका भला है तो लोग खुद बा खुद वो नियम मानने लग जायेंगे जिसमें सबका भला है.आप भी सोच रहे होंगे कि ये होगा कैसे.गुड क्वेशन अरे भाई जो भी गलती करे उसे प्यार से समझाओ कि ये शहर ये दुनिया आपकी ही है अगर आप अपने आस पास के परिवेश को साफ़ सुथरा नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा.हाँ इस काम में मेहनत भी लगेगी और समय भी फिर आदतें बदलते ,बदलते ही बदलती हैं.सोशल मीडिया का सहारा लीजिये अपने आस पास अगर कोई ऐसा कर रहा है उसकी तस्वीर खींच कर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दीजिये. फिर ,फिर क्या सोच क्या रहे हैं लग जाइए काम पर अगर एक दिन में कोई एक आदमी आपके कारण सिविक सेन्स की यूटीलटी समझ रहा है तो मान लीजिये कि इस देश को बदलने में कुछ हिस्सा आपका भी है .
Apr 1, 2015
तो काबिल होने के लिए पढ़िए..
अबे कितना पढ़ा तूने? मुझे तो समझ ही नहीं आया कि शुरू कहाँ से करूँ. तूने तो सारा पढ़ लिया होगा न ? नहीं यार , इतना पढ़ते होते तो यहाँ होते, हाँ पास होने की गारंटी है. बाकी और कुछ चाहिए भी नहीं. और सुन, गाय हमारी माता है.. हमको कुछ नहीं आता है.. और एक जानी पहचानी खिलखिलाहट भरी हँसी के साथ सब हँस पढ़ते है. पेपर देने से पहले ऐसे ही कुछ बातें करते हैं न हम. हाँ वैसे एग्जाम टाइम में बड़ा मज़ा आता है न ऐसे बोलने में. लेकिन इस मज़े में क्या छुपा है आइये आपको बताते हैं. होता यूँ है कि जब हम खुद को बार बार दूसरों के सामने पढाई में कमज़ोर जताना चाहते हैं तो धीरे धीरे हम वाकई में कमज़ोर होते जाते हैं. हम हमेशा इसी बात पर जोर देते रहते हैं कि हमको कुछ नहीं आता है बजाय इस बात पर जोर देने के कि हाँ मुझे इतना आता है और इतना तो बहुत अच्छे से आता है. अगर अच्छे नंबर आ गए तो ठीक वरना हमने तो पहले ही कह दिया था कि हमे कुछ नहीं आता. इससे हम बेशक दूसरों के सामने बच जाएँ लेकिन खुद में हम आगे बढ़ना सीखना छोड़ देते हैं. अब आपको मेरी बात कुछ कुछ समझ में आने लगी होगी. किसी दोस्त के पूछने पर कि क्या ये तुमने पढ़ा है तो हम सीधे सीधे कहने के बजाय कि हाँ मैंने ये पढ़ा है, हमारा कहना होता है कि कहाँ यार.. कुछ नहीं पढ़ा. उसके बावजूद एग्जाम में अपना धर्म समझकर कॉपियों पर कॉपियां भरते चले जाते हैं और हमारा सारा जोर एग्जाम में अच्छे प्रतिशत लाने पर होता है और रिजल्ट आने के बाद हम दूसरों से ये सुनना पसंद करते हैं कि अच्छा.... तुमने तो कहा था कि तुम्हें कुछ नहीं आता लेकिन इतने अच्छे परसेंट कैसे आ गए और हम विजयी मुद्रा में बस मुस्कुरा देते हैं लेकिन हम उसके बावजूद भी ये नहीं कहना चाहते कि हाँ मुझे इस विषय में इतना आता है. समझ आया कुछ. चलिए अब थोडा और सीरियसली बात करते हैं..
आंकड़ों की मानें तो भारत में हर साल लगभग 1.5 मिलियन इंजीनियर ग्रेजुएट हर साल पास होते हैं. ये संख्या यूएसए और चीन दोनों की संख्या मिलाकर भी ज्यादा है. तकरीबन एक लाख एमबीए डिग्री हर साल दी जाती है. तकरीबन एक हज़ार के आसपास पीएचडी अवार्ड की जाती है. सरकार भी बच्चों की पढाई पर सरकारी बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च करती है. सोचने वाली बात ये है कि हमारे पास जब इतने कॉलेज हैं, सुविधाएँ हैं, मौके हैं, डिग्रियां हैं और हर साल लाखों लोग इन डिग्रियों को हासिल भी कर रहे हैं, तो इतने पढ़े लिखे लोगों का देश होने के बावजूद दुनिया के धरातल पर हम अब भी पढ़े लिखे नहीं माने जाते हैं. भारत में डिग्री की वैल्यू कुछ यूँ है कि अगर कोई डिग्री नौकरी नहीं दिला पाती है तो वह बेकार है. इसीलिये हमारे यहाँ केवल डॉक्टर और इंजीनियर बनने को ही अच्छी पढाई माना जाता है लेकिन इकनोमिक टाइम्स के अनुसार हर साल पास होने वाले इंजीनियर में से 20 से 33 प्रतिशत बेरोज़गार हैं. थोडा अजीब लगा न जानकर. एक और अजीब सी लगने वाली बात ये भी है कि हर साल पास होने वालों की संख्या इतनी ज्यादा है, इंजीनियर डॉक्टर की भरमार है फिर भी इस क्षेत्र में देश का नाम करने वालों की संख्या कम. क्यूँ? थोडा सा पीछे मुड़कर अपने पढाई करने के तरीके को देखेंगे तो आपका इसका जवाब मिल जायेगा. हम खुद को नंबर पाने की दौड़ में उलझाये रखना चाहते हैं. रटकर, नक़ल करके या कैसे भी करके बस पचहतर प्रतिशत से ज्यादा आ जाये. हमारे देश में केवल प्रतिशत की अंधी दौड़ में दौड़ने और एक अदद नौकरी पाने को ही सब कुछ माना जाता है. इसलिए नया लिखने या पढने की इच्छा या तो जन्म नहीं ले पाती या फिर हम उससे खुद ही किनारा कर लेते हैं और धीरे-धीरे ये हमारे पढ़ने और पढ़ाने का तरीका बन जाता है कि केवल नंबर ले आओ बाकी सब तो जुगाड़ करवा ही देती है और एक बार नौकरी लग जाये तो फिर पढ़ने की ज़रुरत ही क्या है और यही सोच हमे कुछ नया नहीं सीखने देती. आप खुद ही सोचिये कि जब हम किसी अच्छी किताब, मॉडल, थ्योरी या अविष्कार की बात करते हैं तो हमेशा विदेशी नामों से ही टकराते हैं. टीचर्स हों या स्टूडेंट्स, विदेशी लेखकों की किताबों को ही पढ़ते-पढ़ाते हैं. भारतीय नामों को तो ऊँगली पर गिना जा सकता है. रिसर्च के क्षेत्र में तो भारतीय नाम बहुत ढूंढने पर भी शायद नहीं मिल पाएंगे. कारण फिर वही.. पास होना और नौकरी पाना. यही हमारी जिंदगी का लक्ष्य बन जाता है और खुद को कमतर आँकने की हमारी आदत. बहुत सिंपल सी बात है हम जैसा खुद को दूसरों के सामने दिखायेंगे वैसा ही हम धीरे धीरे ख़ुद बनते भी जायेंगे और इस तरह से जो कुछ कर सकने की हम क्षमता रखते हैं वो भी नंबरों के पीछे भागने में वेस्ट हो जाएगी. इस नंबर दौड़ से तो किसी का भला होने से रहा तो जनाब बाबा रणछोड़ दास की सलाह मानिए. “नौकरी पाने के लिए नहीं बल्कि काबिल होने के लिए पढ़िए. सर्कस में तो शेर भी करतब दिखा लेता है लेकिन हम उसे वेल ट्रेन्ड कहते हैं वेल एजुकेटेड नहीं”. ज़रा सोचिये कितना अच्छा हो कि जब कोई हमसे पूछे कि तुम्हें कितना आता है और हम कहें कि गाय हमारी माता है ..इसीलिये ही हमे सब कुछ आता है.
Feb 19, 2015
हमारी पहचान सिर्फ हमसे है..
गाने सुनने का
शौक तो सभी को होता है. आजकल लड़कियों को एक गाना खूब भा रहा है.. चिट्टियाँ
कलाइयाँ वे ओ बेबी मेरी चिट्टियाँ कलाइयाँ वे.. रेडियो से लेकर टीवी सब जगह इस
गाने को बेहद पसंद किया जा रहा है. थोड़ा फ्लेशबैक मे चलते हैं. ऐसा ही एक गाना
मुझे याद आ रहा है .. गोरी हैं कलाइयाँ , तू लादे मुझे हरी हरी चूडियाँ.. अब आप सोच रहे होंगे कि इन दोनों गानों मे
क्या कनेक्शन है. चलिए मैं बता देती हूं.. दोनों ही गाने अपने समय के बेहतरीन गाने
हैं पर दोनों ही गानों मे एक बात सोचने वाली है कि दुनिया बदल गयी, दुनिया के नियम क़ानून बदल गए, लेकिन लड़कियों को
लेकर गीतकारों ओर समाज की सोच जस की तस है. दोनों ही गानों मे लड़की अपनी ज़रूरत के
लिए अपने साजन पर ही निर्भर है. अब यहां सवाल ये उठता है कि यदि आज की नारी इतनी
सशक्त है कि अपने निर्णय खुद ले सकती है, एक वक्त में जॉब
और घर दोनों सम्हाल सकती है तो फिर क्यों फिल्मों मे उन्हें कमतर आँका जाता है. एक वक़्त था जब सिनेमा में हीरोइन केवल हीरो के पीछे छिपने और गाना गाने का
काम करती थीं. समय बदलता गया. हीरोइन गुंडों से लड़ने लगी, लहंगे और साड़ी छोड़कर पैंट पहनने लगी लेकिन फिर भी बिना हीरो के उसकी
जिंदगी अधूरी होती. उसके बाद महिलाओं को केंद्र में रखकर फिल्मे बनने लगीं.
महिलाओं की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया गया लेकिन बात आज भी वही है. खुलकर अपनी
ज़रूरतों का इज़हार करने और फिल्मों में सशक्त रूप में दिखाए जाने के बावजूद अभी भी
शॉपिंग और पिक्चर दिखाने की ड्यूटी केवल हीरो की ही है. कहना ग़लत न होगा कि समाज मे जनमत का निर्माण करने मे फिल्मों की एक बड़ी
भूमिका है. फिल्मे बदलाव का एक रास्ता दिखाती हैं लेकिन गीतकार जब फिल्म की नायिका
को सोच कर गाने लिखता है तो अभी भी वही अठारह वीं शताब्दी की नायिका की ही झलक
मिलती है जहां वे अपने होने वाले पति या अपने साजन से खुद की इच्छाओं की पूर्ति
करने की अपेक्षा करती हुई दिखाई जाती हैं.
ज़मीनी हकीकत इससे
कहीं अलग है. हमारे देश मे इन्द्रा नूई, सानिया मिर्ज़ा,साहना नेहवाल, चंदा कोचर, अरुंधती भट्टाचार्य जैसी महिलाएं
हैं जो सशक्त महिलाओं का नेतृत्व करती हैं. ये महिलाएं देश की प्रगति मे अनवरत
अपना योगदान दे रही हैं. ओईसीडी इकनोमिक सर्वे ऑफ़ इंडिया के मुताबिक भारत में
महिला उद्यमियों की संख्या लगातार बढ़ रही है. विशेषकर उत्पादन के क्षेत्र में जहाँ
यह हिस्सेदारी चालीस प्रतिशत के आसपास है. एक समान समाज के लिए इसे एक अच्छी
शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है. एक वक़्त था जब आधी आबादी देश की जीडीपी में
बहुत अधिक हिस्सेदारी नहीं रखती थी. लेकिन अब महिलायें भी टैक्स अदा करने वालों की
लिस्ट में बढ़ती जा रही है. जब समाज में इतना बदलाव आ गया तो सिनेमा के गाने वहीँ
क्यों हैं. शायद यह कोई बहुत बड़ा मुद्दा नहीं है लेकिन
बड़ा मुद्दा ये है कि अगर महिला सशक्त हो तो पूरी तरह से हो. समाज में भी और
फिल्मों में भी. आधी चीज़ों में वह सशक्त कहलाये और बाकी आधी में निर्भर, यह तो ग़लत होगा न. अगर समाज बदल रहा है तो महिलाओं का अपनी जिंदगी को
देखने का यह दृष्टिकोण भी बदलना चाहिए. लड़कियां खुद को नए नज़रिए से देखना शुरू
करें जहाँ वे किसी की प्रेमिका और पत्नी होने के अलावा भी अपनी पहचान रखती हैं. वे
भी टैक्स अदा करती हैं, देश के आर्थिक विकास में अपना
योगदान देती हैं और सिर्फ़ होममेकर ही नहीं एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का भी फ़र्ज़
अदा करती हैं. आप बदलेंगे तो समाज बदलेगा और धीरे धीरे फिल्मों के गाने के अंदाजे बयां भी बदलेंगें और फिर ऐसे गाने सुनते वक्त मेरी जैसी किसी
लडकी के मन में ये सवाल नहीं उभरेगा कि लड़कियां किसी लड़के को खुद क्यूँ कुछ नहीं
दे सकती वे हमेशा मांगती क्यों रहती हैं तो मेरी जैसी आज की भारत की लड़कियां अपना
हक़ मांग कर नहीं छीन कर लेंगीं |क्यों आपको क्या लगता है ?
Dec 14, 2014
हम अपनी ही सुरक्षा के प्रति गंभीर नहीं..
नहीं
नहीं, मैं नहीं लगा सकता मेरा सर दुखता है, वैसे मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है लेकिन
बस घुटन महसूस होती है, साइड का नहीं दिखता बड़ी दिक्कत होती है, मेरे बाल ख़राब हो
जाते हैं यहाँ तक कि एक बार भी लगाओ तो झड़ने लगते हैं, सर पर इतना बड़ा बोझ लेकर
नहीं चल सकती मैं, अरे ठीक है अब भाषण न दिया करो.
ये
हैं कुछ बहाने, हेलमेट न लगाने के. फिर से पढ़िए ज़रा. सारे बहाने सिर्फ इसलिए हैं
जिससे हेलमेट न लगाने को सही साबित किया जा सके और दूसरे को इसे न लगाने के कारण
गिनाये जा सकें.
इंटरनेशनल
आर्गेनाईजेशन ऑफ़ मोटर व्हीकल मेनुफेक्चर्स 2013 के आंकड़ों के अनुसार भारत दुनिया
में दो पहिया वाहन बनाने वाला दूसरा सबसे बड़ा देश है. हमारे देश में लगभग 15
मिलियन लोग दो पहिया वाहन चलाते हैं. नियमों के अनुसार इतने ही लोगों को हेलमेट भी
लगाना चाहिए लेकिन वास्तव में हेलमेट लगाने वाले संख्या में कम हैं. कुछ लोग सिर्फ
इसलिए हेलमेट लगाते हैं कि चालान न कट जाए. उनके लिए सुरक्षा कोई बड़ा मुद्दा नहीं
है. पिछले दिनों सितम्बर में सरकार ने एक आदेश निकला जिसके तहत बिना हेलमेट वाले
दुपहिया वहां और बिना सीट बेल्ट के कार चालको को पेट्रोल या डीजल नहीं दिया जायेगा.
अगले दिन अख़बार में बिना हेलमेट और सीट बेल्ट के बहुत से लोग पेट्रोल लेते नज़र
आये. उसके बाद से आज तक ले रहे हैं. उसके पहले सरकार ने महिलाओं और बच्चों के लिए
भी हेलमेट पहनना अनिवार्य कर दिया. सरकार आदेश निकालकर ने अपना काम किया अच्छी बात
है लेकिन यहाँ अखरने वाली बात ये है कि हमे इस तरह के आदेशों की ज़रुरत क्यों पढ़ती
है बार बार. हमारे देश में कोई भी अच्छी आदत केवल क़ानून के डर से ही ही लोग अपनाते
हैं. नियमों को मानने से अधिक उन्हें तोड़ने और बचने के लिए रसूख़ के इस्तेमाल पर
अधिक ध्यान होता है.
एनसीआरबी
के आंकड़ों के आधार पर बात करें तो 2013 में हर दिन सड़क दुर्घटना में 377 लोगों की
जाने गयीं और 1287 लोग घायल हुए. गौर करने वाली बात ये है कि ये आंकड़ा आज भी जस का
तस है. इसके पीछे की वजह केवल स्वयं की सुरक्षा के प्रति लापरवाही भरा रवैया है.
भारत
में नए दो पहिया वाहन के रजिस्ट्रेशन के लिए हेलमेट की रसीद दिखाना अनिवार्य है.
इसका अर्थ ये है कि हेलमेट मजबूरी में ही सही लेना तो पड़ता है लेकिन उसे लगाने की
ज़हमत नहीं उठाना चाहते. इसके लिए उनके पास अपने अपने कारण हैं. इसका अर्थ ये नहीं है कि कोई भी वाहन सवार
हेलमेट नहीं लगाता है, हाँ उनकी संख्या न लगाने वालों से कम है.
ऑस्ट्रेलिया
दुनिया का सबसे पहला देश है जिसने 1989 में साइकिल पर भी हेलमेट लगाने के लिए
क़ानून लागू किया. और सही भी है कि साइकिल वाले भी बेमौत सड़क दुर्घटना में मारे
जाते हैं. हमारे देश में फिलहाल इस तरह का कोई कानून नहीं है.
समस्या
का निदान सिर्फ जनता के अपनी और दूसरे की सुरक्षा के प्रति ज़िम्मेदारी के भाव को
समझकर किया जा सकता है. हर बात के लिए सरकार या प्रशासन को दोषी नहीं माना जा
सकता. देश का ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते ये हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम खुद
भी सुरक्षित रहें और दूसरे को भी सुरक्षित रखें और हेलमेट या सीट बेल्ट सिर्फ आपकी
सुरक्षा के लिए ही है. बाल बचाने या सरदर्द से अधिक जिंदगी बचाना ज़रूरी है.
Jun 14, 2014
एक दोस्त है मेरी. हर वक़्त
चुप रहती है. ज्यादा किसी से बात नहीं करती. हँसी से कोसो दूर उसकी अपनी दुनियां
है जिसमे केवल एक गहरी चुप्पी है. कई बार जानने कि कोशिश पर जवाब नहीं मिला. बहुत
कुरेदने पर जब चुप्पी की वजह पता चली तो शर्मिंदगी और ग़ुस्से से भर गयी. शर्मिंदगी
इसलिए कि हम आज भी ऐसे घिनोने समाज का हिस्सा हैं और ग़ुस्सा अपनी दोस्त पर कि आज
तक वो इतना सब बर्दाश्त क्यों कर रही है. वजह कुछ यूँ थी.. मेरी मित्र २५ लोगों के
एक परिवार मैं रहती है. उसका सगा चाचा बचपन से लेकर आज तक उसका शोषण करता आ रहा
है. बचपन मैं कुछ ज्यादा हद तक, बड़े होने पर चूँकि उसके लिए समस्या हो सकती है
इसलिए सिर्फ घूरने और छेडछाड तक सीमित है. और दोस्त इसलिए चुप है क्यूंकि उसकी
बहिन बहुत छोटी है और वो उसे हर कीमत पर बचाना चाहती है. उसे डर है बता देने पर या
तो परिवार वाले चुप रहने को कहेंगे या कहीं बाहर भेज देंगे. वो इंसान तो आपकी
हरकतों से बाज आने से रहा तो कहीं उसकी बहिन भी इस नीचता का शिकार न हो जाए.
भारत देश में अभी भी बाल
यौन शोषण या चाइल्ड एब्यूज ऐसी समस्या है जिसके बारे में लोग बात नहीं करते या
करना नहीं चाहते . और ये समस्या हर वर्ग के घरो में है. देश ही नहीं विदेशों में
बड़े से बड़े लोगों के नाम समय समय पर अखबारों में सामने आये हैं.
देश के महिला एवं बाल विकास
मंत्रालय द्वारा एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी थी जिसके अनुसार भारत में करीब 53.22 प्रतिशत बच्चे एक या
एक से ज्यादा बार इसका शिकार हुए है. 21.90
प्रतिशत बच्चे यौन शोषण और 50.76 प्रतिशत बच्चे यौन
शोषण के अन्य प्रकारों के शिकार हुए. शर्मिंदा कर देने वाला सच ये भी है कि 50 प्रतिशत बच्चे अपनों के ही
शिकार हुए. ज़्यादातर मामलों में पिता या सगे चाचा ताऊ या मामा ही दोषी थे. रिपोर्ट
के ही मुताबिक अधिकतर बच्चों ने कभी अपना मुह नहीं खोला जैसा कि मेरी दोस्त ने भी
किया. और ऐसा नहीं है कि सिर्फ लड़कियां इस समस्या की शिकार हैं , लड़के भी उतने ही पीड़ित
हैं.
अब इसके ज़िम्मेदार कौन?
सरकार, मंत्री, न्यायपालिका, पुलिस, समाज ? नहीं. ज़िम्मेदार हम. हम सब. सबसे पहले
वो लोग जो अपनी घटिया मानसिकता और मानसिक बीमारी का शिकार इन बच्चों को बनाते हैं.
दूसरे वो लोग जो अपने बच्चों पर भरोसा न करके उन्हें या तो डांट देते हैं या चुप
रहने को कहते हैं. तीसरे वो लोग जो इसके खिलाफ सिर्फ इसलिए आवाज़ नहीं उठाते
क्यूंकि समाज क्या कहेगा या फलां व्यक्ति उनका रिश्तेदार है या अपना है. समय समय
पर टीवी और फिल्मों के ज़रिये इस समस्या के बारे में कहा गया, दिखाया गया पर समस्या
आज भी जस की तस है. कम से कम अपनी दोस्त के बारे में जाने के बाद मैं ये कह सकती
हूँ. हम दोहरे व्यक्तित्व वाले समाज में जीते हैं जहाँ एक तरह बच्चे को हर धर्म
में भगवान का रूप बताया जाता है और उसी धर्म के अनुयायी अपने खुद के बच्चों को भी
नहीं बक्शते.
पिछले कुछ दिनों से भारत के
बच्चे बच्चे की जुबां पर है कि अच्छे दिन आने वाले हैं. भारत का हर एक नागरिक अपने
अच्छे दिनों के ख्वाब देख रहा है. अब इनके भी अच्छे दिनों की बारी आनी चाहिए जिससे
किसी भी बच्चे का कोई बीता कल उसे न ही डराए न ही चुप रहने पर मजबूर करे.जो लोग
दोषी हैं उनकी सजा भी आपको तय करनी होगी. जो आपके साथ हुआ, या आपके बच्चों के साथ
हो रहा है वो आगे किसी के साथ न हो या आपके बच्चा इस सदमे से उबार जाए इसकी भी
कोशिश आपको ही करनी होगी. ज़्यादातर घरों में बच्चे से खुलकर बात नहीं की जाती न ही
उसकी बातों को ज्यादा महत्व दिया जाता है इसलिए बच्चा बेख़ौफ़ आपको अपने साथ हुई
ज्यादती के बारे में बता सके, ऐसा माहौल भी आपको ही बनाना होगा जिससे किसी भी
मासूम को खुद से आँखें चुराकर न जीना पड़े. खुलकर बोलने से ही बात बन पाएगी. आप भी
बोलिए और अपने बच्चों को भी बोलने का मौका दीजिये. अपनी उस जैसी हर दोस्त से भी
मैं कहूँगी वक़्त आने का इंतजार मत कीजिये. यही समय सही है. किसी और का घोला हुआ
ज़हर क्यों पीना. बात करिए. चुप रहने से कुछ नहीं होगा. बात करना तो बनता है अब.
जिंदगी आपकी तो बेख़ौफ़ जीने का हक भी सिर्फ आपका है.
Apr 1, 2014
बेख़बर आज़ाद जीना है मुझे...
फिल्मों में ये देखकर कि किस तरह हीरो बना एक आम आदमी इतने सारे बुरे लोगो पर भारी पड़ता है. बहुत अच्छा लगता है जब वो भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ लड़ता है. अपने परिवार की रक्षा करता है जाहिर है किसी भी आम आदमी को ये देखकर अच्छा ही लगेगा कि कोई तो है जो अच्छा सोचता है और करता है. फिल्म में ही सही.नहीं नहीं मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ. मैं बस आप सभी से अपने कुछ ओब्ज़र्वेशन शेयर करना चाहती हूँ. जो काम अक्सर फिल्म मैं एक एक हीरो करता है अगर वही काम एक एक आम लड़की करना चाहे, मसलन लॉन्ग ड्राइव पर जाना दोस्तों के साथ देर रात यूँ ही मटरगश्ती करना,अपने फैसले खुद लेना और जिन्दगी अपनी शर्तों पर जीना.न नहीं कर सकती.
कहा जाता है कि फिल्मे समाज का आइना होती है. बहुत याद करने पर याद आता है कि उँगलियों पर गिनी जानी वाली कुछ फ़िल्में ही ऐसी बनी हैं जिसमे किसी महिला चरित्र को पुरुषों से लड़ते दिखाया गया हो. अब बलात्कार को ही लें किस तरह फ़िल्में जेंडर स्टीरियो टाइपिंग को बढ़ावा देती हैं और हम उसे समाज का सच मान लेते हैं.किसी भी समाज में बलात्कार की जगह नहीं होनी चाहिए और दुर्भाग्य से ऐसा होता भी है तो दोषी स्त्री मानी जाती है और वास्तविक दोषी अपनी मर्दानगी का डंका पीटते हैं. महिला चरित्र खुदखुशी कर लेती है या फिर समाज के तानो का शिकार तब तक होती है जब तक कोई सहृदय पुरुष उसकी ज़िम्मेदारी नहीं उठा लेता या उससे शादी नहीं कर लेता.
अब सवाल ये है कि हम अभी भी ऐसे ही समाज का हिस्सा ही क्यों हैं? क्यों अभी भी महिलाओं के ख़ुशी से जीने के अधिकार एक पुरुष के हाथ में हैं.बात केवल इतनी सी है कि महिलाओं के लिए प्रथाओ और परम्पराओं को बनाने वाले पुरुष ही हैं, महिलाओं के लिए सभी तरह के कानून बनाने वाले पुरुष हैं. परिवार में उनकी जगह का निर्णय लेने वाले भी पुरुष हैं. महिलाओ के अधिकारों की आवाज़ सुनने वाले भी पुरुष हैं.गवर्नेंस में महिलाओं की भागीदारी समाज में महिलाओं की संख्या के मुकाबले नगण्य है जो हैं भी उनके बारे में आमतौर पर माना जाता है कि वो किसी पुरुष की कृपा पर ही राजनीति में आयी हैं . यानि एक आम महिला को अपने आप को साबित करने के लिए पुरुषों के मुकाबले बार बार अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है .संसद में महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण की मांग भी चौदहवीं लोकसभा में अनसुनी रह गयी जब समाज में महिलाओं के लिए निर्णय लेने का अधिकार पुरुषों के पास होगा तो किस प्रकार के बदलाव की उम्मीद करें.अभी महिला दिवस पर एक दिन के लिए महिलाओं को सम्मान दिया गया. पर क्या वाकई महिलाऐं केवल सिर्फ इस एक दिन के सम्मान कि हकदार हैं?हर दिन महिलाओं से हर बात पर अग्नि परीक्षा की उम्मीद की जाती है. रामायण काल से चला आ रही है ये परंपरा. अकेले चलना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने एवरेस्ट फ़तेह करके दिखा दिया. पढ़ना चाहा तो अग्निपरीक्षा,लीजिये हमने हर बार बोर्ड के पेपरों में लड़कों से अव्वल आकर दिखा दिया. उड़ना चाहा तो भी अग्निपरीक्षा, तो लीजिये हमने अंतरिक्ष तक पहुँच कर दिखा दिया. आत्मनिर्भर होना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने सभी शीर्ष कंपनियों का सरताज बनकर दिखा दिया. एक छोटी सी बात समझने में इस समाज को कितने वर्ष और लगेंगे कि अब वो दौर गया जब भगवान्, समाज, परिवार, दुनियां और इज्ज़त का डर दिखाकर लड़कियों को उनकी मंजिलों तक नहीं पहुँचने दिया जाता था . बदलाव हो भी रहा है और आगे भी होगा.
चुनावों की गूँज अब हमारे गलियारों में दस्तक दे रही है. इस बार हम अपना सशक्तिकरण खुद करने की ठान लें. ज्यादा से ज्यादा महिलाएं वोट दें और अपने लिए बेहतर कल का चुनाव करें.
बेख़बर आज़ाद जीना है मुझे, बेख़बर आज़ाद रहना है मुझे.
Oct 1, 2013
जीना इसी का नाम है
एक एक्सपीरियंस शेयर करती हूँ आपसे मेरे सामने के घर की एक महिला ने साइकिल पर अपने लगभग दो साल के बच्चे के साथ जाते हुए एक आदमी को रोका और उसे एक जूते का सेट लाकर दिया। आदमी ने तुरन्त ही उस जूते को अपने बेटे को पहनाने की कोशिश की। जूते बड़े थे, बच्चे का पैर छोटा, पर फिर भी उसने बहुत जतन से वो जूते अपने बच्चे को पहनाये। बच्चे को नई चीज पहनने की जल्दी थी तो थोड़ी कोशिश वो खुद से भी करने लगा। इस पूरे वाकये को मैं देख रही थी पिता के चेहरे पर बच्चे की खुशी का रिफ्लेक्शन साफ देखा जा सकता था और बच्चा नये जूते पाकर भले बड़े ही सही इतना खुश था कि क्या कहने । अब आप कहेंगे कि भई ये तो आम बात है इसमें नया क्या है। नया ये था की मुझे जिन्दगी को देखने का एक अनोखा नजरिया मिला हम समाज के किसी भी तबके से आयें पर हम अपने आत्मसम्मान को जरूर महत्व देते हैं पर यहाँ यह सोचना तो बनता है कि क्या गरीब लोगों का कोई आत्मसम्मान नहीं है ? आत्मसम्मान। सुनने में काफी भारी भरकम शब्द है, नहीं . आत्मसम्ममान का अर्थ होता है स्वयं का सम्मान करना। हर व्यक्ति अपना सम्मान सुरक्षित रखने की कोशिश करता है पर गरीबों को इसकी बलि देना पड़ जाती है। अब सवाल ये है कि गरीब लोग कौन होते हैं? सरकार के मुताबिक गाँवों में 816 रूपये हर महीने से कम कमाने वाले लोग और शहर में 1000 रूपये से कम कमाने वाले लोग गरीबों की श्रेणी में आते हैं। भारत में प्लानिंग कमीशन के मुताबिक करीब बाईस प्रतिशत जनता गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर करती है और सबसे ज्यादा गरीब उत्तरप्रदेश में ही हैं। पूरी जनसंख्या का लगभग तीस प्रतिशत। गरीबी को हटाने के लिए सरकार हर साल बजट में करोड़ों रूपये गरीबों के लिए निकालती है,पर क्या कोई ऐसी योजना है जिनसे वो अपने सम्मान के साथ जीवन बिता सकें ,देखा न सवाल ने थोडा तो परेशान किया आपको अब हर बात के लिए सरकार की ओर क्या ताकना ये तो हम सबकी भी जिम्मेदारी भी बनती है .हमारे घरों में रोजमर्रा के काम करने लोगों को हम तनख्वाह के साथ साथ कभी कभार उतरन भी दे दिया करते हैं और खुश होते हैं कि आज हमने एक नेक काम किया पर क्या ये वाकई एक दान था? जनाब थोड़ा सोचिए, यदि आपने उन्हें उस पुराने कपड़े की बजाय एक नया कपड़ा भले ही सस्ता खरीद कर दे दिया होता तो कितना अच्छा होता। वे अपने आपको कितना सम्मानित महसूस करते आखिर ये वो ही लोग हैं जो हमारे जीवन को आसान बनाते हैं चाहे वो आपका रिक्शावाला हो या बर्तन मांजने वाली बाई । जब आप ब्रांडेड जूतों, कपड़ों, परफ्यूम और अपने प्रिय जनों के जन्मदिन पर हजारों रूपये यूँ ही उड़ा सकते हैं तो घर में काम करने वालों को उतरन ही क्यूँ। किसी गरीब को जाते हुए रोककर बस पुरानी चीजें ही क्यों दें, उन्हें प्यार से बुलाकर अपने साथ एक वक्त का खाना भी खिलाया जा सकता है। आपने अक्सर देखा होगा कि अगर कोई गार्ड या पार्किंग वाला आपको आप ही की गलती पर कुछ कह दे तो आपके आत्मसम्मान को तुरंत ठेस पहुँच जाती है और आप ये बताने से नहीं चूकते कि आप क्या चीज हैं .याद आया न अभी आपने जल्दी ही ऐसी हरकत की थी जबकि वह बेचारा सिर्फ अपना काम ठीक से कर रहा होता है वहीं आप पुराना और आपके लिए बेकार वस्तु को किसी गरीब को देकर उसके आत्मसम्मान को और छोटा कर रहे होते हैं.नहीं भई नहीं, मैं आपको ज्ञान देने की कोशिश नहीं कर रही हँू मैं तो बस ये बता रही हूँ कि इंसान को सम्मान उसके इंसान होने के कारण मिलना चाहिए न की उसके अमीर या गरीब होने से.तो आज से एक कोशिश करते हैंकिसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार ,किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार क्यूंकि जीना इसी का नाम है
Jun 3, 2013
वक़्त है खुद को पहचानने का
लाईफ कितनी हैपनिंग हो गयी है. हर आदमी बिजी है .दिन में घंटे तो चौबीस ही होते हैं और उसी में टी टाइम, ब्रेक टाइम, लंच टाइम, डिनर टाइम इसके अलावा पार्टी टाइम, रोमांस टाइम, आफिस टाइम जैसी चीजें तो हैं ही । लाईफ की इतनी सारी चीजें टाईम से जुडी हुई हैं और टाइम मैनेज करने के चक्कर में हम कितने घनचक्कर बन जाते हैं इसका पता हमें नहीं पड़ता,पर समय की इस कहानी का एक और मजेदार हिस्सा है हमारी प्रायोरिटी यानि हम जो चीज करना चाहते हैं उसके लिए टाईम निकाल ही लेते हैं हम कितने भी व्यस्त क्यूँ न हों एफ बी पर स्टेट्स देते रहते हैं उन दोस्तों के साथ मेसेंजर पर भी जुड़े रहे हैं जिनसे हम बात करना चाहते हैं पर जिनसे बात नहीं करनी ,जिनसे मिलने का मन नहीं उनके लिए रेडीमेड रेमेडी टाईम नहीं है यार.इस टाईम मेनेजमेंट के खेल में कोई एक ऐसा भी होता है जो हमारे लिए सबसे इम्पोर्टेन्ट होता है लेकिन हम उसे लगातार इग्नोर कर रहे होते हैं और वो कोई और नहीं बल्कि हम खुद होते हैं कभी आपने गौर किया कि हम अपने आप को कितना टाईम दे रहे हैं. खुद से अकेले में कुछ देर बात करने के लिए. कुछ देर केवल अपने आप को समझने के लिए। टाईम की कहानी में यहीं से ट्विस्ट शुरू होता है. पढ़ाई हो या फिर नौकरी, हर किसी को जल्दी है. पढ़ने वालों को जल्दी से पैसे कमाने की और नौकरी वालों को एक सुरक्षित और ऊँची पोस्ट पर पहुँचने की और जब ऐसा नहीं होता तो हम स्ट्रेस्ड हो जाते हैं.अपने आप से भागने लगते हैं ऐसी चीजों में समय ज्यादा देने लगते हैं जो वक्ती तौर पर सुकून तो देती हैं पर आपको धीरे धीरे खत्म कर रही होती हैं.मेरी एक मित्र काफी महत्वाकांक्षी किस्म की हैं। पढ़ाई में भी अच्छी थीं पर उन्होंने बिना अपनी क्षमताऐं जाने जल्दी से प्रसिद्धि पाने की चाह में एक टीवी चैनल में नौकरी कर ली. कुछ दिन तो केवल जोश में ही निकल गये लेकिन कुछ दिन बाद उन्हें वहाँ ऊबन होने लगी। धीरे-धीरे काम प्रभावित होने लगा और खुद को प्रूव न कर पाने की सोच ने उनके दिमाग में गहरी जड़ें जमा लीं कि उन्होंने अपना आत्मविश्वास खो दिया जिससे उनका करियर प्रभावित हुआ और वो डिप्रेशन का शिकार हो गयीं.असल में आपको आपके सिवा कोई और नहीं समझ सकता,पर अपने आप को समझने के लिए हमें अपने आप से बात करनी होगी. असल में हर इंसान अपनी क्षमताऐं, खूबियाँ, कमियाँ अच्छे से समझता है .हमें पहले यह पता होना चाहिए कि हम जिंदगी से चाहते क्या हैं बगैर तैरना जाने आप तालाब में इस लिए कूद जायेंगे कि बाकी भी ऐसा ही कर रहे हैं तो आप निश्चित डूबेंगे ही हर इंसान अपने आप में यूनीक होता है तो दूसरों को की कॉपी क्या करना अपनी स्टाईल खुद बनाने का कोई पढ़ाई में अच्छा होता है, कोई खेल में तो कोई गीत संगीत में, लेकिन ये पता कैसे पड़ेगा कि आप क्या कर सकते हैं इसके लिए किसी काउंसलर की जरुरत नहीं है बस थोडा समय अपने आप के लिए निकालिए अच्छा संगीत सुनिए अपनी हौबी को फिर से जिन्दा कीजिये जिसे आप कब का पीछे छोड़ आये हैं फिर देखिये आप अपने आप से कैसे बात कर पायेंगे तो जिन्दगी जीने के फलसफे थोड़ा चेंज कर लेते है. अब अपनी जिन्दगी को किस तरफ ले जाना है, कौन सा विषय पढ़ना है, क्या करियर चुनना है, जॉब में क्या बदलाव लाना है, खुद को दस साल बाद कहाँ देखना है,ये अब किसी से नहीं पूछना है बस टाईम की प्रायरिटी में अपने आपको भी जगह देनी है. यही वक्त है और वक्त सही भी है. इस लेख को पढ़ने के लिए भी आपने टाईम तो निकाल ही लिया न
04.06.13 को आई नेक्स्ट के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित.
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