May 16, 2014



मोदी जी..
आपको बधाई कि अब आप भारत देश के प्रधानमंत्री कहलाये जायेंगे. आपके कारन ही भाजपा को इतनी बड़ी जीत मिल पायी है. आप अब अपने किये हुए वादों को पूरा करने की ओर बढ़ेंगे जैसा कि सब आपसे उम्मीद कर रहे हैं.  कुछ उम्मीदें भारत कि एक आम लड़की भी रखती है आपसे. मैं जानती हूँ कि आप पर उमीदों का बोझ पहले से ही बहुत है पर आपने अच्छे दिनों के आने का ख्वाब दिखाया है तो मैं भी अपने अच्छे दिनों के आने का इंतजार करुँगी. रोज़ रोज़ अखबारों में बलात्कार, लूट और छेड़खानी की खबरें पढ़कर मैं आहत हो चुकी हूँ इसलिए अपनी उम्मीदों का बोझ भी आपके सर डाल रही हूँ.  आपसे कुछ ऐसी उम्मीदें हैं कि :

मुझे एक ऐसा देश चाहिए जहाँ मुझे अपने हक के लिए रिजर्वेशन की ज़रुरत न पड़े. संविधान में मिले बराबरी के अधिकार को मैं खुलकर जी पाऊं. अपने हक के लिए लड़ने पर मुझे दोयम दर्ज़े का कहकर संबोधित न किया जाए.

मैं जब चाहूँ, घर से बाहर ये सोच कर निकल पाऊं कि हाँ मैं सही सलामत, बिना किसी परेशानी के वापस आ जाउंगी और अगर किसी परेशानी मैं फंस भी जाऊ तो पुलिस के पास जाने में मुझे हिचकिचाहट न हो.

एक ऐसा समाज चाहिए जहाँ मुझे गर्व महसूस हो कि मैं लड़की हूँ. हर बार मुझे ये विचार न कचोटे कि काश में एक लड़का होती. मेरे माता पिता को मेरी शादी के लिए अपना बैंक अकाउंट खाली न करना पड़े और इतना खर्च करने के बाद फिर भी दहेज़ की बलि मुझे न चढ़ाया जाए.

मेरी ज़रुरत सिर्फ नवरात्रों तक ही न हो और मेरे हुनर का दायरा सिर्फ रसोईघर और घर गृहस्थी तक ही सीमित न माना जाए. देश और दुनिया से जुड़े मुद्दों पर मेरी राय को सिर्फ इसलिए न नकारा जाए क्यूंकि मैं एक लड़की हूँ और लड़कियां तो बोलती ही रहती हैं.

अपनी पसंद का करियर चुनने में मुझे अपने लड़की होने को ध्यान में न रखना पड़े. रोज़गार के अवसरों में मेरे लड़की होने को नहीं वरन काबिल होने को ध्यान में रखा जाए.

ट्रेन या बस में शहर से बाहर जाते वक़्त मेरे माता पिता को कभी ये फिकर न करनी पड़े कि मेरी बेटी सही वक़्त और सही तरीके से पहुंची होगी कि नहीं.

आशा करती हूँ कि आप इस आम भारतीय लड़की की इन उम्मीदों को पूरा करने के लिए ईमानदारी से प्रयास करेंगे और मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि अपने आपको साबित करने में कोई कसर नहीं छोडूंगी.


Apr 1, 2014

बेख़बर आज़ाद जीना है मुझे...



































फिल्मों में ये देखकर कि किस तरह हीरो बना  एक आम आदमी इतने सारे बुरे लोगो पर भारी पड़ता है. बहुत अच्छा लगता है जब वो भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ लड़ता है. अपने परिवार की रक्षा करता है जाहिर है किसी भी आम आदमी को ये देखकर अच्छा ही लगेगा कि कोई तो है जो अच्छा सोचता है और करता है. फिल्म में ही सही.नहीं नहीं मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ. मैं बस आप सभी से अपने कुछ ओब्ज़र्वेशन शेयर करना चाहती हूँ. जो काम अक्सर  फिल्म मैं एक एक हीरो करता है  अगर वही काम एक एक आम लड़की करना चाहे, मसलन लॉन्ग ड्राइव पर जाना दोस्तों के साथ देर रात यूँ ही मटरगश्ती करना,अपने फैसले खुद लेना और जिन्दगी अपनी शर्तों पर जीना.न नहीं कर सकती.
कहा जाता है कि फिल्मे समाज का आइना होती है. बहुत याद करने पर याद आता है कि उँगलियों पर गिनी जानी वाली कुछ फ़िल्में ही ऐसी बनी हैं जिसमे किसी महिला चरित्र को पुरुषों से लड़ते दिखाया गया हो. अब बलात्कार को ही लें किस तरह फ़िल्में जेंडर स्टीरियो टाइपिंग को बढ़ावा देती हैं और हम उसे समाज का सच मान लेते हैं.किसी भी समाज में बलात्कार की जगह नहीं होनी चाहिए और दुर्भाग्य से ऐसा होता भी है तो दोषी स्त्री मानी जाती है और वास्तविक दोषी अपनी मर्दानगी का डंका पीटते हैं. महिला चरित्र खुदखुशी कर लेती है या फिर समाज के तानो का शिकार तब तक होती है जब तक कोई सहृदय पुरुष उसकी ज़िम्मेदारी नहीं उठा लेता या उससे शादी नहीं कर लेता.
अब सवाल ये है कि हम अभी भी ऐसे ही समाज का हिस्सा ही  क्यों हैंक्यों अभी भी महिलाओं के ख़ुशी से जीने के अधिकार एक पुरुष के हाथ में हैं.बात केवल इतनी सी है कि महिलाओं के लिए प्रथाओ और परम्पराओं को बनाने वाले पुरुष ही हैंमहिलाओं के लिए सभी तरह के कानून बनाने वाले पुरुष हैं. परिवार में उनकी जगह का निर्णय लेने वाले भी पुरुष हैं. महिलाओ के अधिकारों की आवाज़ सुनने वाले भी पुरुष हैं.गवर्नेंस में महिलाओं की भागीदारी समाज में महिलाओं की संख्या के मुकाबले नगण्य है जो हैं भी उनके बारे में आमतौर पर माना जाता है कि वो किसी पुरुष की कृपा पर ही राजनीति में आयी हैं . यानि एक आम महिला को अपने आप को साबित करने के लिए पुरुषों के मुकाबले बार बार अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है .संसद में महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण की मांग भी चौदहवीं लोकसभा में अनसुनी रह गयी  जब समाज में महिलाओं के लिए निर्णय लेने का अधिकार पुरुषों के पास होगा तो किस प्रकार के बदलाव  की उम्मीद करें.अभी महिला दिवस पर एक दिन के लिए महिलाओं को सम्मान दिया गया. पर क्या वाकई महिलाऐं केवल सिर्फ इस एक दिन के सम्मान कि हकदार हैं?हर दिन महिलाओं से हर बात पर अग्नि परीक्षा की उम्मीद की जाती है. रामायण काल से चला आ रही है ये परंपरा. अकेले चलना चाहा तो अग्निपरीक्षालीजिये हमने एवरेस्ट फ़तेह करके दिखा दिया. पढ़ना चाहा तो अग्निपरीक्षा,लीजिये हमने हर बार बोर्ड के पेपरों में लड़कों से अव्वल आकर दिखा दिया. उड़ना चाहा तो भी अग्निपरीक्षातो लीजिये हमने अंतरिक्ष तक पहुँच कर दिखा दिया. आत्मनिर्भर होना चाहा तो अग्निपरीक्षालीजिये हमने सभी शीर्ष कंपनियों का सरताज बनकर दिखा दिया. एक छोटी सी बात समझने में इस समाज को कितने वर्ष और लगेंगे कि अब वो दौर गया जब भगवान्समाजपरिवारदुनियां और इज्ज़त का डर दिखाकर लड़कियों को उनकी मंजिलों तक नहीं  पहुँचने दिया जाता था . बदलाव हो भी रहा है और आगे भी होगा.
चुनावों की गूँज अब हमारे गलियारों में दस्तक दे रही है. इस बार हम अपना सशक्तिकरण खुद करने की ठान लें. ज्यादा से ज्यादा महिलाएं वोट दें और अपने लिए बेहतर कल का चुनाव करें.
बेख़बर आज़ाद जीना है मुझे,  बेख़बर आज़ाद रहना है मुझे.

Mar 21, 2014

Finally... तुम मिल गए



कल अचानक एक पुराने दोस्त से बात हुई. हम 8 साल बाद बात बात कर रहे थे, 3 घंटे, उफ्फ्फ... याद भी नहीं कि पिछली बार किसी से इतनी लम्बी बात कब हुई थी, वक़्त का पता ही नहीं चला. हम बातें करते गए, ऐसा लग रहा था कि बताने को कुछ रह ना जाए. 8 सालों में हम दोनों की जिंदगी में जो कुछ भी हुआ, हम एक दूसरे को सब बता देना चाहते थे, कौन नया आया, कौन गया, कितने दोस्त बने, किसे धोखा दिया, किसने तंग किया, पढाई कहाँ की, जॉब कैसी चल रही है.. फ़ोन में घुसकर उसके पास पहुँच जाने का मन कर रहा था, प्लानिंग होने लगी, कैसे मिलना है, कहाँ मिलना है, मिलेंगे तो कहाँ कहाँ घूमेंगे, कैसे वक़्त बिताएंगे.. ख़ुशी का आलम ये था कि अगर फ़ोन से जाने का कोई तरीका होता तो वो अमल में लाया जा चुका होता. उसने कहा.. वक़्त कितनी जल्दी गुज़र गया न, पता ही नहीं चला, ऐसे लग रहा है जैसे कल की ही बात हो. ये छोटी सी बात उसने यूँ ही कही, लेकिन वाकई वक़्त कितना जल्दी गुज़र जाता है, और इस वक़्त की  आपाधापी में हम भूल जाते हैं कि कुछ अपने पीछे छूट गए. वो लोग जो जिनके चेहरे की ख़ुशी की वजह आप ही हैं. बस हम समझ नहीं पाए. बड़े मुकाम हासिल करने कि चाह में उन अपनों की सुधि ही नहीं ली. आज टेक्नोलॉजी बूम के दौर में हम टच में रहने की बजाय आउट ऑफ़ टच होते जा रहे हैं. हमारे पास इतने सारे एप्प्स हैं फिर भी हम रिश्ते सम्हालने में नाकाम हो जाते हैं. आप ही सोचिये कि जब कुछ स्माइली हमारे इमोशन को बयां करती हैं, तो कैसे हम उन रिश्तों को सहेज पायेंगे. इन एप्प्स के चक्कर में हम भूल जाते हैं कि दोस्ती वर्चुअल कभी नहीं हो सकती. मुझे अच्छे से पता है कि आपको ज्ञान लेना पसंद नहीं है. तो सिर्फ एक छोटा सा काम करते हैं. 
, थोड़ी देर के लिए हम कुछ वक़्त पहले की दुनियां में चलते हैं जब हमारी जिंदगी में दोस्तों की  जगह एप्प्स ने नहीं ली थी. थोडा सा वक़्त निकलते हैं उन पुराने दोस्तों के लिए जो आपकी मुस्कराहट के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे. थोड़ी देर उन दोस्तों के साथ बचपन को जीकर देखते हैं. बिना मिलावट की हँसी हसकर देखते हैं.. अपने पुराने रिश्तों को फिर से जिंदा करने की कोशिश करते हैं, और जब आप ये कर लेंगे तो यकीन मानिए आप खुद को पहले से ज्यादा सुकून में पायेंगे. पहले से ज्यादा खुश पायेंगे, और..
ख़ुशी सिर्फ तभी मिलेगी जब आप ख़ुशी को पहचानना सीख लेंगे.    


Mar 13, 2014

बस यूँ ही

कभी कभी सोचती हूँ कि जिंदगी यूँ न होती तो कैसी होती. आप उम्मीदों के साथ आगे बढ़ते हैं, खुद के लिए एक मुकाम तय करते हैं, टूटते हैं, बिखरते हैं, फिर उठ खड़े होते हैं और फिर खुद से नयी उम्मीदें पालते हैं. कहते हैं न कि चलती का नाम जिंदगी.


Mar 9, 2014

आप सोचिये

हॉल में जाने का मौका नहीं मिला तो मैंने लैपटॉप पर कल जय हो देखी. अच्छी लगी. बहुत ख़ुशी हुई ये देखकर कि किस तरह एक आम आदमी इतने सारे बुरे लोगो पर भारी पड़ता है. बहुत अच्छा लगता है जब वो भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ लड़ता है. अपने परिवार की रक्षा करता है खासकर आपनी बहिन की जब फिल्म में एक बुरे चरित्र का व्यक्ति उसकी इज्ज़त पर हाथ डालता है. ज़ाहिर है कि किसी भी आम इंसान को ये देखकर अच्छा ही लगेगा कि कोई तो है जो अच्छा सोचता है और करता है. फिल्म में ही सही.
नहीं नहीं मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ. मैं बस आप सभी से अपने कुछ ओब्ज़र्वेशन शेयर करना चाहती हूँ.

एक सवाल : जो काम उस फिल्म मैं एक हीरो ने किया अगर वही काम एक लड़की करना चाहे तो. एक आम लड़की, जिसके दिल में देश के लिए बेपनाह मोहब्बत है, जो दुखी लोगो को देखकर खुद भी दुखी होती है और उनकी मदद की हरसंभव कोशिश करती है. उसे भी भ्रष्ट राजनेताओं से उतनी ही चिढ़ है, इस सिस्टम के खिलाफ वो भी लड़ना चाहती है पर वो नहीं कर सकती. क्यों ?
जवाब: वैदिक संस्कृति के इस देश में लड़कियों को देवियों का दर्ज़ा तो दे दिया गया लेकिन सिर्फ दर्ज़ा दिया गया, माना नहीं गया. अगर कोई भी लड़की समाज द्वारा बताई गयी उसकी हदों से बहार जाकर कोई काम करना चाहे या करती है तो सबसे पहला काम कि उसके चरित्र का हनन कर दिया जाए. ऐसा कुछ कहा जाए कि वो अपनी नज़रों में ही गिर जाए. इससे काम न चले तो उसके शरीर को हथियार बनाओ. भगवान् ने उसे ऐसा शरीर दिया ही इसीलिये है कि जब जैसी ज़रुरत पड़े, इस्तेमाल करो. इसके बाद भी अगर कुछ कहने की हिम्मत करे तो सामूहिक या अप्राकृतिक बलात्कार जैसे अस्त्र कब काम आयेंगे. इसके बाद उसकी जान ले लेना ही एकमात्र उपाय बचता है जो कि आजकल के दौर में आसान भी है.
थोडा हैवी हो गया ना. होने दीजिये बेहतर है. हर बार चीज़ों को ज्यादा लाइट लेते लेते हम अपनी इंसान होने की जिम्मेदारियां भी भूलते जा रहे हैं शायद. हमारा काम सिर्फ ख़बरें पढ़ लेना और उन पर अफ़सोस भर कर लेना रह गया है. ज्यादा दुःख हुआ तो एक कैंडल मार्च निकल कर तसल्ली दे ली खुद को.
अब एक और सवाल: लड़कियों के सम्मान और मर्यादा के लिए इतनी बातें लिखी जाती है, सुनाई जाती हैं, दिखाई जाती हैं, फिर भी ऐसा क्या है जो आपको रोकता है सही को सही या ग़लत को ग़लत कहने से. इसका जवाब तो अब आपके पास ही होगा.
ये सिर्फ हमारे ही देश में हो सकता है कि नवरात्रों में माता के पूर्ण आशीर्वाद के लिए हम नौ दिन कन्या खिला सकते हैं पर एक कन्या को जन्म नहीं लेने देना चाहते.
अपनी बेटी को विदा करते वक़्त अपने खाली बैंक अकाउंट के लिए ससुराल वालों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं पर वही बैंक अकाउंट भरने के लिए दहेज़ लेने और बहू को गाहे बगाहे तंग करने से नहीं चूकते.
बचपन से लड़कियों को राधा और दुर्गा के रूप में देखकर खुश होते हैं पर ना तो राधा की तरह उन्हें प्यार करने का हक़ है और ना ही दुर्गा कि तरह अपनी शक्तियों को पहचानने का.
किसी भी लड़की को जीने के लिए एक पति नाम के सहारे कि ज़रुरत होती है. हसने वाली ही बात है कि बचपन में देवी रूप में पूजी गयी कन्या को ख़ुशी भी एक सहारे से नसीब होगी और इस नियम के विरूद्ध जाने कि कोशिश कि तो वही एक हथियार.. चरित्रहनन .
लड़कियों से हर बात पर अग्नि परीक्षा की उम्मीद की जाती है. रामायण काल से चला आ रही है ये परंपरा. अकेले चलना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने एवरेस्ट फ़तेह करके दिखा दिया. पढ़ना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने हर बार बोर्ड के पेपरों में लड़कों से अव्वल आकर दिखा दिया. उड़ना चाहा तो भी अग्निपरीक्षा, तो लीजिये हमने अंतरिक्ष तक पहुँच कर दिखा दिया. आत्मनिर्भर होना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने सभी शीर्ष कंपनियों का सरताज बनकर दिखा दिया. एक छोटी सी बात समझने में इस समाज को कितने वर्ष और लगेंगे कि अब वो दौर गया जब भगवान्, समाज, परिवार, दुनियां और इज्ज़त का डर दिखाकर लड़कियों को उनकी मंजिलों तक ना पहुँचने दिया जाता था . बदलाव हो भी रहा है और आगे भी होगा. 
मैं वही एक लड़की हूँ, एक आम लड़की, जिसके दिल में देश के लिए बेपनाह मोहब्बत है, जो दुखी लोगो को देखकर खुद भी दुखी होती है और उनकी मदद की हरसंभव कोशिश करती है. उसे भी भ्रष्ट राजनेताओं से उतनी ही चिढ़ है, इस सिस्टम के खिलाफ वो भी लड़ना चाहती है पर लड़ नहीं सकती. क्यों?
आप सोचिये.


Jan 27, 2014

JAI HIND

आजकल व्हाटसेप्प पर ये मेसेज खूब फॉरवर्ड किया जा रहा है. Please read once. 

MUST READ..!

Some facts you may not be knowing about INDIANS |

1. 38% of doctors in America are INDIANS.

2. 12% of the scientist in America are INDIANS.

3. 28% of the IBM employees in the world are INDIANS.

4. 36% of the NASA employees are INDIANS.

5. 17% of the INTEL employees in the world are INDIANS.

6. 34% of the MICROSOFT employees are INDIANS.

7. Sanskrit is the mother language of all the European languages. WHICH MEANS SWEDISH TOO.

8. SANSKRIT is most suitable language for computer software reported in Forbes magazine, 1987.

9. CHESS was invented in INDIA.

10. Creator and founder of HOTMAIL is INDIAN (SABEER BHATIA).

11. Aryabhatta who was from INDIA, invented the number ZERO.

12. INDIANS invented the NUMBER SYSTEM.

13. ALGEBRA was invented in INDIA.

14. CALCULAS and TRIGNOMETRY came from INDIA.

15. The general manager of HEWLETT PACKARD (HP) is INDIAN (RAJIV GUPTA).

16. Creator of the PENTIUM CHIP(90% of the today's Computer runs on it) is INDIAN (VINOD DAHM).

17. BHUDHYANA first calculated the value of pi (3.14), and he explained the concept of what is known as the Pythagorean theorem. he discovered this in the 6th century long before the European mathematicians.

18. We have almost 5600 different newspapers and 3500 different magazines with approximately 120 million readers every day.

19. SUSHRUTA (from india) is the father of SURGERY. 2600 year ago he and health scientist of his time conducted complicated surgeries like --> artificial limbs, fractures, urinarystones and even plastic surgery and brain surgery

20. LAXMI MITTAL (steel king) is the richest man in ENGLAND. His house in England is the most expensive house in the world, more than 70 million pounds.

21. ALBERT EINSTEIN once said:- We own a lot to the INDIANS,who taught us how to count, without which no worthwhile scientific have been made.

22. INDIA has the THIRD largest army in the world with more than 105 million men......

I'm Proud To Be An Indian...) |
Happy republic day in Advance to All my fellow Indians
|Jai Hind |

आजकल व्हाटसेप्प पर ये मेसेज खूब फॉरवर्ड किया जा रहा है।
मुझे इस मेसेज से किसी तरह की कोई प्रॉब्लम नहीं है। प्रॉब्लम बस इस बात से है कि क्या यही मेसेज हम हर बार फॉरवर्ड करते रहेंगे या इस लिस्ट में आगे कुछ जोड़ने का प्रयास भी करेंगे। क्या केवल 22 उपलब्धियां ही रहेंगी फ़क्र करने के लिए ?
हम भारतीयों की इसी आदत से आज तक हम विकासशील देश कहे जाते हैं. सिर्फ इतिहास को पकड़ कर बैठे रहते हैं. देश कहने को युवा देश है पर 15 अगस्त या 26 जनुअरी पर युवा सिर्फ मेसेज फॉरवर्ड करने को अपनी ज़िम्मेदारी समझते हैं।
दोस्तों अभी हम सभी को बहुत मेहनत करनी है। अपने देश को महिलाओं के लिए एक सुरक्षित राष्ट्र बनाना है , देश की राजनीति में अपना योगदान देना है, देश से अशिक्षा को मिटाना है , समानो में समानता के अधिकार के लिए कार्य करना है, दूसरे देशों से आने वाले अतिथियों को सुरक्षा व सम्मान के दिए हुए वादे को पूरा करने मैं मदद करनी है और भी ऐसे बहुत सारे काम हैं जो अभी इस देश कि बेहतरी के लिए करने हैं. ये केवल छुट्टी का दिन नहीं है.
देश के स्वतंत्रता सेनानियों और सैनिकों का लहू बहा है जिससे आप सुरक्षित जी सकें।

I hope u'll pay a little bit attention to my words. Please contribute to make our country The "BEST" country in the world.

JAI HIND

Oct 1, 2013

जीना इसी का नाम है


एक एक्सपीरियंस शेयर करती हूँ आपसे  मेरे सामने के घर की एक महिला ने साइकिल पर अपने लगभग दो साल के बच्चे के साथ जाते हुए एक आदमी को रोका और उसे एक जूते का सेट लाकर दिया। आदमी ने तुरन्त ही उस जूते को अपने बेटे को पहनाने की कोशिश की। जूते बड़े थेबच्चे का पैर छोटा, पर फिर भी उसने बहुत जतन से वो जूते अपने बच्चे को पहनाये। बच्चे को नई चीज पहनने की जल्दी थी तो थोड़ी  कोशिश वो खुद से भी करने लगा। इस पूरे वाकये को मैं देख रही थी पिता के चेहरे पर बच्चे की खुशी का रिफ्लेक्शन साफ देखा जा सकता था और बच्चा नये जूते पाकर भले बड़े ही सही इतना खुश था कि क्या कहने । अब आप कहेंगे कि भई ये तो आम बात है इसमें नया क्या है। नया ये था की मुझे जिन्दगी को देखने का एक अनोखा नजरिया मिला  हम समाज के किसी भी तबके से आयें पर हम अपने आत्मसम्मान को जरूर महत्व देते हैं पर यहाँ यह सोचना तो बनता है कि क्या गरीब लोगों का कोई आत्मसम्मान नहीं है आत्मसम्मान। सुनने में काफी भारी भरकम शब्द है, नहीं . आत्मसम्ममान का अर्थ होता है स्वयं का सम्मान करना। हर व्यक्ति अपना सम्मान सुरक्षित रखने की कोशिश करता है पर गरीबों को इसकी बलि देना पड़ जाती है। अब सवाल ये है कि गरीब लोग कौन होते हैंसरकार के मुताबिक गाँवों में 816 रूपये हर महीने से कम कमाने वाले लोग और शहर में 1000 रूपये से कम कमाने वाले लोग गरीबों की श्रेणी में आते हैं। भारत में प्लानिंग कमीशन के मुताबिक करीब बाईस  प्रतिशत जनता गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर करती है और सबसे ज्यादा गरीब उत्तरप्रदेश में ही हैं। पूरी जनसंख्या का लगभग तीस प्रतिशत। गरीबी को हटाने के लिए सरकार हर साल बजट में करोड़ों रूपये गरीबों के लिए निकालती है,पर क्या कोई ऐसी योजना है जिनसे वो अपने सम्मान के साथ जीवन बिता सकें ,देखा न सवाल ने थोडा तो परेशान किया आपको अब हर बात के लिए सरकार की ओर क्या ताकना ये तो हम सबकी भी जिम्मेदारी भी बनती है .हमारे घरों में रोजमर्रा के काम करने लोगों को  हम तनख्वाह के साथ साथ कभी कभार उतरन भी दे दिया करते हैं और खुश होते हैं कि आज हमने एक नेक काम किया  पर क्या ये वाकई एक दान थाजनाब थोड़ा सोचिएयदि आपने उन्हें उस पुराने कपड़े की बजाय एक नया कपड़ा भले ही सस्ता खरीद कर दे दिया होता तो कितना अच्छा होता। वे अपने आपको कितना सम्मानित महसूस करते आखिर ये वो ही लोग हैं जो हमारे जीवन को आसान बनाते हैं चाहे वो आपका रिक्शावाला हो या बर्तन मांजने वाली बाई । जब आप ब्रांडेड जूतोंकपड़ोंपरफ्यूम और अपने प्रिय जनों के जन्मदिन पर हजारों रूपये यूँ ही उड़ा सकते हैं तो घर में काम करने वालों को उतरन ही क्यूँ। किसी गरीब को जाते हुए रोककर बस पुरानी चीजें ही क्यों देंउन्हें प्यार से बुलाकर अपने साथ एक वक्त का खाना भी खिलाया जा सकता है। आपने अक्सर देखा होगा कि अगर कोई गार्ड या पार्किंग वाला आपको आप ही की गलती पर कुछ कह दे तो आपके आत्मसम्मान को तुरंत ठेस पहुँच जाती है और आप ये बताने से नहीं चूकते कि आप क्या चीज हैं .याद आया न अभी आपने जल्दी ही ऐसी हरकत की थी जबकि वह बेचारा सिर्फ अपना काम ठीक से कर रहा होता है वहीं आप पुराना और आपके लिए बेकार वस्तु को किसी गरीब को देकर उसके आत्मसम्मान को और छोटा कर रहे होते हैं.नहीं भई नहींमैं आपको ज्ञान देने की कोशिश नहीं कर रही हँू मैं तो बस ये बता रही हूँ कि इंसान को सम्मान उसके इंसान होने के कारण मिलना चाहिए न की उसके अमीर या गरीब होने से.तो आज से एक कोशिश करते हैंकिसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार ,किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार क्यूंकि जीना इसी का नाम है