Aug 6, 2014

आज एक लड़की से मिली.. बेहद खूबसूरत..

आज एक लड़की से मिली.. बेहद खूबसूरत..
हुआ यूँ कि मेरी एक दोस्त ने नया घर खरीदा.. उसके घर के लिए ज़रुरत का सामान लेने हम एक दुकान पर गए.. वहां पर मैं उससे मिली ..
शादी नहीं हुई थी अब तक उसकी.. और उसमे खास दिखने वाली कोई बात भी नहीं थी...
उसने बहुत ही पुराने स्टाइल का सूट पहन रखा था.. वो भी आउटडेटेड.. फैशन की कोई समझ नहीं थी.. लेकिन हाँ.. दुकान के हर सामान और उसकी कीमत की पूरी जानकारी थी..
शायद ही वो कभी पार्लर जाती होगी .. मैंने देखा कि उसके हाथों पर जलने के निशान थे.. जगह जगह बड़े काले धब्बे थे.. बेहद पतली दुबली.. ज्यादा पढ़ी भी नहीं थी.. पढ़ नहीं पाई होगी शायद.
लेकिन वो बहुत खूबसूरत थी... उसने २ छोटे छोटे क्लिप्स लगा रखे थे जो उसे और खूबसूरत बना रहे थे.. और एक चीज़ जो सबसे सुन्दर थी.. वो थी उसकी मुस्कराहट.. एक हल्की मुस्कराहट के साथ हर सामान को बेहद करीने से निकलना.. दिखाना और मुस्कुराकर पूछना इसमें और रंग दिखा दूँ आपको?
ऐसा बिलकुल भी नहीं था कि सिर्फ दुकान पर होने कि वजह से उसे जबरन मुस्कुराना पड़ रहा हो.. वो मुस्कराहट जैसे उस चेहरे के लिए ही थी.. न शिकन , न थकान सिर्फ दुकान का काम. हर बात को धीमी , सधी हुई और मिठास भरी आवाज़ के साथ बोलना और कुछ भी मांगने पर उसी मुस्कराहट के साथ तुरंत सामान ले आना..
जब तक मेरी दोस्त ने सामान लिया.. मैंने उसे देखा... शायद हालातों का शिकार वो भी हुई होगी लेकिन उसके बावजूद कैसे एक मुस्कराहट में सब छिपा लिया होगा .. अपने अरमान, सपने सब कुछ..

मुझे नहीं पता कि अच्छा दिखने या ख़ूबसूरती को मापने के मायने क्या होते हैं लेकिन मेरे लिए वो आज के दिन में मिली सबसे खूबसूरत लड़की थी.. 

Jun 14, 2014

एक दोस्त है मेरी. हर वक़्त चुप रहती है. ज्यादा किसी से बात नहीं करती. हँसी से कोसो दूर उसकी अपनी दुनियां है जिसमे केवल एक गहरी चुप्पी है. कई बार जानने कि कोशिश पर जवाब नहीं मिला. बहुत कुरेदने पर जब चुप्पी की वजह पता चली तो शर्मिंदगी और ग़ुस्से से भर गयी. शर्मिंदगी इसलिए कि हम आज भी ऐसे घिनोने समाज का हिस्सा हैं और ग़ुस्सा अपनी दोस्त पर कि आज तक वो इतना सब बर्दाश्त क्यों कर रही है. वजह कुछ यूँ थी.. मेरी मित्र २५ लोगों के एक परिवार मैं रहती है. उसका सगा चाचा बचपन से लेकर आज तक उसका शोषण करता आ रहा है. बचपन मैं कुछ ज्यादा हद तक, बड़े होने पर चूँकि उसके लिए समस्या हो सकती है इसलिए सिर्फ घूरने और छेडछाड तक सीमित है. और दोस्त इसलिए चुप है क्यूंकि उसकी बहिन बहुत छोटी है और वो उसे हर कीमत पर बचाना चाहती है. उसे डर है बता देने पर या तो परिवार वाले चुप रहने को कहेंगे या कहीं बाहर भेज देंगे. वो इंसान तो आपकी हरकतों से बाज आने से रहा तो कहीं उसकी बहिन भी इस नीचता का शिकार न हो जाए.
भारत देश में अभी भी बाल यौन शोषण या चाइल्ड एब्यूज ऐसी समस्या है जिसके बारे में लोग बात नहीं करते या करना नहीं चाहते . और ये समस्या हर वर्ग के घरो में है. देश ही नहीं विदेशों में बड़े से बड़े लोगों के नाम समय समय पर अखबारों में सामने आये हैं.
देश के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी थी जिसके अनुसार भारत में करीब 53.22 प्रतिशत बच्चे एक या एक से ज्यादा बार इसका शिकार हुए है. 21.90 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण और 50.76 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण के अन्य प्रकारों के शिकार हुए. शर्मिंदा कर देने वाला सच ये भी है कि 50 प्रतिशत बच्चे अपनों के ही शिकार हुए. ज़्यादातर मामलों में पिता या सगे चाचा ताऊ या मामा ही दोषी थे. रिपोर्ट के ही मुताबिक अधिकतर बच्चों ने कभी अपना मुह नहीं खोला जैसा कि मेरी दोस्त ने भी किया. और ऐसा नहीं है कि सिर्फ लड़कियां इस समस्या की शिकार हैं , लड़के भी उतने ही पीड़ित हैं.
अब इसके ज़िम्मेदार कौन? सरकार, मंत्री, न्यायपालिका, पुलिस, समाज ? नहीं. ज़िम्मेदार हम. हम सब. सबसे पहले वो लोग जो अपनी घटिया मानसिकता और मानसिक बीमारी का शिकार इन बच्चों को बनाते हैं. दूसरे वो लोग जो अपने बच्चों पर भरोसा न करके उन्हें या तो डांट देते हैं या चुप रहने को कहते हैं. तीसरे वो लोग जो इसके खिलाफ सिर्फ इसलिए आवाज़ नहीं उठाते क्यूंकि समाज क्या कहेगा या फलां व्यक्ति उनका रिश्तेदार है या अपना है. समय समय पर टीवी और फिल्मों के ज़रिये इस समस्या के बारे में कहा गया, दिखाया गया पर समस्या आज भी जस की तस है. कम से कम अपनी दोस्त के बारे में जाने के बाद मैं ये कह सकती हूँ. हम दोहरे व्यक्तित्व वाले समाज में जीते हैं जहाँ एक तरह बच्चे को हर धर्म में भगवान का रूप बताया जाता है और उसी धर्म के अनुयायी अपने खुद के बच्चों को भी नहीं बक्शते.
पिछले कुछ दिनों से भारत के बच्चे बच्चे की जुबां पर है कि अच्छे दिन आने वाले हैं. भारत का हर एक नागरिक अपने अच्छे दिनों के ख्वाब देख रहा है. अब इनके भी अच्छे दिनों की बारी आनी चाहिए जिससे किसी भी बच्चे का कोई बीता कल उसे न ही डराए न ही चुप रहने पर मजबूर करे.जो लोग दोषी हैं उनकी सजा भी आपको तय करनी होगी. जो आपके साथ हुआ, या आपके बच्चों के साथ हो रहा है वो आगे किसी के साथ न हो या आपके बच्चा इस सदमे से उबार जाए इसकी भी कोशिश आपको ही करनी होगी. ज़्यादातर घरों में बच्चे से खुलकर बात नहीं की जाती न ही उसकी बातों को ज्यादा महत्व दिया जाता है इसलिए बच्चा बेख़ौफ़ आपको अपने साथ हुई ज्यादती के बारे में बता सके, ऐसा माहौल भी आपको ही बनाना होगा जिससे किसी भी मासूम को खुद से आँखें चुराकर न जीना पड़े. खुलकर बोलने से ही बात बन पाएगी. आप भी बोलिए और अपने बच्चों को भी बोलने का मौका दीजिये. अपनी उस जैसी हर दोस्त से भी मैं कहूँगी वक़्त आने का इंतजार मत कीजिये. यही समय सही है. किसी और का घोला हुआ ज़हर क्यों पीना. बात करिए. चुप रहने से कुछ नहीं होगा. बात करना तो बनता है अब. जिंदगी आपकी तो बेख़ौफ़ जीने का हक भी सिर्फ आपका है.    


May 16, 2014



मोदी जी..
आपको बधाई कि अब आप भारत देश के प्रधानमंत्री कहलाये जायेंगे. आपके कारन ही भाजपा को इतनी बड़ी जीत मिल पायी है. आप अब अपने किये हुए वादों को पूरा करने की ओर बढ़ेंगे जैसा कि सब आपसे उम्मीद कर रहे हैं.  कुछ उम्मीदें भारत कि एक आम लड़की भी रखती है आपसे. मैं जानती हूँ कि आप पर उमीदों का बोझ पहले से ही बहुत है पर आपने अच्छे दिनों के आने का ख्वाब दिखाया है तो मैं भी अपने अच्छे दिनों के आने का इंतजार करुँगी. रोज़ रोज़ अखबारों में बलात्कार, लूट और छेड़खानी की खबरें पढ़कर मैं आहत हो चुकी हूँ इसलिए अपनी उम्मीदों का बोझ भी आपके सर डाल रही हूँ.  आपसे कुछ ऐसी उम्मीदें हैं कि :

मुझे एक ऐसा देश चाहिए जहाँ मुझे अपने हक के लिए रिजर्वेशन की ज़रुरत न पड़े. संविधान में मिले बराबरी के अधिकार को मैं खुलकर जी पाऊं. अपने हक के लिए लड़ने पर मुझे दोयम दर्ज़े का कहकर संबोधित न किया जाए.

मैं जब चाहूँ, घर से बाहर ये सोच कर निकल पाऊं कि हाँ मैं सही सलामत, बिना किसी परेशानी के वापस आ जाउंगी और अगर किसी परेशानी मैं फंस भी जाऊ तो पुलिस के पास जाने में मुझे हिचकिचाहट न हो.

एक ऐसा समाज चाहिए जहाँ मुझे गर्व महसूस हो कि मैं लड़की हूँ. हर बार मुझे ये विचार न कचोटे कि काश में एक लड़का होती. मेरे माता पिता को मेरी शादी के लिए अपना बैंक अकाउंट खाली न करना पड़े और इतना खर्च करने के बाद फिर भी दहेज़ की बलि मुझे न चढ़ाया जाए.

मेरी ज़रुरत सिर्फ नवरात्रों तक ही न हो और मेरे हुनर का दायरा सिर्फ रसोईघर और घर गृहस्थी तक ही सीमित न माना जाए. देश और दुनिया से जुड़े मुद्दों पर मेरी राय को सिर्फ इसलिए न नकारा जाए क्यूंकि मैं एक लड़की हूँ और लड़कियां तो बोलती ही रहती हैं.

अपनी पसंद का करियर चुनने में मुझे अपने लड़की होने को ध्यान में न रखना पड़े. रोज़गार के अवसरों में मेरे लड़की होने को नहीं वरन काबिल होने को ध्यान में रखा जाए.

ट्रेन या बस में शहर से बाहर जाते वक़्त मेरे माता पिता को कभी ये फिकर न करनी पड़े कि मेरी बेटी सही वक़्त और सही तरीके से पहुंची होगी कि नहीं.

आशा करती हूँ कि आप इस आम भारतीय लड़की की इन उम्मीदों को पूरा करने के लिए ईमानदारी से प्रयास करेंगे और मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि अपने आपको साबित करने में कोई कसर नहीं छोडूंगी.


Apr 1, 2014

बेख़बर आज़ाद जीना है मुझे...



































फिल्मों में ये देखकर कि किस तरह हीरो बना  एक आम आदमी इतने सारे बुरे लोगो पर भारी पड़ता है. बहुत अच्छा लगता है जब वो भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ लड़ता है. अपने परिवार की रक्षा करता है जाहिर है किसी भी आम आदमी को ये देखकर अच्छा ही लगेगा कि कोई तो है जो अच्छा सोचता है और करता है. फिल्म में ही सही.नहीं नहीं मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ. मैं बस आप सभी से अपने कुछ ओब्ज़र्वेशन शेयर करना चाहती हूँ. जो काम अक्सर  फिल्म मैं एक एक हीरो करता है  अगर वही काम एक एक आम लड़की करना चाहे, मसलन लॉन्ग ड्राइव पर जाना दोस्तों के साथ देर रात यूँ ही मटरगश्ती करना,अपने फैसले खुद लेना और जिन्दगी अपनी शर्तों पर जीना.न नहीं कर सकती.
कहा जाता है कि फिल्मे समाज का आइना होती है. बहुत याद करने पर याद आता है कि उँगलियों पर गिनी जानी वाली कुछ फ़िल्में ही ऐसी बनी हैं जिसमे किसी महिला चरित्र को पुरुषों से लड़ते दिखाया गया हो. अब बलात्कार को ही लें किस तरह फ़िल्में जेंडर स्टीरियो टाइपिंग को बढ़ावा देती हैं और हम उसे समाज का सच मान लेते हैं.किसी भी समाज में बलात्कार की जगह नहीं होनी चाहिए और दुर्भाग्य से ऐसा होता भी है तो दोषी स्त्री मानी जाती है और वास्तविक दोषी अपनी मर्दानगी का डंका पीटते हैं. महिला चरित्र खुदखुशी कर लेती है या फिर समाज के तानो का शिकार तब तक होती है जब तक कोई सहृदय पुरुष उसकी ज़िम्मेदारी नहीं उठा लेता या उससे शादी नहीं कर लेता.
अब सवाल ये है कि हम अभी भी ऐसे ही समाज का हिस्सा ही  क्यों हैंक्यों अभी भी महिलाओं के ख़ुशी से जीने के अधिकार एक पुरुष के हाथ में हैं.बात केवल इतनी सी है कि महिलाओं के लिए प्रथाओ और परम्पराओं को बनाने वाले पुरुष ही हैंमहिलाओं के लिए सभी तरह के कानून बनाने वाले पुरुष हैं. परिवार में उनकी जगह का निर्णय लेने वाले भी पुरुष हैं. महिलाओ के अधिकारों की आवाज़ सुनने वाले भी पुरुष हैं.गवर्नेंस में महिलाओं की भागीदारी समाज में महिलाओं की संख्या के मुकाबले नगण्य है जो हैं भी उनके बारे में आमतौर पर माना जाता है कि वो किसी पुरुष की कृपा पर ही राजनीति में आयी हैं . यानि एक आम महिला को अपने आप को साबित करने के लिए पुरुषों के मुकाबले बार बार अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है .संसद में महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण की मांग भी चौदहवीं लोकसभा में अनसुनी रह गयी  जब समाज में महिलाओं के लिए निर्णय लेने का अधिकार पुरुषों के पास होगा तो किस प्रकार के बदलाव  की उम्मीद करें.अभी महिला दिवस पर एक दिन के लिए महिलाओं को सम्मान दिया गया. पर क्या वाकई महिलाऐं केवल सिर्फ इस एक दिन के सम्मान कि हकदार हैं?हर दिन महिलाओं से हर बात पर अग्नि परीक्षा की उम्मीद की जाती है. रामायण काल से चला आ रही है ये परंपरा. अकेले चलना चाहा तो अग्निपरीक्षालीजिये हमने एवरेस्ट फ़तेह करके दिखा दिया. पढ़ना चाहा तो अग्निपरीक्षा,लीजिये हमने हर बार बोर्ड के पेपरों में लड़कों से अव्वल आकर दिखा दिया. उड़ना चाहा तो भी अग्निपरीक्षातो लीजिये हमने अंतरिक्ष तक पहुँच कर दिखा दिया. आत्मनिर्भर होना चाहा तो अग्निपरीक्षालीजिये हमने सभी शीर्ष कंपनियों का सरताज बनकर दिखा दिया. एक छोटी सी बात समझने में इस समाज को कितने वर्ष और लगेंगे कि अब वो दौर गया जब भगवान्समाजपरिवारदुनियां और इज्ज़त का डर दिखाकर लड़कियों को उनकी मंजिलों तक नहीं  पहुँचने दिया जाता था . बदलाव हो भी रहा है और आगे भी होगा.
चुनावों की गूँज अब हमारे गलियारों में दस्तक दे रही है. इस बार हम अपना सशक्तिकरण खुद करने की ठान लें. ज्यादा से ज्यादा महिलाएं वोट दें और अपने लिए बेहतर कल का चुनाव करें.
बेख़बर आज़ाद जीना है मुझे,  बेख़बर आज़ाद रहना है मुझे.

Mar 21, 2014

Finally... तुम मिल गए



कल अचानक एक पुराने दोस्त से बात हुई. हम 8 साल बाद बात बात कर रहे थे, 3 घंटे, उफ्फ्फ... याद भी नहीं कि पिछली बार किसी से इतनी लम्बी बात कब हुई थी, वक़्त का पता ही नहीं चला. हम बातें करते गए, ऐसा लग रहा था कि बताने को कुछ रह ना जाए. 8 सालों में हम दोनों की जिंदगी में जो कुछ भी हुआ, हम एक दूसरे को सब बता देना चाहते थे, कौन नया आया, कौन गया, कितने दोस्त बने, किसे धोखा दिया, किसने तंग किया, पढाई कहाँ की, जॉब कैसी चल रही है.. फ़ोन में घुसकर उसके पास पहुँच जाने का मन कर रहा था, प्लानिंग होने लगी, कैसे मिलना है, कहाँ मिलना है, मिलेंगे तो कहाँ कहाँ घूमेंगे, कैसे वक़्त बिताएंगे.. ख़ुशी का आलम ये था कि अगर फ़ोन से जाने का कोई तरीका होता तो वो अमल में लाया जा चुका होता. उसने कहा.. वक़्त कितनी जल्दी गुज़र गया न, पता ही नहीं चला, ऐसे लग रहा है जैसे कल की ही बात हो. ये छोटी सी बात उसने यूँ ही कही, लेकिन वाकई वक़्त कितना जल्दी गुज़र जाता है, और इस वक़्त की  आपाधापी में हम भूल जाते हैं कि कुछ अपने पीछे छूट गए. वो लोग जो जिनके चेहरे की ख़ुशी की वजह आप ही हैं. बस हम समझ नहीं पाए. बड़े मुकाम हासिल करने कि चाह में उन अपनों की सुधि ही नहीं ली. आज टेक्नोलॉजी बूम के दौर में हम टच में रहने की बजाय आउट ऑफ़ टच होते जा रहे हैं. हमारे पास इतने सारे एप्प्स हैं फिर भी हम रिश्ते सम्हालने में नाकाम हो जाते हैं. आप ही सोचिये कि जब कुछ स्माइली हमारे इमोशन को बयां करती हैं, तो कैसे हम उन रिश्तों को सहेज पायेंगे. इन एप्प्स के चक्कर में हम भूल जाते हैं कि दोस्ती वर्चुअल कभी नहीं हो सकती. मुझे अच्छे से पता है कि आपको ज्ञान लेना पसंद नहीं है. तो सिर्फ एक छोटा सा काम करते हैं. 
, थोड़ी देर के लिए हम कुछ वक़्त पहले की दुनियां में चलते हैं जब हमारी जिंदगी में दोस्तों की  जगह एप्प्स ने नहीं ली थी. थोडा सा वक़्त निकलते हैं उन पुराने दोस्तों के लिए जो आपकी मुस्कराहट के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे. थोड़ी देर उन दोस्तों के साथ बचपन को जीकर देखते हैं. बिना मिलावट की हँसी हसकर देखते हैं.. अपने पुराने रिश्तों को फिर से जिंदा करने की कोशिश करते हैं, और जब आप ये कर लेंगे तो यकीन मानिए आप खुद को पहले से ज्यादा सुकून में पायेंगे. पहले से ज्यादा खुश पायेंगे, और..
ख़ुशी सिर्फ तभी मिलेगी जब आप ख़ुशी को पहचानना सीख लेंगे.    


Mar 13, 2014

बस यूँ ही

कभी कभी सोचती हूँ कि जिंदगी यूँ न होती तो कैसी होती. आप उम्मीदों के साथ आगे बढ़ते हैं, खुद के लिए एक मुकाम तय करते हैं, टूटते हैं, बिखरते हैं, फिर उठ खड़े होते हैं और फिर खुद से नयी उम्मीदें पालते हैं. कहते हैं न कि चलती का नाम जिंदगी.


Mar 9, 2014

आप सोचिये

हॉल में जाने का मौका नहीं मिला तो मैंने लैपटॉप पर कल जय हो देखी. अच्छी लगी. बहुत ख़ुशी हुई ये देखकर कि किस तरह एक आम आदमी इतने सारे बुरे लोगो पर भारी पड़ता है. बहुत अच्छा लगता है जब वो भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ लड़ता है. अपने परिवार की रक्षा करता है खासकर आपनी बहिन की जब फिल्म में एक बुरे चरित्र का व्यक्ति उसकी इज्ज़त पर हाथ डालता है. ज़ाहिर है कि किसी भी आम इंसान को ये देखकर अच्छा ही लगेगा कि कोई तो है जो अच्छा सोचता है और करता है. फिल्म में ही सही.
नहीं नहीं मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ. मैं बस आप सभी से अपने कुछ ओब्ज़र्वेशन शेयर करना चाहती हूँ.

एक सवाल : जो काम उस फिल्म मैं एक हीरो ने किया अगर वही काम एक लड़की करना चाहे तो. एक आम लड़की, जिसके दिल में देश के लिए बेपनाह मोहब्बत है, जो दुखी लोगो को देखकर खुद भी दुखी होती है और उनकी मदद की हरसंभव कोशिश करती है. उसे भी भ्रष्ट राजनेताओं से उतनी ही चिढ़ है, इस सिस्टम के खिलाफ वो भी लड़ना चाहती है पर वो नहीं कर सकती. क्यों ?
जवाब: वैदिक संस्कृति के इस देश में लड़कियों को देवियों का दर्ज़ा तो दे दिया गया लेकिन सिर्फ दर्ज़ा दिया गया, माना नहीं गया. अगर कोई भी लड़की समाज द्वारा बताई गयी उसकी हदों से बहार जाकर कोई काम करना चाहे या करती है तो सबसे पहला काम कि उसके चरित्र का हनन कर दिया जाए. ऐसा कुछ कहा जाए कि वो अपनी नज़रों में ही गिर जाए. इससे काम न चले तो उसके शरीर को हथियार बनाओ. भगवान् ने उसे ऐसा शरीर दिया ही इसीलिये है कि जब जैसी ज़रुरत पड़े, इस्तेमाल करो. इसके बाद भी अगर कुछ कहने की हिम्मत करे तो सामूहिक या अप्राकृतिक बलात्कार जैसे अस्त्र कब काम आयेंगे. इसके बाद उसकी जान ले लेना ही एकमात्र उपाय बचता है जो कि आजकल के दौर में आसान भी है.
थोडा हैवी हो गया ना. होने दीजिये बेहतर है. हर बार चीज़ों को ज्यादा लाइट लेते लेते हम अपनी इंसान होने की जिम्मेदारियां भी भूलते जा रहे हैं शायद. हमारा काम सिर्फ ख़बरें पढ़ लेना और उन पर अफ़सोस भर कर लेना रह गया है. ज्यादा दुःख हुआ तो एक कैंडल मार्च निकल कर तसल्ली दे ली खुद को.
अब एक और सवाल: लड़कियों के सम्मान और मर्यादा के लिए इतनी बातें लिखी जाती है, सुनाई जाती हैं, दिखाई जाती हैं, फिर भी ऐसा क्या है जो आपको रोकता है सही को सही या ग़लत को ग़लत कहने से. इसका जवाब तो अब आपके पास ही होगा.
ये सिर्फ हमारे ही देश में हो सकता है कि नवरात्रों में माता के पूर्ण आशीर्वाद के लिए हम नौ दिन कन्या खिला सकते हैं पर एक कन्या को जन्म नहीं लेने देना चाहते.
अपनी बेटी को विदा करते वक़्त अपने खाली बैंक अकाउंट के लिए ससुराल वालों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं पर वही बैंक अकाउंट भरने के लिए दहेज़ लेने और बहू को गाहे बगाहे तंग करने से नहीं चूकते.
बचपन से लड़कियों को राधा और दुर्गा के रूप में देखकर खुश होते हैं पर ना तो राधा की तरह उन्हें प्यार करने का हक़ है और ना ही दुर्गा कि तरह अपनी शक्तियों को पहचानने का.
किसी भी लड़की को जीने के लिए एक पति नाम के सहारे कि ज़रुरत होती है. हसने वाली ही बात है कि बचपन में देवी रूप में पूजी गयी कन्या को ख़ुशी भी एक सहारे से नसीब होगी और इस नियम के विरूद्ध जाने कि कोशिश कि तो वही एक हथियार.. चरित्रहनन .
लड़कियों से हर बात पर अग्नि परीक्षा की उम्मीद की जाती है. रामायण काल से चला आ रही है ये परंपरा. अकेले चलना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने एवरेस्ट फ़तेह करके दिखा दिया. पढ़ना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने हर बार बोर्ड के पेपरों में लड़कों से अव्वल आकर दिखा दिया. उड़ना चाहा तो भी अग्निपरीक्षा, तो लीजिये हमने अंतरिक्ष तक पहुँच कर दिखा दिया. आत्मनिर्भर होना चाहा तो अग्निपरीक्षा, लीजिये हमने सभी शीर्ष कंपनियों का सरताज बनकर दिखा दिया. एक छोटी सी बात समझने में इस समाज को कितने वर्ष और लगेंगे कि अब वो दौर गया जब भगवान्, समाज, परिवार, दुनियां और इज्ज़त का डर दिखाकर लड़कियों को उनकी मंजिलों तक ना पहुँचने दिया जाता था . बदलाव हो भी रहा है और आगे भी होगा. 
मैं वही एक लड़की हूँ, एक आम लड़की, जिसके दिल में देश के लिए बेपनाह मोहब्बत है, जो दुखी लोगो को देखकर खुद भी दुखी होती है और उनकी मदद की हरसंभव कोशिश करती है. उसे भी भ्रष्ट राजनेताओं से उतनी ही चिढ़ है, इस सिस्टम के खिलाफ वो भी लड़ना चाहती है पर लड़ नहीं सकती. क्यों?
आप सोचिये.