Jan 12, 2016

एक गूंगे ने कहा कि मुझे गूंगा रहने दो

एक गूंगे ने कहा कि मुझे गूंगा रहने दो.. अब आप कहेंगे कि गूंगे ने कैसे कह दिया तो जी बात ये है कि बोलने वाले इतना ज्यादा बोलते हैं कि गूंगे को आखिरकार कहना पड़ा कि मैं गूंगा ठीक हूँ..
हुआ कुछ यूँ एक दिन गूंगा अपनी रह चला जा रहा था, रास्ते में उसे एक नेता मिले .. वो चौंका, आप कैसे? आप तो इस दुनियां से कबके विदा हो गए? वो नेता बोले, ए गूंगे, तुम विपक्ष के नज़र आते हो तभी मुझे देखकर खुश नहीं हो. किस धर्म के हो? जाति क्या है तुम्हारी? रिजर्वेशन से पढ़े हो या फिर कोई और आरक्षण की मांग के सिलसिले में चले जा रहे हो? गूंगे का सर चकराया, बोला, मैं कहाँ कुछ करूँगा नेताजी, वो तो दो दिन हो गए रोटी खाए, पेट भरने जुगाड़ करने जा रहा हूँ. नेताजी थोडा और गुर्र्राए.. जुगाड़? अब समझ आया कि तुम जैसे लोगों ने ही इस देश का ये हाल कर रखा है. जुगाड़ से काम चलाते हो. मेहनत तो करना ही नहीं चाहते, हमें देखो, हम तुम्हारी तरह की छोटी मोटी जुगाड़ लगाते तो तुम्हारी तरह ही पानी पीकर पेट पर हाथ फेर कर सो जाते. तुम जैसे लोगों की वजह से ये देश आज तक पिछड़ा हुआ है.. इस देश का उद्धार केवल तभी होगा जब तुम हमारे साथ जुड़कर जुगाड़ लगाओगे, हम सबको हाथ में हाथ डालकर चलने की ज़रुरत है.. नेताजी बोलते ही जा रहे थे.. गूंगे को भूख लगी थी .. क्या करता, दबे पांव वहां से निकला और तेज़ी से भागने लगा.. भागते भागते उसने पीछे देखा, ठहाके के साथ वो नेता हस रहा है, पर उनका चेहरा अलग सा है. उनके पैरों के पास एक मुखौटा पड़ा है.. कुछ समझा नहीं ..सोचा शायद उसकी किस्मत पर हँस रहा होगा. थोडा आगे निकल कर उसने चैन की सांस ली.. थोडा रुका और फिर रोटी की तलाश में निकल पड़ा.. एक मोटे ताज़े, हट्टे कट्टे आदमी ने उसका रास्ता रोका.. पूछा रोटी खाओगे ? गूंगे को बस मुंह मांगी मुराद मिल गयी.. उसके कहा कहाँ है रोटी? मुझे बहुत ज़ोरों की भूख लगी है.. मुझे रोटी दे दो.. उस आदमी ने कहा ..रोटी तक का रास्ता तेरे ही पास है. बस तू पहचान नहीं पा रहा.. गूंगे ने सर खुजलाया, पूछा कहाँ है रोटी... उस आदमी ने कहा कि आँखें बंद करके अपने ईष्ट को याद कर बस. गूंगे ने किया लेकिन रोटी नहीं आई. उस आदमी ने कहा कि लगता है कि तेरा ईष्ट तुझसे नाराज़ है.. तेरे पापों की वजह से आज तू भूखा मरने पर मजबूर है. गूंगे ने पैर उस आदमी के पैर पकडे. कहा, मैं माफ़ी मांगता हूँ.. क्या करूँ अपने ईष्ट को मानने के लिए जिससे वो मुझे रोटी दे दे.. आदमी बोला, कुछ नहीं..  बस जो तेरी श्रद्धा हो उतना चढ़ावा मुझे दे दे.. मैं तेरे इष्ट को दे दूंगा और तेरी समस्याओं का हल हो जायेगा, गूंगे ने कहा मेरे पास कुछ नहीं है महाराज.. नरक की आग में जलेगा तू.. आदमी चिल्लाया, गूंगा डर के भागा.. भूखे पेट भागते नहीं बन रहा था. बेदम होकर वहीँ पड़ गया .. खुद से जूझता गूंगा उठा और जैसे तैसे घर पहुंचा.. इस उम्मीद में कि बीवी कहीं न कहीं से रोटी शायद लायी हो ..सकुचाते हुए पूछा .. रोटी मिल जाएगी क्या खाने को? बीवी पैर पटकते और दांत पीसते हुए बोली कि कौन सी रोटी खिलाऊ तुम्हें? वो जो नयी सरकार के साथ आने वाली थी अभी तक आई नहीं या वो रोटी जो पिछली सरकार सपने में मुझे पकड़ा गयी थी तुम्हें खिलाने के लिए. गूंगा शर्मिंदा हो गया. सोचा रहा था कि उसने पूछा ही क्यूँ. आखिर बीवी भी तो भूखी होगी. गूंगे को कुछ न सूझा बस वो लगा रोने. रोता रहा , सिर्फ रोता रहा , खूब रोया, बीवी को देख कर रोया, उभरी पसलियों के ढांचे हो गए अपने बच्चों को देख कर रोया. रात भर रोया.
सुबह हुई तो नाम का गूंगा अब सच में गूंगा हो गया. उसने कुछ भी कहना छोड़ दिया था, हमेशा के लिए. एक जगह बैठा रहता. बीवी ने सोचा उसका ताना कहीं इसकी जान न ले ले.. माफ़ी दर माफ़ी का दौर चला पर गूंगा टस से मस न हुआ. बीवी, बच्चे जो कुछ खाने को लाते थोडा बहुत खिला देते. यही गूंगे के प्राण को रोके हुए था. धीरे धीरे ऐसे लगा जैसे कि कोई समाधिस्त बाबा बैठा हो.
संयोग से वो हट्टा कट्टा आदमी वहां से गुज़रा, उसे देख कर बस चरणों में पड़ गया.. बाबा तुम कहाँ थे, कब से ढूंढ रहा हूँ, गूंगा अब सच में गूंगा था तो न बोला. आसपास गुज़रते लोगों को समझते देर न लगी कि कोई महान बाबा यहाँ आकर बसे हैं. पाखंड ने आकार लेना शुरू कर दिया. गूंगा कुछ न बोला. अब रोटी की कोई कमी न थी. उसके आगे खाने का ढेर लगा रहता.
एक दिन गूंगे ने देखा कि राह में मिला वो आदमी और मुखौटा लगाये वो नेता पैसों और सामान का लेन देन कर रहे हैं. गूंगे ने सोचा कि बोलूं कि आखिर तमाशा क्या लगा रखा है, जमे हुए होठ की पपड़ी को गीला करके जीभ को जगाकर बोलने जा ही रहा था कि रुका, फिर सोचा कि जिस रोटी  के लिए दर दर भटका वो यहीं मेरे सामने है.. बोला तो शायद इससे हाथ धोना पड़े और गूंगा फिर से गूंगा बन गया.अपने मन में बोला .. मैं गूंगा ही ठीक हूँ.


Aug 22, 2015

असल इंडिया डिजिटल तब होगा जब...........

भारत सरकार ने यहाँ की आवाम को डिजिटल इंडिया का सपना दिखाया है. डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के नौ स्तम्भ रखे गए हैं ब्रॉडबैंड हाईवे, फोन तक सबकी पहुँच, जनता के लिए इन्टरनेट प्रोग्राम, इ-गवर्नेंस, इ-क्रांति, सभी तक सूचना का प्रसार, इलेक्ट्रॉनिक सामान का, सूचना तकनीक के क्षेत्र में नौकरियां, आरंभिक फसल प्रोग्राम| इसके अलावा सरकारी विभागों में सभी रिकार्ड्स के साथ साथ रिपोर्ट्स भी ऑनलाइन ही भेजी जाएँगी. इस प्रोग्राम के तहत आप डिजी लाकर का इस्तेमाल करके अपने दस्तावेज़ सुरक्षित कर सकते हैं, मोबाइल पर ही अधिक से अधिक सरकारी सुविधाओं का प्रयोग कर सकते हैं मसलन बैंक के कार्य, जन्म मृत्यु प्रमाण पत्र, बिल आदि. व्यापार के क्षेत्र में इ-कॉमर्स मददगार होगी. डिजिटल इंडिया के तहत जिस क्षेत्र के बारे में बात करना सबसे ज़रूरी है वह है शिक्षा का क्षेत्र. इस प्रोग्राम के अंतर्गत भारत के सभी स्कूलों को ब्रॉडबैंड से जोड़ा जाना है. हर स्कूल के अन्दर वाई-फाई, डिजिटल रूप से साक्षरता प्रोग्राम, बड़े पैमाने पर ऑनलाइन कोर्सेज का विकास आदि स्तर पर कार्य किया जाना है. पंचायत स्तर तक इन्टरनेट की सुविधा की उपलब्धता, ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल एजुकेशन आदि कस्बाई और ग्रामीण छात्रों के लिए कंप्यूटर की शिक्षा को सुलभ बना देगा. इसके साथ साथ इन इलाकों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा, योग्य शिक्षकों की समस्या से भी निबटने में इस प्रोग्राम की मदद से सहायता प्राप्त होगी. कहना न होगा कि यदि इस तरह की शिक्षा प्रणाली का विकास करने में भारत सफ़ल रहा तो विकसित देशों की श्रेणी में आने के लिए हम एक बड़ी सीढ़ी चढ़ जायेंगे. ये होना इसलिए भी ज़रूरी है क्यूंकि भारत युवा देश है और युवाओं को एक सही दिशा और देश दुनिया से जुडाव उनके लिए संभावनाओं के नए आयामों को खोल देगा. धीरे धीरे ही सही लेकिन हम बदलावों के साक्षी बन रहे हैं. अभी तक सवा अरब लोगों में केवल 19 प्रतिशत लोग ही इन्टरनेट का प्रयोग कर रहे हैं लेकिन ये रफ़्तार तेज़ी से बढ़ रही है. मोबाइल पर इन्टरनेट का प्रयोग करने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है. इंटरनेट एंड मोबाईल एसोसिएशन ऑफ़ इण्डिया की नयी रिपोर्ट के मुताबिक क्षेत्रीय भाषाओँ के प्रयोगकर्ता सैंतालीस प्रतिशत की दर से बढ़ रहे हैं जिनकी संख्या संख्या साल 2015 के अंत तक 127 मिलीयन हो जाने  की उम्मीद है | स्मार्टफ़ोन की खपत भी भारत में बढ़ी है ऐसे में डिजिटल इंडिया प्रोग्राम उम्मीद जगाता है कि शिक्षा का पुराना स्वरुप बदलकर इन्टरनेट आधारित हो जायेगा. प्राइमरी स्तर पर स्मार्ट क्लासेज का चलन बच्चों को केवल किताबी ही नहीं बल्कि प्रयोगात्मक शिक्षा की और ले जायेगा, बच्चों में प्रारंभ से ही वैज्ञानिकता का विकास होगा. लेकिन इस सपने के आगे चुनौतियों का बड़ा पहाड़ खड़ा है. आज भी दूर दराज़ के गाँव और कस्बों के स्कूल कंप्यूटर से दूर हैं. यह हाल कमोबेश हर उस छात्र का है जिसने गाँव या कस्बे के स्कूल से पढाई अवश्य की है लेकिन कंप्यूटर ज्ञान नगण्य है. ज़्यादातर गाँव और कस्बों में स्कूलों में या तो कंप्यूटर नहीं होता है उन्हें पढ़ाने वालों की कमी होती है. ऐसे में छात्र इससे वंचित रह जाते हैं. अधिकांश युवाओं के लिए मोबाइल चला लेना भर ही डिजिटल होने की परिभाषा है. अंग्रेजी पढ़ा लिखा समाज तो बिना किसी समस्या के इस योजना का लाभ ले लेगा, समस्या ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले और आदिवासी क्षेत्र के लोगों की है जिनके लिए आज भी अच्छा रहन सहन और सामाजिक स्तर दूर की कौड़ी है. उनका ध्यान केवल परिवार के पेट पालने पर है. इंडियन एक्सप्रेस अख़बार के मुताबिक भारत में दस में से सात घर ग्रामीण हैं जो 200 रूपए रोज़ कम पर जीवन यापन कर रहे हैं. आदिवासी क्षेत्रों में अभी भी जागरूकता की कमी के कारण गरीबी और अशिक्षा में ही लोग जीवन जी रहे हैं. ऐसे में डिजिटल इंडिया प्रोग्राम का सभी नागरिकों को साथ लेकर चलने वाली योजना खटाई में पड़ सकती है. देश पहले ही रूरल अर्बन डिवाइड की समस्या से जूझ रहा है ऐसे में डिजिटल इंडिया प्रोग्राम उम्मीद ज़रूर बंधाता है लेकिन उससे पहले देश में पहले से मौजूद समस्याओं के पहलुओं पर गौर करना ज़रूरी हो जाता है. सबसे पहले गाँवों और आदिवासी जनों को मुख्यधारा से जोड़ा जाना अति आवश्यक है और ये भी ज़रूरी है कि हर व्यक्ति की एक निश्चित आय हो जो उसके परिवार के पालन और उसके बच्चों की शिक्षा के लिए पर्याप्त हो. तभी हर युवा सही मायने में आगे बढ़ पायेगा और उसके लिए संभावनाओं के क्षेत्रों में इज़ाफा होगा केवल देश में ही नहीं विदेशों में भी लेकिन ये केवल ख़्वाब हैं जिनकी बुनियाद को पक्का किया जाना बाकी है. असल इंडिया डिजिटल तब होगा जब धरती चीर कर अन्न उगाने वाले हाथ माउस भी उतनी ही सहजता से चला पायें. 

Aug 6, 2015

केवल शिक्षा की तरफ ही कदम आगे बढ़ें न कि गर्त में धकेलते किसी पाखंड की तरफ.


अभी कुछ दिन पहले वैज्ञानिक सोच रखने वाले पूर्व राष्ट्रपति कलाम साहब के निधन पर पूरा देश रोया लेकिन उनके तरह वैज्ञानिक सोच लेकर आचरण करने को अभी हम अपना ही नहीं कर पाए. सोशल मीडिया और टीवी पर हमने कई बार देखा होगा जैसे इस फ़ोटो को शेयर करें और पायें असीम कृपा तुरंत. फलां भगवान् जी दिलाएंगे आपको वीज़ा. बस एक लॉकेट भर दूर है आपकी किस्मत. अल्लाह लॉकेट को पहनिए, किस्मत आपके कदम चूमेगी. “होली वाटर” की एक बोतल घर लाइए और ईसामसीह की कृपा से अपना घर भर दीजिये. एक तरफ जहाँ इन्टरनेट से दुनियां जहान से हम लोग जुड़ रहे हैं वहीँ इसी इन्टरनेट से अन्धविश्वास की गली को चौड़ा किया जा रहा है. सांप सपेरों की धरती कहे जाने वाले देश में माउस से खेलने वाले युवाओं से उम्मीद बंधी थी  कि अब अंधविश्वासों को काबू किया जा सकेगा लेकिन इसी माउस की क्लिक से पाखंड को बढ़ावा मिल रहा है. कई सालों से हम धर्म के नाम पर पैसा कमाने और नफ़रत फैलाने वालों को देखते और सुनते आ रहे हैं और कई ऐसे गुनहगारों को जेल के पीछे भी देखा है. ज्यादा दूर जाने की ज़रुरत नहीं है. आसाराम बापू का प्रकरण खूब चर्चा में रहा था. केवल उन पर ही नहीं बल्कि उनके बेटे पर भी यौन उत्पीडन के आरोप लगे थे. उससे पहले नित्यानंद स्वामी का ऐसा ही प्रकरण सामने आया था. निर्मल बाबा के दरबार और समागम में समोसा और गोलगप्पे खा लेना ही मानव की समस्याओं का उपाय है. दक्षिण के मंदिरों में धन के भंडार भरे हैं. सत्य साईं बाबा के देहावसान के बाद इसका खुलासा भी हुआ था. खुद को राधे माँ कहने वाली एक स्त्री पर  दहेज़ उत्पीडन का आरोप लगा है. स्वयं को कबीर का अवतार बताने वाले रामपाल इन सबसे एक कदम आगे थे. रामपाल के ऊपर ज़मीन पर अवैध कब्ज़े का आरोप लगा था. उनका आश्रम हर तरह की सुख सुविधाओं से परिपूर्ण था और उन्होंने सशस्त्र बल भी अपनी सुरक्षा के लिए तैनात कर रखा था और वो भी बहुत बड़ी संख्या में. ये केवल बड़े कुछ नाम हैं जो चर्चा में रहे. ऐसे ही मुस्लिम समुदाय में कुछ मौलवी, पीर, फ़कीर जिन्न भागने के नाम पर औरतों के बाल खींच खींच कर पाखंड का प्रदर्शन करते नज़र आते हैं. 5000 करोड़ की संपत्ति के मालिक डॉ. पॉल दिनाकरण का कहना है कि स्वयं ईसामसीह ने उन्हें शक्तियां प्रदान कीं. बाकी अख़बारों में तो हम गाहे बगाहे छोटे मोटे बाबाओं, मौलवियों के बारे में पढ़ते ही रहते हैं. अब भारत के साक्षरों की बात करें तो 2011 की जनगणना के अनुसार देश में कुल 74 प्रतिशत लोग साक्षर हैं और इन धर्म कारोबारियों के व्यापार के फलने फूलने में ज़्यादातर इन्हीं लोगों का अधिक योगदान रहता है. जेबों में रखे पैसे का उपयोग इनके द्वारा बताये गए उपाय की फीस या फिर “सेवा” देने में किया जाता है. अपने रोज़ के काम हों या व्यापार के या फिर घर की सुख शांति के उपाय हों या घर में किसी की शादी, ये सब काम इन्हीं लोगों से पूछ पूछ कर किये जाते हैं और भगवान के नाम पर डराने वाले लोगों को मानने लोगों के लिए ये केवल कुछ रुपये हैं लेकिन यही कुछ रुपये बहुत लोगों के मिलाकर इतने भर हो जाते हैं कि पाखंड का एक शामियाना स्थापित किया जा सके और बस इनकी दुकान चल निकलती है.
अब वो बात जो शायद आपको थोड़ी कडवी लगे. ग़लती इन लोगों की जितनी है उससे ज्यादा ग़लती इस देश के नागरिकों की यानि आपकी है. अभी भी देश धर्मगुरुओं के भरोसे चल रहा है. हम विकसित देशों में आने की बात तो करते हैं लेकिन आज भी घर से निकलने से पहले चौघडी या दिन का विचार करते हैं. यदि भारत युवा देश है तो इन युवा आँखों में स्वयं और देश की तरक्की का सपना तैरना चाहिए न कि किसी गोली, ताबीज, भस्म या तस्वीर को लेकर हद पागलपन. सड़क के किनारे लगे तम्बू में अपने दुखों का इलाज़ ढूंढते इस युवा भारत को शायद ये पता नहीं कि यदि केवल 10 रुपये में मिलने वाली भस्म हर मर्ज़ का इलाज़ होती तो ये तम्बू लगाने वाला सबसे पहले अपने लिए एक घर और उसमे सुख सुविधाओं की व्यवस्था करता. उसके पास आपसे ज्यादा दुःख है. इस देश को विकास की ओर केवल वैज्ञानिक सोच ही लेकर जा सकती है और इस सोच को अपनाने के लिए सबसे पहले अंधविश्वासों से बाहर आना होगा और ये सुनिश्चित करना होगा कि केवल शिक्षा की तरफ ही कदम आगे बढ़ें न कि गर्त में धकेलते किसी पाखंड की तरफ.

Jul 26, 2015

मदद की एक अपील.. आपसे

एक अपील , आपसे .. जी हाँ आपसे ही. अपील वो नहीं जो आप सोच रहे हैं.. वही घर, वही परिवार की बंदिशें, वही पुराने प्यार का दर्द और आने वाले जीवनसाथी की चाह में बुनी हुई चुनरी की ख्वाहिशें.. वो सब नहीं.. बिलकुल नहीं.
अपील एक लड़की की जिसने अभी अपने पंख सिर्फ फड़फड़ाए हैं, उड़ान नहीं भरी. उससे पहले सोचा आपसे मदद की अपील करूँ. केवल कुछ मिनट का वक़्त देकर मुझे पढ़ लीजिये.

बात कुछ यूँ है कि मुझे डर लगना शुरू हो गया है. बहुत डर जाती हूँ. अक्सर इस डर की वजह से ना घर से बाहर निकलती हूँ ना ही दोस्त बनाती हूँ. अजीब सा डर है. आगे बढ़ने की हिम्मत भी देता है और रास्ते का रोड़ा भी बन जाता है. हूँ तो एक आम लड़की लेकिन सपने बहुत बड़ा नाम कमाने के हैं. पता चला कि एक आम लड़की जब आगे बढ़ने के लिए कदम उठाती है तो ये समाज उसके चरित्र पर बिना काम के खाली बैठे और दूसरों की सफ़लता से शरीर की भीतरी कोशिकाओं तक जले भुने बैठे लोगों की दी हुई कीचड़ की मोटी मोटी गोलियां दागने को तैयार रहता है. समाज बनता किससे है? हम लोगों से ही. मज़ा आता है कहने वालों को भी और सुनने वालों को भी और इस बात को आग की तरह फैला देने का ज़िम्मा कन्धों पर उठाये लोगों को भी. अब किसी ने कुछ कहा है तो कुछ सच्चाई तो होगी ही.. भले ही उस सच्चाई को ठीक से देखा ही न गया हो या सिर्फ उतना देखा हो जितना अफ़वाह के बाज़ार में अपनी धाक बनाने के लिए ज़रूरी है. अब हूँ तो लड़की ही.. कितनी भी हिम्मत दिखाऊ पर कहीं न कहीं उस चोट के दर्द से टूट भी तो जाउंगी. मानसिक तनाव से भी गुज़रना पड़ेगा. हो सकता है कि रो रोकर कई रातें भी काली हों, हो सकता है कि काम करना ही बंद कर दूँ या हो सकता है कि इतनी बिगड़ जाऊं कि सम्हालने की स्थिति ही न बचे या फिर डर डर के जीने की आदत पड़ जाए. जब काम के सिलसिले में कहीं किसी से मिलने की बात हो तो दिल धक् धक् करे कि कहीं अभी ये उस अफवाहों के बाज़ार में मेरी इज्ज़त की नुमाइश देखने तो नहीं गया था ..किसी ने इससे कुछ कहा तो नहीं होगा? बस यहीं पर आगे बढ़ने के रास्ते में एक लेकिन और एक काश ने मेरा हाथ थाम लिया. “लेकिन” मुझे खुद को हर पल लोगों को सफ़ाई देने पर मजबूर करता है और “काश” उन लम्हों को कोसता है जब चेहरे पर मुस्कराहट और हाथ में खंजर लेकर बैठे लोगों से बात की.
कभी कभी ये डर हिम्मत बंधाता है. फिर लगता है कि मुझे फर्क नहीं पड़ता. लोगों का तो काम ही है बोलना. कुछ तो बोलेंगे ही लेकिन खुद से झूठ भी कैसे बोलूं. फ़र्क तो पड़ता है.. दिल तो दुखता ही है.. तकलीफ़ भी बहुत होती है पर आगे बढ़ने का जज़्बा फिर मुझे ले उठ खड़ा होता है. मैं फिर आगे बढ़ तो जाती हूँ लेकिन उसी डर के साथ कि कौन कब क्या बोल देगा मैं नहीं जानती. आगे बढ़ने के लिए लोगों से मिलना भी पड़ेगा. बड़ा नाम बनाने के लिए सामाजिक दायरा भी बड़ा करना पड़ेगा, और समस्या ये है कि मैं एक सीधी सी आम लड़की हूँ जिसको मुंह में गाली रखकर चलना भी नहीं आता और नाम भी कमाना है.
आप सभी लोगों से मदद तो चाहिए ही लेकिन एक सवाल है मेरा कि क्या आप किसी भी लड़की के बारे में ऐसी बातें सुनते वक़्त एक छोटा सा जवाब नहीं दे सकते कि पहले उससे मिल लो फिर मुझे बताना. किसी को बिना जाने समझे इस तरह की बात बोलना ठीक नहीं है वो भी हमारे जैसे देश में जहाँ लड़कियों का आगे बढ़ना कितना मुश्किल है. शादी की बेड़ियाँ बचपन से ही उसके पावों में होती हैं जो वक़्त के साथ उसके पावों को कसती जाती हैं और एक वक़्त वो आता है जब एक जगह रुक जाने के अलावा कुछ नहीं बचता.









मेरी बस थोड़ी मदद कीजिये. मैं आम हूँ, ख़ास भी बन जाउंगी, तब आपको मुझ पर ज़रूर गर्व होगा. लेकिन इस रास्ते को केवल उतना मुश्किल बनाइये जितना आपके परिवार की महिलाएं झेल सकें. मैं आगे बढ़ना तो नहीं छोड़ सकती लेकिन एक रिश्ते के नाते मदद माँग सकती हूँ, रिश्ता खून का नहीं, इंसानियत का. आगे बढूँ तो हिम्मत बढाइये, अगर ग़लती करूँ तो ज़रूर बताइए लेकिन उस ग़लती को अपनी जलन को निकालने का बहाना मत बनाइये. मेरी प्रेरणा वो लड़कियां ज़रूर हैं जो इन सब बातों से ऊपर उठ कर आगे निकलीं लेकिन क्या हर लड़की को दिल में कुछ काले दिन और दर्द लेकर ही आगे बढ़ना ज़रूरी है. नहीं न. मैं बस इतना चाहती हूँ कि जब मैं कभी अपना जिक्र करूँ तो आपके दिए घावों के बदले आपकी की हुई इस छोटी से मदद को याद करूँ.

पहली और आख़िरी अपील है आपसे. निराश मत करियेगा. मुझे समय देने के लिए धन्यवाद.  

Jul 2, 2015

भारतीय चित्रकार मन

भारतीय मन के अन्दर एक चित्रकार है और इनकी कला, क्या कहने.. भारतीय चित्रकार मन की तारीफ़ करने बैठूं तो एक बाबरनामे से बड़ी किताब लिख जाये। ऐसे ही थोड़े न हर कोई इसका दीवाना है. और आप देश की क्या बात करते हैं.. विदेशों में चर्चे हैं जनाब.. विदेशी इनकी कला की फ़ोटो खींचे बिना रह ही नहीं पाते तो बरबस ही उनका कैमरा बस इनकी कला को कैद कर लेता है। 



आप जानते हैं इन कलाकारों को किसी कैनवास या कागज़ की ज़रुरत नहीं है। इनका कैनवास हर वो जगह है जो ख़ाली है, मुफ्त है और जिसको साफ़ ये नहीं करने वाले हैं. समझे कुछ.. अरे सड़क, सरकारी दीवारों के कोने, टाइल्स, सीढियां, लोहे के पाइप, सड़क के किनारे लगी रेलिंग और सरकारी कूड़ेदान का बाहरी भाग सब कुछ इनका कैनवास ही तो है, इनका प्रिय रंग आप समझ ही गए होंगे.. जी हां..कत्थई रंग, इस रंग में अपनी कला के नमूनों को डुबोकर चित्रकार इस कैनवास को कभी खाली नहीं रहने देता। 

बिना ब्रश बना देते हैं आर्ट 


जनाब इनके हुनर के क्या कहने, मजाल है कि ये कूंची और ब्रश हाथ में भी पकड़ें, ये केवल अपने मुंह को ही इस कार्य के लिए प्रयोग कर सकते हैं. मुंह में रंग लिए ये सड़कों को कत्थई रंग से रंगते हैं, यदि मेरी बात पर यकीन न हो तो राह चलते किसी भारतीय चित्रकार को गाड़ी को धीमा करके और दायीं या बायीं किसी भी तरफ चित्रकारी करते देख सकते हैं। इससे कोई फरक नहीं पड़ता कि ग़लती से ये रंग किसी और के कपड़ों, मुंह और गाड़ी पर लग सकता है क्यूंकि ग़लती इन कलाकारों की नहीं होती.. हवा की होती है, मुई उसी तरफ़ बह रही होती है। 


इंसान भी रंग जाता है इस कला में 

कभी-कभी चित्रकार केवल ज़मीन की तरफ देखते हुए मुंह में भरे रंग को बस उलट भर देता है। इस कला में समय की बचत होती है। अगली कला के नमूने में चित्रकार राह में चलते बिना किसी तरफ देखे मुंह में भरा रंग एक लम्बी धार जैसे छोड़ता है, फ़ायदा देखिएगा कि सड़क के साथ-साथ कोई और दीवार या इंसान भी इस कला में रंग जाता है। ये सब पढ़कर आप सब गर्व और ख़ुशी से भर गए होंगे। हाँ इस कला को न समझ पाने वाले नासमझ लोगों को ग़ुस्सा ज़रूर आ रहा होगा पर जनाब आपने कर क्या लिया। अगर इतना ही बुरा लगता था तो किसी चित्रकार को रोका होता। 

लेखक का मन हुआ पुलकित 

मुझ लेखक को ही ले लीजिये, ये लिखते हुए इतना अधिक हर्ष हो रहा है कि मन का हर कोना उस कला और कलाकार के दांतों के सफ़ेद से कत्थई हो चुके रंग और उसके ऊपर लिजलिज़ी परत के स्मरण मात्र से पुलकित हो उठा है और भोजन करने की भी इच्छा नहीं हो रही। अरे हाँ .. मैंने अभी तक आपको ये नहीं बताया ये कला सुन्दर होने के साथ साथ सुगन्धित भी है। इसकी सुगंध के क्या कहने, बस यूँ समझिये कि इससे प्यार न हो जाये इसलिए लोगों को कभी कभार नाक भी बंद करनी पड़ जाती है। अब तक चित्रकारी करने के लिए उतावले हो चुके इस मन को रोकिये मत, बस अपने घर के पास के किसी खोखे पर चले जाइये, गोल्ड्मोहर, तुलसी, तम्बाकू आदि रंग ले आइये, थोड़े महँगे रंगों से चित्रकारी करना चाहें तो रजनीगंधा, पान विलास, कमला पसंद जैसे विकल्प भी उपलब्ध हैं। इन रंगों को अपने मुंह में रखिये और लार के साथ मिश्रित कीजिये, घर से बाहर निकलिये और सबसे पहले अपने घर की बाहरी दीवार से शुरुआत कीजिये। यकीन जानिये बेहद ख़ूबसूरत लगेगी। और नासमझ लोगों से मेरी अपील है कि चित्रकारों को अपना काम करने दें क्यूंकि इन्हें रोकने में आप अपना समय गंवाएंगे नहीं और खून जलाने से कुछ होगा नहीं। जैसे आप आज तक चुप रहे हैं.. कृपया अभी भी रहें।

Read more at: http://hindi.oneindia.com/news/features/why-indians-spits-paan-gutkha-everywhere-363646.html

Jun 28, 2015

जोर नंबरों पर नहीं बल्कि कौशल के विकास पर हो

भारत देश में एक अजब दौड़ चल रही है, नम्बरों की दौड़, शिक्षक, छात्र, यूनिवर्सिटीज सब इस दौड़ में आँख बंद करके दौड़े चले जा रहे हैं||लेकिन पहुंचना कहाँ है किसी को नहीं पता|आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं|हाल ही में दिल्ली यूनिवर्सिटी ने कंप्यूटर साइंस की कट ऑफ लिस्ट जारी की है जिसमे मेरिट 100 प्रतिशत रखी गयी है| बाकी विषयों की मेरिट भी 95 प्रतिशत से 100 प्रतिशत के बीच है| लगभग 3 लाख से अधिक एप्लीकेशन भी आ चुके हैं| लगभग हर विश्वविद्यालय में यही हाल है| लखनऊ विश्वविद्यालय में भी बीकॉम जैसे विषयों की मेरिट 90 प्रतिशत से ऊपर रखी है| एक नज़र में देखने पर ऐसा लगता है जैसे कि भारत के छात्रों की पढाई का स्तर उच्चतम स्तर पर पहुँच गया है लेकिन विश्व  पर उच्च शिक्षा में भारत के संस्थान और भारत के छात्र अदृश्य हैं| हम आज भी अच्छी शिक्षण सामग्री के लिए विदेशों में पर ही निर्भर हैं| दूसरा पहलू अधिक संवेदनशील है कि क्या छात्रों के ज्ञान का स्तर भी उनके नम्बरों जितना ही है?
सर्व शिक्षा अभियान की शुरुआत 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को संतोषजनक गुणवत्ता की मुफ्त शिक्षा दिए जाने के उद्देश्य से की गयी थी| उपस्थिति कम होने के चलते मध्यान्ह भोजन योजना (मिड डे मील) की शुरुआत हुई| इन दोनों योजनाओं की प्रतिबद्धता शिक्षा की बेहतरी के लिए थी लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं हुआ| मीडिया ने सैकड़ों बार इन योजनाओं और ऐसे स्कूलों की कलई उजागर की है| गुणवत्तापरक शिक्षा के न होने पर मध्यम वर्ग निजी स्कूलों की तरफ रुख करने को मजबूर है जहाँ एडमिशन के लिए उन्हें जेब ढीली करनी होती है| इसके बाद आठवीं तक बच्चों को फेल करने पर मनाही है| इससे फायदे कम और नुकसान अधिक हुए हैं| फेल होने का डर न होने की वजह से बच्चा और अभिभावक दोनों ही शिक्षा को महत्व नहीं देते और दसवीं में छात्रों को फेल किये जाने पर परोक्ष रूप से रोक भी है| बोर्ड में कॉपी चेक करने वाले टीचर नम्बर देने में उदारता दिखने लगे हैं क्यूंकि ऐसा न करने पर उनके खिलाफ कारवाई हो सकती है| शिक्षा का नया सत्र आरम्भ होने को है| कॉलेजों में दाखिले की प्रक्रिया शुरू हो गयी है लेकिन सवाल जस का तस है कि क्या इतनी अधिक मेरिट इस बात का प्रमाण है कि भारत देश में दूसरे देशों के मुकाबले शिक्षा बेहतर है? आंकड़े इस सवाल का जवाब बेहतर देते हैं| उत्तर प्रदेश के ही आंकड़ों की सुनें तो 2008 के बोर्ड एग्जाम में उत्तर प्रदेश में लगभग 60 प्रतिशत बच्चे फेल हुए| उसके बाद एकदम से पास होने वाले प्रतिशत में इजाफा हुआ और 2013 में ये आंकड़ा घटकर 15 प्रतिशत के आसपास रह गया| प्रतिशत तो कम हुआ लेकिन पढाई का स्तर ऊँचा नहीं हुआ| और आजकल के परीक्षा परिणामों पर गौर करें तो अब पास और फेल की बात नहीं रह गयी है अब 95 से 100 प्रतिशत की अंधी दौड़ है| 95 प्रतिशत से कम अंक पाने वाले छात्र औसत कहलाने लगे हैं| लेकिन कडवी सच्चाई यही है कि अभी तक विषय की समझ रखने वालों का प्रतिशत न्यूनतम से भी न्यूनतम स्तर पर है और बिहार में हुई नक़ल की तस्वीर तो देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी चर्चा का विषय बनी| ये तस्वीर साफ़ साफ़ हमे आइना दिखाती है कि हमारे देश में जोर केवल मार्कशीट में छपे नम्बरों पर है न कि ज्ञान अर्जित करने पर|

उच्च शिक्षा का हाल तो इससे भी अधिक बुरा है| यूएसए और चीन दोनों देशों को मिलाकर पास होने वाले इंजीनियर ग्रेजुएट से अधिक भारत में हर साल पास होते हैं| हर साल एक लाख एमबीए भारत के प्रबंधन संस्थानों से निकलते हैं| एक हज़ार के आसपास पीएचडी की डिग्री प्रदान की जाती है लेकिन फिर भी बेरोजगारी कायम है| इसका एक कारण यह हो सकता है देश में नौकरियों की कमी हो लेकिन इस का बड़ा कारण यही दिखता है कि गुणवत्तापरक शिक्षा का अभाव है| सिलेबस समय से पूरा कराने और ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने पर ही कॉलेजों का सारा जोर रहता है| मानसिकता ये है कि केवल अच्छे नंबर लाने वाले ही सफल है जबकि वास्तविकता में ज्ञान का नंबरों से कोई लेना देना नहीं है| यदि हमें विश्व में अपनी पहचान बनानी है तो समय आ गया है इस देश की शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव किये जाएँ और ये बदलाव प्राथमिक स्तर से ही शुरू हों| जोर नंबरों पर नहीं बल्कि कौशल के विकास पर हो जिससे हर बच्चा अपने हुनर को पहचान कर उसी क्षेत्र में आगे बढे| 

Jun 5, 2015

गुज़री हुई बहार की एक यादगार हूँ

काँटा समझ के मुझसे न दामन बचाइए.. गुज़री हुई बहार की एक यादगार हूँ. 


मुशीर झंझानवी का यह शेर अक्सर मैं गुनगुनाया करती हूँ. मैं अब कौन हूँ, सोचती हूँ तो छाती चीख़ उठती है मेरी, लेकिन मेरे पिछले वक़्त की यादें अक्सर मुझे एक भीनी फुहार के साथ माटी की सुगंध का एहसास करा जाती हैं। मैं गोमती हूं. आज अपनी हालत देखती हूँ तो बस दिल भर आता है। सोचा आज अपनी कहानी कहकर दिल का गुबार निकल लूँ.. मेरी आत्मा की मौत पहले ही हो चुकी है बस अब इस शरीर का जाना बाकी है.. 
एक वक़्त वो भी था जब मैं अपने रंग रूप पर इठलाया करती थी.. गोमत ताल से चलते हुए मैं बस छलछलाती, चहकती, कल-कल करती उमंगों से भरी बस बहती जाती थी.. गुरूर था कि लखनऊ, जौनपुर जैसे कई शहरों को बसने का आसरा मैंने दिया है और सुकून था मेरा भविष्य इन्हीं सुरक्षित हाथों में है। अब भी मुझे वो शामें याद आती हैं जब छतरमंजिल से नवाबों की बेग़म मेरी और ताकती थीं और अपने दिल के ख्यालों को हूबहू वे मेरे स्वच्छ, निर्मल जल में देख पातीं थीं। संगीतकारों की धुनों से मेरी लहरें आबाद रहती थीं। लखनऊ की गोमती ..कभी नदी थी अब नाला बन गयी है कई शायरों की शायरी का उद्गम मैं ही हूं. शामें शायराना और दिन बेपनाह खूबसूरत हुआ करते थे.. ऐसी कई तारीखों की दौलत से दौलतमंद थी मैं. नाज़ था मुझे कि मैं नवाबों के शहर मैं हूँ और इनकी नवाबियत पर. कि हमेशा यह अपनी माँ जैसे मेरा ख्याल रखेंगे. मुझे जिंदा रखेंगे.. कहने को हाँ जिंदा तो रखा मुझे लेकिन मेरे रंग रूप को उजाड़ दिया.. कभी नदी थी अब नाला बन गयी है, कभी जीवनदायिनी थी अब प्राण हरने वाली बन गयी है। 


 जो मछलियां, जीव जंतु कभी मेरे पानी में अपने जीवन को संवारते थे, आज एक किनारे पर मरे मिलते हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि मेरे अन्दर घुली हुई ऑक्सीजन की कमी हो गयी है जिससे मेरे अन्दर रहने वाले जीव जंतु मर रहे हैं। मैं चाह कर भी इन्हें नहीं बचा पाई क्यूंकि अब मेरी शक्ति भी क्षीण हो चुकी है। मैं खुद इस घुटन में साँसे नहीं ले पाती, मेरा नीला बहता नीर आज रुका हुआ काला बदबूदार पानी बन गया है..सोचा नहीं था कि अपनी इन्हीं आँखों से अपना ये हश्र देखूंगी। लखनऊ के बीच से निकलती हुई मैं सोचती थी कितना भव्य होगा मेरा इस दुनियां से जाना लेकिन नए लखनऊ और पुराने लखनऊ के बंटवारे ने मेरे बारे में सोचने का किसी को वक़्त ही नहीं मिला।  हुक्मरानों ने नए लखनऊ को सँवारने में ही समय लगा दिया, पुराना लखनऊ मसरूफ हो गया। मुझे याद करने के दो पल भी नहीं मिले किसी को। मैंने लखनऊ के लोगों के साथ यहाँ की आबोहवा को भी बदलते देखा है.. कभी-कभी अंगड़ाई लेते हुए जब में एक लम्बी सांस भरती थी तो एक ताज़ी, सुहानी हवा मुझे ताज़गी का एहसास कराती थी लेकिन अब जब मैं कभी अंगडाई लेकर साँस लेती हूँ तो एक घुटन भरी हवा मेरे ज़ख्मों को हरा करते हुए निकल जाती है अब मैं किसी की नहीं हूं. हिन्दू मान्यता को मानने वाले एकादशी के दिन मुझमे नहाया करते थे और ऐसा मानते थे कि ऐसा करने से उनके पाप धुल जायेंगे लेकिन अब लोग मुझमे पैर डालने से भी बचते हैं, पीना तो दूर की बात है और तो और पूजा सामग्रियां फेंक पर मुझे और प्रदूषित करते जा रहे हैं।. 


हाँ कभी कभार कुछ लोग मुझे साफ़ करने की पहल किया करते हैं लेकिन मैं एक नदी हूँ जो एक नाले में तब्दील हो चुकी है.. शहर भर का कचरा डाल कर, शहर भर के नालों को मुझमें मिलाकर, पूजा सामग्री और मृत अवशेष बहा कर मुझे इस हद तब प्रदूषित किया गया है कि अब इतनी आसानी से मेरा साफ़ होना मुमकिन नहीं है। मुझे साफ़ करने के लिए एक दिन नहीं बल्कि सतत प्रयासों और ज़िम्मेदाराना संजीदगी की ज़रुरत है।मैं आज भी जीवनदायिनी हूँ बस मुझे यहाँ के बाशिंदों के थोड़े से सहारे की ज़रुरत है।

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