May 7, 2015

हमें शिद्दत से है सिविक सेंस की दरकार


दुनियां में पैदा होने वाला हर बच्चा पांच सेंस के साथ पैदा होता है. धीरे धीरे बड़े होने पर एक सेंस उसे खुद से सीखना होता है. इस सेंस को हम सिविक सेंस कहते है. सिविक सेंस का अर्थ उन अलिखित नियमों से है जो हमारे और दूसरे की सहूलियत के लिए बनाये जाते हैं. कुछ बातें हमने चलते फिरते पढ़ी होंगी जैसे कृपया यहाँ गन्दा न करें, यहाँ गाडी खड़ी करना मना है, कृपया प्याऊ से पानी बर्बाद न करें, इस दीवार पर पेशाब न करें, यहाँ थूकना मना है, कृपया बाएं हाथ पर चलें, रेड लाइट पर रुकें, कृपया बायीं ओर चलें, चलती सड़क पर न थूकें, यहाँ विज्ञापन लगाना मना है, ज़ेब्रा क्रासिंग पर रुकें, फूल तोडना मना है, नो पार्किंग, सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान न करें, कृपया पेट्रोल पंप पर मोबाइल बंद कर लें... जिन्हें हम गाहे-बगाहे यहाँ वहां पढ़ते रहते हैं. ये सारी सिविक सेंस के अंतर्गत आती हैं. इनमे हमे ज़्यादातर चीज़ों के लिए हमें मना किया जाता है कि ऐसा न करें पर क्यूँ? हमारे ख़ुद को जवाब कुछ इस तरह होते हैं कि अगर हम ऐसा करेंगे भी तो कौन हमें रोकेगा और फिर हम इतनी सारी बातें क्यूँ माने, ये सब तो लोग लिखते ही हैं, अरे ठीक है जो मन आये करो, इतना कौन सोचे, ठीक है हो गया हो गया देखेंगे आगे. ऐसा ही कुछ, है न. या तो हम लोग इन नियमों की अनदेखी कर देते हैं या हम लोगों को इन्हें जानबूझकर तोड़ने में बड़ा मज़ा आता है. इसके पीछे की वजह क्या हो सकती है? आपने कभी सोचा है कि हम लोगों के लिए इतने निर्देश क्यूँ लिखे रहते हैं और क्यों सिविक सेंस जैसी आम चीज़ के लिए भी हम लोगों को बताना पड़ता है.
कभी आपने सोचा की आखिर हमारे देश में सिविक सेन्स लोगों की प्राथमिकता में क्यों नहीं है.बढ़ती जनसँख्या शहरों पर बोझ डाल रही है. इस वक़्त भारत रूरल-अर्बन डिवाइड की समस्या से जूझ रहा है. जो ग्रामीण हैं वो इन सब चीज़ों से अनजान हैं और शहर में रहने वाले लोग इन निर्देशों को अनदेखा करते हुए निकल जाते हैं क्यूंकि उन्हें यहाँ रहते समय हो गया और समय के साथ चीज़ों की अहमियत कम हो जाती है. जो कस्बाई लोग हैं वो जानते हैं कि उन्हें शहर एक या दो दिन के लिए आना है तो वो इन निर्देशों की गंभीरता को नहीं समझते. अपनी सहूलियत का अधिक ख्याल करते हुए लोग कार में से सड़क पर पानी की बोतल, चिप्स के खाली पैकेट और गाड़ी चलाते वक़्त अचानक से गाड़ी का दायाँ दरवाज़ा खोलकर पान की लम्बी पीक बाहर निकालते हैं और सड़क को गन्दा करते हैं या ज़्यादातर लोग ख़ासकर औरतें चलती बस में से बाहर उल्टी कर देते हैं. क़ायदे से वो एक पोलिथीन अपने साथ रख सकते हैं कि अगर उन्हें उल्टी आये तो वो उसका इस्तेमाल करें और बाहर निकल कर उसे कूड़ेदान में फ़ेंक दें लेकिन ऐसा होता नहीं है. रेलवे स्टेशन पर साफ़-साफ़ शब्दों में लिखा रहता है कि यहाँ गंदगी न करें लेकिन लोग चाय के कप, बोतल लोग यूँ ही पटरी पर फेंक देते हैं. हद तब हो जाती है जब छोटे छोटे बच्चों की माएँ अपने बच्चों को वहीँ शौच करवाती हैं या उनके नैपकिन्स वहीँ डाल देती हैं. लोग इस बात से अनभिज्ञ बने रहते हैं कि इस तरह खुले में गंदगी करने से उनके स्वास्थ्य पर ही उल्टा असर पड़ेगा. मन का करना हमेशा अच्छा होता है लेकिन नियमों का पालन भी ज़रूरी होता है खासकर तब जब बात सिविक सेंस की हो. आप किसी गंदगी करेंगे या ग़लत जगह गाड़ी खड़ी करेंगे तो हो सकता है उस दिन आपको सहूलियत हो जाये लेकिन उसके बाद आप उम्मीद नहीं कर सकते कि आपको साफ़ जगह मिलेगी या फिर आप किसी और की ग़लती की वजह से जाम में नहीं फसेंगे. जाम से ख्याल आया शहरों में जाम लगने का सबसे बड़ा कारण गाडी पार्किंग में न खड़ा कर के रोड पर ही आड़ा तिरछा खड़ा कर देना या फिर दूसरे से आगे निकलने की जल्दी में आते हुए ट्रैफिक  की दिशा में गाडी घुसा देना जिससे ट्रैफिक की जिस दिशा में जाम नहीं लगा वहां भी जाम लग जाता है .जरा सोचिये अगर हम थोडा देर इन्तजार कर लेते तो शायद जाम उतना लम्बा नहीं होता जितना किसी एक की गलती से हो गया.
सिविक सेन्स एक ऐसी चीज है जिसे कानून बना कर हमारी आदत में शामिल नहीं किया जा सकता वह भी ऐसे देश में तो बिलकुल भी नहीं जहाँ आधी से ज्यादा जनसँख्या निरक्षर हो वहां हर काम सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता .सिविक सेन्स तो लोगों को जागरूक बना कर ही किया जा सकता है.अगर हमें इस बात का एहसास हो जाए कि इसमें ही हम सबका भला है तो लोग खुद बा खुद वो नियम मानने लग जायेंगे जिसमें सबका भला है.आप भी सोच रहे होंगे कि ये होगा कैसे.गुड क्वेशन अरे भाई जो भी गलती करे उसे प्यार से समझाओ कि ये शहर ये दुनिया आपकी ही है अगर आप अपने आस पास के परिवेश को साफ़ सुथरा नहीं रखेंगे तो कौन रखेगा.हाँ इस काम में मेहनत भी लगेगी और समय भी फिर आदतें बदलते ,बदलते ही बदलती हैं.सोशल मीडिया का सहारा लीजिये अपने आस पास अगर कोई ऐसा कर रहा है उसकी तस्वीर खींच कर सोशल मीडिया पर अपलोड कर दीजिये. फिर ,फिर क्या सोच क्या रहे हैं लग जाइए काम पर अगर एक दिन में कोई एक आदमी आपके कारण सिविक सेन्स की यूटीलटी समझ रहा है तो मान लीजिये कि इस देश को बदलने में कुछ हिस्सा आपका भी है .



May 2, 2015

शोध के लिए तय करनी होगी लम्बी दूरी


ज्ञान की इस दुनिया में अपनी बात को पुष्टता से कहने के लिए आंकड़ों की जरुरत होती है|आंकड़े जहाँ तथ्य की पुष्टि करते हैं वहीं भविष्य के विमर्श के लिए रास्ता भी खोलते हैं | सभी  आंकड़े एक निश्चित  शोध प्रक्रिया से हासिल होते हैं. आंकड़े वे आधार है जिनसे कथ्य में प्रमाणिकता आती है |सोशल मीडिया में हम उन्हीं बातों पर ज्यादा महत्त्व देते हैं जो आंकड़ों द्वारा पुष्ट किये गए हों चाहे वह किसी खास विषय जैसे विज्ञान या साहित्य से जुडी हो या फिर जीवन या हमारी आदतों के बारे में. लेकिन गौर करने वाली बात ये है कि इनमे से कितने शोध भारत के होते हैं? आंकड़ों पर नज़र डालेंगे तो अमेरिका ने वर्ष 2008 में 48,802 पीएचडी की डिग्री प्रदान की. चीन के शिक्षा मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट पर प्रकाशित सूचना के अनुसार चीन ने वर्ष 2010 में 48,069 पीएचडी की डिग्री प्रदान की. यानि की अमेरिका साल में सबसे ज्यादा डॉक्टरेट या पीएचडी की उपाधि प्रदान करने वाला देश है. उसके बाद चीन और जर्मनी का स्थान आता है. इस संदर्भ में  भारत को अपनी जगह बनाने के लिए अभी  लम्बी दूरी तय करनी है फिर भी नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज के अनुसार पिछले दस वर्षों में भारत ने 45,561 पीएचडी की डिग्रियां प्रदान की. संख्या बहुत अधिक कम है. 2010 में प्रकाशित नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज, इनफार्मेशन एंड लाइब्रेरी नेटवर्क सेंटर (इनफ्लिबनेट) और टाटा कंसल्टेंसी सर्विस की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में रिसर्च एंड डेवलपमेंट विभाग,अकादमिक रिसर्च में केवल तीन से चार प्रतिशत का निवेश करता है. इसी रिपोर्ट के अनुसार ही भारत में उच्च शिक्षा के सभी छात्रों में से केवल 0.65 प्रतिशत ही पीएचडी के लिए नामांकन करते हैं. शोध में छात्रों का घनत्व हमारे यहाँ केवल 1.49 है जबकि अमेरिका  में यह 139.5 ,122.4 चीन में, 71.0 जापान में, 28 जर्मनी में और 20.4 फ्रांस में है. आंकड़े अपनी बात स्पष्ट रूप से कहते हैं कि हमारे यहाँ शोध को उतनी तवज्जो नहीं दी जाती .
उच्च शिक्षा में शोध के रूप में होने वाला निवेशन रोजगारपरक नहीं है और इसलिए शोध महज शोध करने के लिए हो रहे हैं समाज या विषय को समझने के लिए नहीं |महत्वपूर्ण है कि भले ही हमारे विश्वविद्यालय आंकड़ों में पी एच डी की खानापूरी तो कर रहे हैं पर जब बात वैश्विक स्तर पर प्रतियोगिता की आती है तो वहां हम काफी नीचे रह जाते हैं |यानि शोध में गुणात्मक तौर पर भारत का कोई ख़ास योगदान नहीं है पर संख्यात्मक द्रष्टि से भले ही आंकड़े एक बेहतर तस्वीर देते हों |
सांस्कृतिक रूप से भारतीय समाज श्रोत परम्परा आधारित समाज रहा है जहाँ सवाल उठाने या पूछने की कोई जगह नहीं रही है और यह एक बड़ा कारण है कि एक सामान्य विद्यार्थी उच्च शिक्षा के बाद एक अदद नौकरी करना चाहता है न कि वह एक पूर्णकालिक शोध कर्ता के रूप में विषय या समाज को समर्ध करना चाहता है |इस मानसिकता को बदलने की जिम्मेदारी युवाओं पर है और सरकार को शोधकर्ताओं को लगातार प्रेरित करना होगा |

सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र चिकित्सा विज्ञान  में हालात कोई ख़ास उम्मीद नहीं जगाते | ज़्यादातर दवाइयां का पेटेंट विदेशी शोधकर्ताओं के पास हैं समस्या के समाधान के लिए सरकार अपने स्तर पर प्रयास कर रही है सरकार हर साल पीएचडी करने वालों को और इसके करने के बाद आगे शोध के लिए छात्रवृति और फ़ेलोशिप के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान करती है. यूजीसी हर साल जूनियर रिसर्च फेलोशिप के नाम पर हजारों रुपये हर महीने एक शोध छात्र को देती है. यह सब इसलिए है जिससे बिना किसी आर्थिक संकट के शोध छात्र आराम से अपने शोधकार्य को पूर्ण कर सकें लेकिन जमीनी स्तर पर सच्चाई इसके विपरीत है.चूँकि भारत में शोध कार्य नौकरी की गारंटी नहीं देते इसलिए शोधार्थी अपने शोध को खासकर मानविकी जैसे विषयों में उतनी गंभीरता और प्रतिबधता से नहीं करते जितनी किसी शोध कार्य में उम्मीद की जाती है |
यू जी सी के पहल शोध गंगा भारत के विश्विद्यालयों में हो रहे समस्त शोध कार्यों को एक साथ  ऑनलाइन लाने की अच्छी पहल है पर इस परियोजना को पर्याप्त रूप से समस्त विश्विद्यालयों का समर्थन नहीं हासिल हो पा रहा है |
सोशल नेटवर्किंग साईट्स के प्रसार और युवाओं की विशाल संख्या आज देश के सामने शोध के क्षेत्र में उभरने का एक मौका दे रही है अब देखना है युवा इस अवसर का इस्तेमाल कैसे करेंगे |



Apr 15, 2015

मौसमी मिजाज ने छीनी अन्नदाता से रोटी और हम कहते हैं वाह क्या मौसम है...

मौसमी मिजाज ने छीनी अन्नदाता से रोटी और हम कहते हैं वाह क्या मौसम है...

सर पर साफ़ा, सूती कुरता, घिसा हुआ पजामा, जगह-जगह से फटी मोजरी, झुलसी हुई त्वचा, शरीर छूने पर चुभती हड्डियाँ, माथे पर चिंता की चिर लकीरें और आँखों में बुझती सी उम्मीद...
एक कृषि प्रधान देश के किसान की यही पहचान है| पिछले कुछ दिनों में किसानो के साथ जो भी हुआ उसकी कल्पना करना भी दुखद है. इस साल के शुरुआत से अब तक करीब 250 किसानों ने आत्महत्या कर ली और पिछले साल करीब 1109 किसानों ने| अजीब लगता है न कि जो किसान देश भर के लोगों का पेट भरता है वो किसान खुद के घर का पेट नहीं भर पाया|
बादलों का इंतज़ार प्रेमियों के अलावा किसान भी करता है
बादलों का इंतज़ार प्रेमियों के अलावा किसान भी करता है क्योंकि उसे लगता है कि बारिश की अमृत बूंदे जब उसके खेत की मिटटी को अपने आँचल में समेत लेंगी तो जो उसकी ज़मीन सोना बरसायेगी और वो ख़ुद के घर के साथ हज़ारों घरों को रोटी दे पायेगा लेकिन जब वही अमृत बूँदें कहर ढाने पर आमादा हो जाती हैं तब केवल भगवान के आगे हाथ फ़ैलाने के अलावा उसके पास कुछ नहीं बचता, उम्मीद भी नहीं। उसकी एक मात्र पूंजी, उसकी फसल को ओलावृष्टि अपने तले रौंद देती है तब हम एहसास भी नहीं कर सकते कि अपनी पूंजी को यूँ लुटता देख उसका दिल चीत्कार कर उठा होगा. सोच कर बड़ा अजीब लगता है जब हम खुद को पतला करने की खातिर "हेल्दी फ़ूड" खा रहे होते हैं या खाना छोड़ देते हैं और जिनकी वजह से हम खा पा रहे हैं उनके बच्चे भूखे पेट सो जाते हैं।

अपने परिवार को यूँ तन्हा छोड़कर जाने की हिम्मत करना आसान नहीं होता, शायद वो समझ चुके होते हैं कि अब कम से कम वो अपने परिवार को नहीं पाल सकेंगे और इस दुःख में खुद को डुबोकर फिर से परिवार के लिए बोझ बनकर जीने से अच्छा वो मरना पसंद करते हैं, वे तो मर जाते हैं उनके परिवार पर इसके बाद क्या असर पड़ता है इसकी भी कल्पना करना हम सबकी सोच से परे है। उस किसान की अपने बच्चे को बड़ा अफ़सर बनाने की आशा के चीथड़े हाथ में आते हैं, जवानी में बूढ़ी हो गयी बीवी के आने वाले सुनहरे दिनों की उम्मीद हवा बनकर उसी के सफ़ेद-काले बालों को और बिखरा कर निकल जाती है, क़र्ज़ में डूबे परिवार को उससे निकालने की ज़द्दोजहद किसान को समय से पहले ही चिंताओं का किला बना देती है और ये चिंता धीरे धीरे उसकी चिता तैयार कर रही होती है, अब इन सबका कारण कौन? शायद कोई नहीं।
हम जैसे लोगों को सुहाने मौसम से मतलब है और राजनीतिज्ञों को इनकी मौत पर एसी कमरे में से बैठकर राजनीति करने से,कारण यही लोग खुद हैं जिन्हें उनका हक़ भी एहसान समझ कर दिया जाता है।
आम लोगों को मौसम से और नेताओं को राजनीति से मतलब है

इस देश में आय का वितरण बेहद असमान है, अमीर और अमीर होता जा रहा है और गरीब के पास अब कुछ बचा नहीं है। एक किसान भूखे पेट अपनी जान दे देता है और एक तरफ रोटी की जगह पिज़्ज़ा, बर्गर सरीखे विकल्प मौजूद हैं


जिस असमय मौसम में हम बारिश में चाय पकौड़ों का लुत्फ़ ले रहे होते हैं ठीक उसी वक़्त उन बेवक्त आंधी, ओले और बारिश की बूंदों से आहत सैकड़ों जानें रस्सी का एक सिरा गले में बांधकर खुद को इन सब परेशानियों से आज़ाद कर लेती हैं और उनके परिवार के लिए अब जब-जब बारिश होगी, उनके जख्मों पर नमक की बूंदे डाल कर उन्हें को हरा कर देगी और हम कह रहे होंगे कि आहा कितना सुहाना मौसम है।

Read more at: 
http://hindi.oneindia.com/news/features/rains-destroy-50-000-hectares-of-crops-farmer-suicides-continue-350975.html

Apr 5, 2015

नया हो अब जहाँ हमारा ..

बीबीसी पर औरतों से जुड़े कानूनों के बारे में एक खबर पढ़ी. आप भी एक नज़र डालिए.

दिल्ली में 2012 के निर्भया कांड के बाद दुनिया भर में भारत की थूथू हुई. लेकिन एक साल बाद ही कानून में एक नई धारा जोड़ी गई जिसके मुताबिक अगर पत्नी 15 साल से ज्यादा उम्र की है तो महिला के साथ उसके पति द्वारा यौनकर्म को बलात्कार नहीं माना जाएगा. सिंगापुर में यदि लड़की की उम्र 13 साल से ज्यादा है तो उसके साथ शादीशुदा संबंध में हुआ यौनकर्म बलात्कार नहीं माना जाता.

माल्टा और लेबनान में अगर लड़की को अगवा करने वाला उससे शादी कर लेता है तो उसका अपराध खारिज हो जाता है, यानि उस पर मुकदमा नहीं चलाया जाएगा. अगर शादी फैसला आने के बाद होती है तो तुरंत सजा माफ हो जाएगी. शर्त है कि तलाक पांच साल से पहले ना हो वरना सजा फिर से लागू हो सकती है. ऐसे कानून पहले कोस्टा रीका, इथियोपिया और पेरू जैसे देशों में भी होते थे जिन्हें पिछले दशकों में बदल दिया गया.

नाइजीरिया में अगर कोई पति अपनी पत्नी को उसकी 'गलती सुधारने' के लिए पीटता है तो इसमें कोई गैरकानूनी बात नहीं मानी जाती. पति की घरेलू हिंसा को वैसे ही माफ कर देते हैं जैसे माता पिता या स्कूल मास्टर बच्चों को सुधारने के लिए मारते पीटते हैं.

सऊदी अरब में महिलाओं का गाड़ी चलाना गैरकानूनी है. महिलाओं को सऊदी में ड्राइविंग लाइसेंस ही नहीं दिया जाता. दिसंबर में दो महिलाओं को गाड़ी चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया और उन पर मुकदमा चलाया गया. इस घटना के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार संस्थानों ने आवाज भी उठाई. मिस्र के कानून के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति अपनी पत्नी को किसी और मर्द के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देखता है और गुस्से में उसका कत्ल कर देता है, तो इस हत्या को उतना बड़ा अपराध नहीं माना जाएगा. ऐसे पुरुष को हिरासत में लिया जा सकता है लेकिन हत्या के अपराध के लिए आमतौर पर होने वाली 20 साल तक के सश्रम कारावास की सजा नहीं दी जाती.

ये दुनियां कितनी भी बदल जाये लेकिन औरतों को लेकर सोच शायद ही कभी बदले. बलात्कार शब्द कह देना जितना आसान होता है उतना ही मुश्किल है उसे समझना. ज़्यादातर लोग बलात्कार को केवल शारीरिक संबध के तौर पर देखते हैं. यह केवल महिलाओं की वर्जिनिटी का हनन है. दुनिया के ऐसे सभी महाशयों से में सिर्फ इतना कहना चाहूंगी के मन की पीड़ा समझना आपके बस की बात नहीं. आपसे समझने की उम्मीद करना ही बेमानी है.

पति ग़लती सुधरने के लिए पीट सकता है, लेकिन ग़लती तो पुरुष भी करते हैं तो औरत क्या करे, लोगों के हिसाब से वो चुप रहकर अपने पत्नी धर्म का पालन करे और बात को जाने दे. न ही हम गाडी चलायें न ही अपने अपहरण करने वाले को सज़ा दें.

लोगों का तो काम ही है बातें करना लेकिन जब क़ानून इस तरह की बात करे तो इससे होने वाली व्यथा का अंदाज़ा लगाना इन कानून बनाने वालों के लिए मुश्किल है.


ये इसलिए नहीं है कि आप हम पर तरस खाएं, जी नहीं, बिलकुल नहीं. सिर्फ आपको बताने के लिए कि  यदि आप हमें हमारे हक़ से दूर रखना जानते हैं तो हमने भी अपना हक छीनना सीखा है और वो हम करेंगे भी. पढेंगे, नौकरी करेंगे, आर्थिक स्वतंत्रता हासिल करेंगे, स्वयं के निर्णय खुद लेंगे और अपने लिए ऐसी छत भी ज़रूर बनायेंगे जहाँ आपकी सड़ी-गली मानसिकता के कीड़े न पहुँच पायें. 


Apr 1, 2015

तो काबिल होने के लिए पढ़िए..

अबे कितना पढ़ा तूने?  मुझे तो समझ ही नहीं आया कि शुरू कहाँ से करूँ. तूने तो सारा पढ़ लिया होगा न  ? नहीं यार , इतना पढ़ते होते तो यहाँ होते, हाँ पास होने की गारंटी है. बाकी और कुछ चाहिए भी नहीं. और सुन, गाय हमारी माता है.. हमको कुछ नहीं आता है.. और एक जानी पहचानी खिलखिलाहट भरी हँसी के साथ सब हँस पढ़ते है. पेपर देने से पहले ऐसे ही कुछ बातें करते हैं न हम. हाँ वैसे एग्जाम टाइम में बड़ा मज़ा आता है न ऐसे बोलने में.  लेकिन इस मज़े में क्या छुपा है आइये आपको बताते हैं. होता यूँ है कि जब हम खुद को बार बार दूसरों के सामने पढाई में कमज़ोर जताना चाहते हैं तो धीरे धीरे हम वाकई में कमज़ोर होते जाते हैं. हम हमेशा इसी बात पर जोर देते रहते हैं कि हमको कुछ नहीं आता है बजाय इस बात पर जोर देने के कि हाँ मुझे इतना आता है और इतना तो बहुत अच्छे से आता है. अगर अच्छे नंबर आ गए तो ठीक वरना हमने तो पहले ही कह दिया था कि हमे कुछ नहीं आता. इससे हम बेशक दूसरों के सामने बच जाएँ लेकिन खुद में हम आगे बढ़ना सीखना छोड़ देते हैं. अब आपको मेरी बात कुछ कुछ समझ में आने लगी होगी. किसी दोस्त के पूछने पर कि क्या ये तुमने पढ़ा है तो हम सीधे सीधे कहने के बजाय कि हाँ मैंने ये पढ़ा है, हमारा कहना होता है कि कहाँ यार.. कुछ नहीं पढ़ा. उसके बावजूद एग्जाम में अपना धर्म समझकर कॉपियों पर कॉपियां भरते चले जाते हैं और हमारा सारा जोर एग्जाम में अच्छे प्रतिशत लाने पर होता है और रिजल्ट आने के बाद हम दूसरों से ये सुनना पसंद करते हैं कि अच्छा.... तुमने तो कहा था कि तुम्हें कुछ नहीं आता लेकिन इतने अच्छे परसेंट कैसे आ गए और हम विजयी मुद्रा में बस मुस्कुरा देते हैं लेकिन हम उसके बावजूद भी ये नहीं कहना चाहते कि हाँ मुझे इस विषय में इतना आता है. समझ आया कुछ. चलिए अब थोडा और सीरियसली बात करते हैं..
आंकड़ों की मानें तो भारत में हर साल लगभग 1.5 मिलियन इंजीनियर ग्रेजुएट हर साल पास होते हैं. ये संख्या यूएसए और चीन दोनों की संख्या मिलाकर भी ज्यादा है. तकरीबन एक लाख एमबीए डिग्री हर साल दी जाती है. तकरीबन एक हज़ार के आसपास पीएचडी अवार्ड की जाती है. सरकार भी बच्चों की पढाई पर सरकारी बजट का एक बड़ा हिस्सा खर्च करती है. सोचने वाली बात ये है कि हमारे पास जब इतने कॉलेज हैं, सुविधाएँ हैं, मौके हैं, डिग्रियां हैं और हर साल लाखों लोग इन डिग्रियों को हासिल भी कर रहे हैं, तो इतने पढ़े लिखे लोगों का देश होने के बावजूद दुनिया के धरातल पर हम अब भी पढ़े लिखे नहीं माने जाते हैं. भारत में डिग्री की वैल्यू कुछ यूँ है कि अगर कोई डिग्री नौकरी नहीं दिला पाती है तो वह बेकार है. इसीलिये हमारे यहाँ केवल डॉक्टर और इंजीनियर बनने को ही अच्छी पढाई माना जाता है लेकिन इकनोमिक टाइम्स के अनुसार हर साल पास होने वाले इंजीनियर में से 20 से 33 प्रतिशत बेरोज़गार हैं. थोडा अजीब लगा न जानकर. एक और अजीब सी लगने वाली बात ये भी है कि हर साल पास होने वालों की संख्या इतनी ज्यादा है, इंजीनियर डॉक्टर की भरमार है फिर भी इस क्षेत्र में देश का नाम करने वालों की संख्या कम. क्यूँ? थोडा सा पीछे मुड़कर अपने पढाई करने के तरीके को देखेंगे तो आपका इसका जवाब मिल जायेगा. हम खुद को नंबर पाने की दौड़ में उलझाये रखना चाहते हैं. रटकर, नक़ल करके या कैसे भी करके बस पचहतर प्रतिशत से ज्यादा आ जाये. हमारे देश में केवल प्रतिशत की अंधी दौड़ में दौड़ने और एक अदद नौकरी पाने को ही सब कुछ माना जाता है. इसलिए नया लिखने या पढने की इच्छा या तो जन्म नहीं ले पाती या फिर हम उससे खुद ही किनारा कर लेते हैं और धीरे-धीरे ये हमारे पढ़ने और पढ़ाने का तरीका बन जाता है कि केवल नंबर ले आओ बाकी सब तो जुगाड़ करवा ही देती है और एक बार नौकरी लग जाये तो फिर पढ़ने की ज़रुरत ही क्या है और यही सोच हमे कुछ नया नहीं सीखने देती. आप खुद ही सोचिये कि जब हम किसी अच्छी किताब, मॉडल, थ्योरी या अविष्कार की बात करते हैं तो हमेशा विदेशी नामों से ही टकराते हैं. टीचर्स हों या स्टूडेंट्स, विदेशी लेखकों की किताबों को ही पढ़ते-पढ़ाते हैं. भारतीय नामों को तो ऊँगली पर गिना जा सकता है. रिसर्च के क्षेत्र में तो भारतीय नाम बहुत ढूंढने पर भी शायद नहीं मिल पाएंगे. कारण फिर वही.. पास होना और नौकरी पाना. यही हमारी जिंदगी का लक्ष्य बन जाता है और खुद को कमतर आँकने की हमारी आदत. बहुत सिंपल सी बात है हम जैसा खुद को दूसरों के सामने दिखायेंगे वैसा ही हम धीरे धीरे ख़ुद बनते भी जायेंगे और इस तरह से जो कुछ कर सकने की हम क्षमता रखते हैं वो भी नंबरों के पीछे भागने में वेस्ट हो जाएगी. इस नंबर दौड़ से तो किसी का भला होने से रहा तो जनाब बाबा रणछोड़ दास की सलाह मानिए. “नौकरी पाने के लिए नहीं बल्कि काबिल होने के लिए पढ़िए. सर्कस में तो शेर भी करतब दिखा लेता है लेकिन हम उसे वेल ट्रेन्ड कहते हैं वेल एजुकेटेड नहीं”. ज़रा सोचिये कितना अच्छा हो कि जब कोई हमसे पूछे कि तुम्हें कितना आता है और हम कहें कि गाय हमारी माता है ..इसीलिये ही हमे सब कुछ आता है.

Mar 8, 2015

गुणवत्ता को महज आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता


आंकडें बताते  है कि भारत धीरे धीरे साक्षर हो रहा है. आंकड़े कहते हैं कि आल इंडिया स्कूल एजुकेशन सर्वे के अनुसार भारत में प्राइमरी से हायर सेकंड्री तक कुल मिलाकर 1,306,992 स्कूल हैं. यूजीसी के अनुसार कुल 693 यूनिवर्सिटीज हैं जिनमे 45 सेंट्रल, 325 राज्य, 128 डीम्ड और 195 प्राइवेट यूनिवर्सिटीज हैं. भारतीय सरकार ने 2014-2015 बजट में सर्व शिक्षा अभियान के लिए लगभग 28,635 करोड़ रुपये का प्रावधान रखा था. 100 करोड़ वर्चुअल कक्षाओं के लिए 500 नए आईआईएम खोलने के लिए और इस साल के बजट में भी स्कूल शिक्षा के लिए 42,219.50 करोड़ रूपए दिए हैं और उच्च शिक्षा के लिए 26855 करोड़.लेकिन गुणवत्ता को महज आंकड़ों में नहीं मापा जा सकता है |गुणवत्ता बहुआयामी होती है न की एक आयामी जैसा की भारत में शिक्षा के संदर्भ में लगता है .
ये आंकड़े शिक्षा के लिए दी जा रही सुविधाओं की एक अच्छी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं लेकिन इस तस्वीर का दूसरा रुख़ कुछ यूँ है कि टाइम्स द्वारा उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कराये गए एक सर्वे में हमारे यहाँ के संस्थान विश्व के 200 शिक्षण संस्थानों में भी जगह बनाने में असफ़ल रहे. इकनोमिक टाइम्स के अनुसार भारत में हर साल लगभग 1.5 मिलियन इंजीनियर ग्रेजुएट हर साल पास होते हैं. चौकाने वाली बात ये है कि यूएसए और चीन दोनों की संख्या मिलाकर भी ये आंकड़ा ज्यादा है. तकरीबन एक लाख एमबीए डिग्री हर साल दी जाती है. तकरीबन एक हज़ार के आसपास पीएचडी अवार्ड की जाती है. इसी अख़बार के अनुसार हर साल पास होने वाले इंजीनियर में से 20 से 33 प्रतिशत बेरोज़गार हैं. आंकड़े बड़ी ख़ूबसूरती से हमे आइना दिखा रहे हैं. दोनों पहलुओं का दुनियां के परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करने निष्कर्ष ये निकालता है कि  भारत में केवल हस्ताक्षर कर सकना साक्षर होने की निशानी है और एक नौकरी पा जाना उच्च शिक्षित होने की. उच्च शिक्षा में कहने के लिए हमारे यहाँ उच्च शिक्षा के बड़े-बड़े सरकारी संस्थान हैं जहाँ एडमिशन के लिए छात्रों के माता-पिता फीस के अलावा कोचिंग और डोनेशन मिलाकर लाखों खर्च कर देते हैं. साथ ही साथ कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे प्रबंधन संस्थान हर साल लाखों डिग्रियां बाँटते हैं यानी हर साल लाखों में एमबीए इन संस्थानों से निकलते हैं लेकिन पढाई में गुणवत्ता की डिग्री देने वाला एक भी संस्थान नहीं है. हमारे यहाँ शिक्षण संस्थानों की नीव में केवल सीमेंट बालू और ईंटें हैं, शिक्षा को बेहतर करने का सपना नहीं. यही वजह है कि संख्या में  हम आगे है चाहे वो हर साल पास होने वाले छात्र हों या फिर सरकारी मदद लेकिन शिक्षा में गुणवत्ता के स्तर में हम अभी भी कतार में पीछे हैं. ज़रा सोचिये कि हमारे देश में अध्यापक भी पढने और पढ़ाने के लिए विदेशी लेखकों की किताबों का अध्ययन करते हैं और अपने छात्रों को इन्ही पुस्तकों को पढने की सलाह देते हैं ख़ासकर कि उच्च शिक्षा में. कारण साफ़ है कि दुनिया लोहा माने ऐसी किताबें लिखने के लिए भी सीखने की ललक, जूनून और धैर्य की आवश्यकता होती है और चूँकि हमारे देश में व्यक्ति का आंकलन उसके पैकेज से किया जाता है न कि उसके ज्ञान से और इसी पैकेज को पाने के लिए नंबरों की अंधाधुंध दौड़ में बस छात्र दौड़ेते चले जाते हैं बिना ये जाने कि ये रास्ता सिर्फ उन्हें एक सामान्य व्यक्ति ही बनाने की और ही ले जा पाता है. आविष्कारों के नाम पर हम केवल “जीरो” पर अटके हैं. दुनिया में जब सफल भारतीयों की जब बात की जाती है तो हमारे पास केवल उन एनआरआई भारतीयों का हवाला देने के अलावा कुछ और नहीं होता है जिन्होंने सफलता के झंडे गाड़े. याद रहे कि इनकी केवल पैदाइश या माता या पिता भारतीय मूल के होते हैं लेकिन उनकी शिक्षा विदेशी मानकों के अनुरूप ही हुई होती है और वे दुनिया को और खुद को उसी चश्मे से देखते हैं. हमारा जोर उनका नाम इस्तेमाल करने पर तो होता है लेकिन खुद के मानकों को सुधारने पर नहीं. इसका प्रमाण ये है कि आज भी अगर यहाँ के छात्रों को मौका दिया जाये तो वे यहाँ पढने की बजाय विदेश में पढना पसंद करेंगे और फोर्ब्स के अनुसार लगभग 4.6 लाख छात्र हर साल पढने के लिए विदेश जाते हैं. अगर हमारे देश में शिक्षा का यही हाल रहा तो भविष्य में यहाँ के छात्रों की गिनती उन जमूडों में होगी जिनका दिमाग कुंद है और जो बस डंडे से हांके जा रहे हैं एक अदद नौकरी पाने के लिए. उसके बाद शायद सभ्यता और संस्कृति भी भारत की लुटती इज्ज़त न बचा पाए. 

Mar 4, 2015

प्यार तो बस प्यार ही रहता है..


जैसे जैसे फागुन की गुलाबी बयार अंगड़ाई लेने लगती है वैसे वैसे मेरा मन अपने प्यार से लिपटने को मचल उठता है. यूँ तो साल भर मैं सिर्फ सबके ज़ेहन में होती हूँ लेकिन मेरे प्रीतम के आते ही मेरा रूप रंग संवारकर मेरा नया जन्म होता है. मेरा होना सिर्फ तुमसे ही है. मुझे मेरे हमेशा हमेशा के प्यार होली से मिलने का सोच कर गुदगुदी होती है और मैं भी तड़प उठती हूँ होली से मिलने के लिए. प्रिय होली, तुम्हारे जाने के बाद जब डब्बों में टूटे टुकड़ों में रह जाती हूँ तब कितना कुछ सोचती हूँ. तुम साल में सिर्फ एक बार आते हो और किस्मत देखो मेरी याद भी लोगों को तभी आती है. अच्छा है ..वैसे भी प्रेम के इस त्यौहार में हमे अपने प्यार को महसूस करने का मौका जो मिल जाता है. आते तो तुम प्यार लेकर हो लेकिन साल भर की तन्हाई और इंतज़ार देकर चले जाते हो. लेकिन मैं तुमसे तब भी नाराज़ नहीं होती क्यूंकि जब तुम्हारे बारे में सोचती हूँ तो एक नयी ऊर्जा के अनुभव के साथ मेरा जी करता है कि हर बरस तुमसे यूँ मिलने के लिए तड़प बनी रहे. इसमें जो मज़ा है वो शायद साथ रहने में न हो. अरे हाँ सुनो.. इस बार मेरा तोहफा लाना मत भूलना. तुम्हें याद है न पिछली बार तुम भूल गए थे. तोहफ़े में जो ढेर कहानियां तुम मेरे लिए लाते हो , उन अनमोल कहानियों को समेत कर में हर रोज़ तुममे ही जीती हूँ. याद है जब हम उस सुहानी शाम को नदी के किनारे तेज़ हवाओं में हम साथ थे.. मैं तो टुकड़ों में बिखर ही जाती अगर तुमने अपने गीले रंगों से मुझे भिगोया न होता. तब एक कहानी तुमने खुद मुझे सुनाई थी.. तुमने मुझे बताया था कि तुम्हारे आने पर एक लड़ने ने राह चलते दूसरे लड़के को रंग में सराबोर किया था.. कितना खिलखिला कर हँसा था वो पर उसे क्या पता था कि उसकी वो  खिलखिलाहट उसके और उसके परिवार के लिए हमेशा का दर्द बन जाएगी. वो दूसरा लड़का सिर्फ अपना मजाक बनने की वजह से कितना आहत हुआ था काश वो पहला लड़का समझ सकता. अपने साथ लाठी लिए आये कुछ लोगों के साथ उसने अपने ऊपर रंग गिराने की सज़ा हमेशा के लिए उसका पैर तोड़कर दी. मेरे रोंयें रोंयें काँप गए थे ये सुनकर और याद है वो वाली कहानी जिसमे सिर्फ रंग डालने की वजह से पूरा शहर दंगों से कराह उठा था. मुझे तो बस इतना समझ आया था कि इंसान ने इंसान पर रंग डाला था लेकिन तुमने ही मुझे बताया था कि किसी हिन्दू ने किसी मुसलमान पर रंग डाला था. इस बात पर में तुमसे नाराज़ भी हुई थी क्यूंकि तुमने मुझे कभी नहीं बताया कि ये हिन्दू या मुसलमान क्या होता है. तुम हमेशा कहते रहे कि अपने को हिन्दू समझो पर कैसे, मैंने तो खुद को ख़ुशी ओर मिठास का प्रतीक समझा था.  मैं तो बस यही समझती हूँ कि मेरा आना लोगों को ख़ुशी देता है. पर एक बात बताओ क्या इस प्रेम के त्यौहार को भी लोग अपने ग़ुस्से से छोटा समझते हैं. क्या लोग प्रेम को भी छोटे-बड़े, मज़हबी और गैर मज़हबी, ऊँचे-नीच, अमीर-गरीब जैसे तराजुओं में तोलते हैं. तुमसे तो मुझे बस यूँ ही प्यार हो गया था न और प्यार तो किसी रूप में हो, बस प्यार ही रहता है. वहां इन सब का क्या काम. खैर छोडो मैं भी क्या लेकर बैठ गयी. सही कहते हो तुम, “जब भी तुम बोलना शुरू करती हो तुम्हारा मुंह बंद ही नहीं होता. टेपरिकॉर्डर की तरह बस बजती चली जाती हो.” पर तुम्हारे इस तरह मुझे छेड़ने में जो प्यार होता है न बस में उसी को तुम्हारे चेहरे पर देखकर मुझे ऐसा लगता है जैसे दुनिया भर के सारे सुख मेरी झोली में आ गिरे हों जैसे. सुनो इस बार वो वाली कहानी सुनाना न जब मेरे जैसी एक प्रेम दीवानी को उसके प्यार से मिलाया था तुमने. तुम्हारे रंगों ने न जाने क्या असर किया उस दीवानी पर , बस वो उसकी होकर रह गयी. शायद रंगों में छुपी उसके प्यार की छुअन का था वो असर. वो कैसे शरमाई होगी न. खुद से ही लजाई होगी. उसे देखकर तुम्हें मेरी याद आई होगी ना. आई ही होगी. कहो न कहो पर साल भर तुम भी मुझसे मिलने के लिए ऐसे ही मचलते हो न. अच्छा सुनो इस बार पड़ोस वाली रेहाना आंटी भी आयीं थी मुझे सँवारने के लिए. पदमा आंटी ने उनकी ऐसी आवभगत की कि पूछो मत. वो कह रहीं थीं कि अब वक़्त बदल रहा है. अब सब एक जैसा सोचने लगे हैं. कोई अब भेदभाव नहीं करता. ये तो कुछ ऊंची कुर्सी वालों की देन है. तुम्हारे आने पर जब कोई ऐसी ख़ुशियाँ मनाता है तो मेरा मन करता है उसके मुंह में घुलकर उसकी स्वादेन्द्रियों को ऐसे मीठे स्वाद का अनुभव कराऊँ कि वो मिठास साल भर के लिए बनी रहे. पता है इस बार मैंने यही सोचा है हमारे लिए. तुम प्यार की गुलाबी फुहारें बरसाना और मैं अपनी मिठास से इस प्यार को दुगना कर दूंगी. तुम्हारे आने पर सब और सिर्फ प्रेम ही प्रेम हो. न ही कोई झगडे न ही कोई बुरा माने. और ये मैं करूँ भी क्यूँ न तुमसे प्यार जो है मुझे. तुम्हें जाने देने का दिल नहीं करता लेकिन तुम जाओगे वापस आने के लिए, अपने साथ प्रेम की ढेरों कहानियां लिए और हर साल की तरह तुम्हारी गुझिया तुम्हें हर घर की रसोई में तुम्हारा इंतज़ार करते हुए ही मिलेगी.