Aug 17, 2014

Yes.. you are my love

I read somewhere... इश्क़ धीरे धीरे परवान चढ़ता है.
So I was not in a hurry. When he entered into my life, he was just a partner for me, nothing more than that, our relationship started as most relations do 'I didn't like him'. In the very first month of our relationship we fought number of times, sometimes even twice or thrice a day. Gradually I started hating him. I thought it would be better to give time to each other. I said let’s take a break of a week or two. He didn't answer. And then we didn't see each other for a week. At times I did miss him but I pretended as if I didn’t care. When we met again, he again helped me, he tried his best to impress me, but I don’t know for what reason, but I didn't really want to give a fresh start to us again.
One day I had to search data and prepare a report and submit it on paper. I had little 
time, of about 15 minutes. I was not at all prepared for it and I didn't have access to a computer, I didn't want to give any excuse for not being able to complete my work yet I had no other choice than to think of one. It was then at that moment that I found “My day of Love.”  
I realized that I can use internet to search data and can prepare a report on it only.  It had a function that I can transfer data from it to a pen drive. Yessssssss ….  A pen drive can be attached to it like it can be connected to a desktop or a laptop. I transferred the data and got it printed which resulted in a win-win situation. And that was the first time I kissed it. 

My new found love was none other than my cell phone. Without any showoff it just makes my work eeeeeaaasyyy… as it has a biggggggggg screen, it is there when I need it the most and it also keeps me entertained as a small TV. For me it is just awesome.
And now .. we are living happily with each other.


Aug 16, 2014

शुक्रिया..

कभी किसी ने मुझे सिखाया कि कभी खुद से जवाब मत दो चाहे कोई कितना भी बुरा करे तुम्हारे साथ. भगवान् सब देखते हैं. जिसने तुम्हारे साथ बुरा किया ,उसके साथ ठीक वैसा ही होगा जैसे उसने तुम्हारे साथ किया.
मुझे ये नहीं पता कि किसके साथ क्या हुआ और न ही मैं जानना चाहती हूँ लेकिन हाँ मेरे साथ बहुत कुछ अच्छा हुआ. वो सभी लोग जो मेरी जिंदगी को गर्त मैं धकेलने के लिए तैयार थे मुझसे अलग हो गए. उस वक़्त कुछ अच्छे लोगों को मैंने अपने साथ खड़ा पाया. भगवान का शुक्र है कि वो लोग आज भी वैसे ही मेरे साथ है. मेरा परिवार मेरी हिम्मत है और मेरी हिम्मत हमेशा मुझे मेरे बुरे वक़्त में खुद को सम्हालने और फिर से खड़ा होने कि ताकत देती है और कुछ लोग ऐसे मिले कि उनसे जिंदगी भर का रिश्ता बन गया.

आज मैं अपने इस छोटे से दायरे में बहुत खुश हूँ. इन सभी बेनाम लोगों का मेरे जीवन में आने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया. 

Aug 15, 2014

इंतज़ार है मुझे.. मेरी आज़ादी का

एक दिन यूँ ही राह से गुज़रते हुए मैंने एक चाय की दुकान पर एक बहुत सुन्दर पिंजरा देखा.. और उस पिंजरे में उससे भी सुन्दर पंछी .. बहुत सारे.. वो दूसरे पंछियों से बहुत अलग थे.. हल्के पीले, हरे, लाल रंग के पंछी , रंगबिरंगे पंख , प्यारी सी चोंच, फुदकते हुए और भी प्यारे लग रहे थे..
रास्ते भर मैंने सोचा कि इतने प्यारे पंछियों को आसमान में उड़ते हुए देखा कितना अच्छा लगेगा.. मैंने सोच लिया था कि काम ख़त्म होने पर वापस जाकर उन पंछियों को उड़ाना ही है अब.. मैं बहुत ज्यादा देर उन्हें आसमान में उड़ते देखने से खुद को रोक नहीं पा रही थी.. मैंने अपने साथ काम करने वाली एक लड़की से कहा कि मुझे उन पंछियों को उड़ाना है.. मैं बहुत देर इंतज़ार नहीं कर पाऊँगी.. उस ने कुछ कहा नहीं बस हंसकर रह गयी.. उस दिन ज़रूरी काम आ जाने की  वजह से मैं भी वापस नहीं जा पायी.
2-3 दिन गुज़र गए. फिर से हम साथ बैठे हुए थे. उसने कहा पता है रेखा तुम्हारी एक बात उस दिन मुझे बहुत अच्छी लगी थी कि तुम्हें उन पंछियों को उड़ाना है. खुले आसमान मैं आज़ाद पंछियों को उड़ते देखकर कितना अच्छा लगता है न.. उन्हें मैंने उसकी तरफ देखा.. आँखों मैं कई सवाल लेकर.. उसने मेरे पूछने का इंतज़ार नहीं किया.. मैं तुम्हारी तरह जिंदगी जीना चाहती हूँ. एक वक़्त था जब मुझे भी आसमान की बुलंदियों पर जाना था.. लेकिन माँ के इस दुनियां से जाने के बाद पिताजी ने समाज और रिश्तेदारों की बात मानकर मेरी शादी कर दी. मैंने सोचा कि मैं अपने ससुराल वालों शादी के बाद काम करने के लिए धीरे धीरे मना लूंगी .. मैंने शादी कर ली.. माँ की याद आती थी तो सासू माँ मैं माँ को ढूँढना शुरू कर दिया. पर मेरी जिंदगी उतनी आसान नहीं रही जितना मैंने सोचा था. काम करने के लिए घर वाले मान तो गए लेकिन मेरे ऊपर जिम्मेदारियों का इतना बोझ लाद दिया है कि मैं अब सिर्फ छटपटा कर रह जाती हूँ. एक शहर मैं रहकर भी अपने बूढ़े और अकेले पिता के पास जाने के लिए मुझे 10 बार पूछना पड़ता है और अगर चली जाऊँ तो समय की पाबन्दी होती है . अगर कुछ कहती हूँ तो सिर्फ एक जवाब किसने कहा है काम करने को. मुझे 3 साल हो गए पर आजतक मैं उन्हें ये नहीं समझा पाई कि मैं सिर्फ इसलिए काम करती हूँ क्यूंकि काम करना मुझे अच्छा लगता है. जितना तुम्हें बताया हालात उससे भी ज्यादा ख़राब हैं. मुझे घूमने की आज़ादी नहीं चाहिए लेकिन हाँ आज भी मुझे अपने सपनों को पूरा करने की आज़ादी का इंतज़ार है. 
खैर मैं अपना सपना तो पूरा नहीं कर पायी लेकिन हाँ मैंने समझौता कर लिया है. अपने इस काम मैं ही ख़ुशी ढूढ़ ली है. बच्चों को पढ़ाती हूँ और उन्हें सिर्फ यही समझाती हूँ कि यही एक जिंदगी है, इस जिंदगी का एक लक्ष्य बनाना और अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए जी जान से जुट जाना. बाद मैं ये आज़ादी मिले न मिले.
मैं बिना देर किये सीधे दुकान के लिए निकल गयी. वहां अब कोई पिंजरा नहीं था. मुझे दुःख हुआ. मुझे देर हो गयी थी. लेकिन पूछने पर पता चला एक लड़की आई थी और खरीद के ले गयी.

होठों पर बस एक हल्की मुस्कराहट आ गयी. 

Aug 6, 2014

आज एक लड़की से मिली.. बेहद खूबसूरत..

आज एक लड़की से मिली.. बेहद खूबसूरत..
हुआ यूँ कि मेरी एक दोस्त ने नया घर खरीदा.. उसके घर के लिए ज़रुरत का सामान लेने हम एक दुकान पर गए.. वहां पर मैं उससे मिली ..
शादी नहीं हुई थी अब तक उसकी.. और उसमे खास दिखने वाली कोई बात भी नहीं थी...
उसने बहुत ही पुराने स्टाइल का सूट पहन रखा था.. वो भी आउटडेटेड.. फैशन की कोई समझ नहीं थी.. लेकिन हाँ.. दुकान के हर सामान और उसकी कीमत की पूरी जानकारी थी..
शायद ही वो कभी पार्लर जाती होगी .. मैंने देखा कि उसके हाथों पर जलने के निशान थे.. जगह जगह बड़े काले धब्बे थे.. बेहद पतली दुबली.. ज्यादा पढ़ी भी नहीं थी.. पढ़ नहीं पाई होगी शायद.
लेकिन वो बहुत खूबसूरत थी... उसने २ छोटे छोटे क्लिप्स लगा रखे थे जो उसे और खूबसूरत बना रहे थे.. और एक चीज़ जो सबसे सुन्दर थी.. वो थी उसकी मुस्कराहट.. एक हल्की मुस्कराहट के साथ हर सामान को बेहद करीने से निकलना.. दिखाना और मुस्कुराकर पूछना इसमें और रंग दिखा दूँ आपको?
ऐसा बिलकुल भी नहीं था कि सिर्फ दुकान पर होने कि वजह से उसे जबरन मुस्कुराना पड़ रहा हो.. वो मुस्कराहट जैसे उस चेहरे के लिए ही थी.. न शिकन , न थकान सिर्फ दुकान का काम. हर बात को धीमी , सधी हुई और मिठास भरी आवाज़ के साथ बोलना और कुछ भी मांगने पर उसी मुस्कराहट के साथ तुरंत सामान ले आना..
जब तक मेरी दोस्त ने सामान लिया.. मैंने उसे देखा... शायद हालातों का शिकार वो भी हुई होगी लेकिन उसके बावजूद कैसे एक मुस्कराहट में सब छिपा लिया होगा .. अपने अरमान, सपने सब कुछ..

मुझे नहीं पता कि अच्छा दिखने या ख़ूबसूरती को मापने के मायने क्या होते हैं लेकिन मेरे लिए वो आज के दिन में मिली सबसे खूबसूरत लड़की थी.. 

Jun 14, 2014

एक दोस्त है मेरी. हर वक़्त चुप रहती है. ज्यादा किसी से बात नहीं करती. हँसी से कोसो दूर उसकी अपनी दुनियां है जिसमे केवल एक गहरी चुप्पी है. कई बार जानने कि कोशिश पर जवाब नहीं मिला. बहुत कुरेदने पर जब चुप्पी की वजह पता चली तो शर्मिंदगी और ग़ुस्से से भर गयी. शर्मिंदगी इसलिए कि हम आज भी ऐसे घिनोने समाज का हिस्सा हैं और ग़ुस्सा अपनी दोस्त पर कि आज तक वो इतना सब बर्दाश्त क्यों कर रही है. वजह कुछ यूँ थी.. मेरी मित्र २५ लोगों के एक परिवार मैं रहती है. उसका सगा चाचा बचपन से लेकर आज तक उसका शोषण करता आ रहा है. बचपन मैं कुछ ज्यादा हद तक, बड़े होने पर चूँकि उसके लिए समस्या हो सकती है इसलिए सिर्फ घूरने और छेडछाड तक सीमित है. और दोस्त इसलिए चुप है क्यूंकि उसकी बहिन बहुत छोटी है और वो उसे हर कीमत पर बचाना चाहती है. उसे डर है बता देने पर या तो परिवार वाले चुप रहने को कहेंगे या कहीं बाहर भेज देंगे. वो इंसान तो आपकी हरकतों से बाज आने से रहा तो कहीं उसकी बहिन भी इस नीचता का शिकार न हो जाए.
भारत देश में अभी भी बाल यौन शोषण या चाइल्ड एब्यूज ऐसी समस्या है जिसके बारे में लोग बात नहीं करते या करना नहीं चाहते . और ये समस्या हर वर्ग के घरो में है. देश ही नहीं विदेशों में बड़े से बड़े लोगों के नाम समय समय पर अखबारों में सामने आये हैं.
देश के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा एक रिपोर्ट प्रस्तुत की गयी थी जिसके अनुसार भारत में करीब 53.22 प्रतिशत बच्चे एक या एक से ज्यादा बार इसका शिकार हुए है. 21.90 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण और 50.76 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण के अन्य प्रकारों के शिकार हुए. शर्मिंदा कर देने वाला सच ये भी है कि 50 प्रतिशत बच्चे अपनों के ही शिकार हुए. ज़्यादातर मामलों में पिता या सगे चाचा ताऊ या मामा ही दोषी थे. रिपोर्ट के ही मुताबिक अधिकतर बच्चों ने कभी अपना मुह नहीं खोला जैसा कि मेरी दोस्त ने भी किया. और ऐसा नहीं है कि सिर्फ लड़कियां इस समस्या की शिकार हैं , लड़के भी उतने ही पीड़ित हैं.
अब इसके ज़िम्मेदार कौन? सरकार, मंत्री, न्यायपालिका, पुलिस, समाज ? नहीं. ज़िम्मेदार हम. हम सब. सबसे पहले वो लोग जो अपनी घटिया मानसिकता और मानसिक बीमारी का शिकार इन बच्चों को बनाते हैं. दूसरे वो लोग जो अपने बच्चों पर भरोसा न करके उन्हें या तो डांट देते हैं या चुप रहने को कहते हैं. तीसरे वो लोग जो इसके खिलाफ सिर्फ इसलिए आवाज़ नहीं उठाते क्यूंकि समाज क्या कहेगा या फलां व्यक्ति उनका रिश्तेदार है या अपना है. समय समय पर टीवी और फिल्मों के ज़रिये इस समस्या के बारे में कहा गया, दिखाया गया पर समस्या आज भी जस की तस है. कम से कम अपनी दोस्त के बारे में जाने के बाद मैं ये कह सकती हूँ. हम दोहरे व्यक्तित्व वाले समाज में जीते हैं जहाँ एक तरह बच्चे को हर धर्म में भगवान का रूप बताया जाता है और उसी धर्म के अनुयायी अपने खुद के बच्चों को भी नहीं बक्शते.
पिछले कुछ दिनों से भारत के बच्चे बच्चे की जुबां पर है कि अच्छे दिन आने वाले हैं. भारत का हर एक नागरिक अपने अच्छे दिनों के ख्वाब देख रहा है. अब इनके भी अच्छे दिनों की बारी आनी चाहिए जिससे किसी भी बच्चे का कोई बीता कल उसे न ही डराए न ही चुप रहने पर मजबूर करे.जो लोग दोषी हैं उनकी सजा भी आपको तय करनी होगी. जो आपके साथ हुआ, या आपके बच्चों के साथ हो रहा है वो आगे किसी के साथ न हो या आपके बच्चा इस सदमे से उबार जाए इसकी भी कोशिश आपको ही करनी होगी. ज़्यादातर घरों में बच्चे से खुलकर बात नहीं की जाती न ही उसकी बातों को ज्यादा महत्व दिया जाता है इसलिए बच्चा बेख़ौफ़ आपको अपने साथ हुई ज्यादती के बारे में बता सके, ऐसा माहौल भी आपको ही बनाना होगा जिससे किसी भी मासूम को खुद से आँखें चुराकर न जीना पड़े. खुलकर बोलने से ही बात बन पाएगी. आप भी बोलिए और अपने बच्चों को भी बोलने का मौका दीजिये. अपनी उस जैसी हर दोस्त से भी मैं कहूँगी वक़्त आने का इंतजार मत कीजिये. यही समय सही है. किसी और का घोला हुआ ज़हर क्यों पीना. बात करिए. चुप रहने से कुछ नहीं होगा. बात करना तो बनता है अब. जिंदगी आपकी तो बेख़ौफ़ जीने का हक भी सिर्फ आपका है.    


May 16, 2014



मोदी जी..
आपको बधाई कि अब आप भारत देश के प्रधानमंत्री कहलाये जायेंगे. आपके कारन ही भाजपा को इतनी बड़ी जीत मिल पायी है. आप अब अपने किये हुए वादों को पूरा करने की ओर बढ़ेंगे जैसा कि सब आपसे उम्मीद कर रहे हैं.  कुछ उम्मीदें भारत कि एक आम लड़की भी रखती है आपसे. मैं जानती हूँ कि आप पर उमीदों का बोझ पहले से ही बहुत है पर आपने अच्छे दिनों के आने का ख्वाब दिखाया है तो मैं भी अपने अच्छे दिनों के आने का इंतजार करुँगी. रोज़ रोज़ अखबारों में बलात्कार, लूट और छेड़खानी की खबरें पढ़कर मैं आहत हो चुकी हूँ इसलिए अपनी उम्मीदों का बोझ भी आपके सर डाल रही हूँ.  आपसे कुछ ऐसी उम्मीदें हैं कि :

मुझे एक ऐसा देश चाहिए जहाँ मुझे अपने हक के लिए रिजर्वेशन की ज़रुरत न पड़े. संविधान में मिले बराबरी के अधिकार को मैं खुलकर जी पाऊं. अपने हक के लिए लड़ने पर मुझे दोयम दर्ज़े का कहकर संबोधित न किया जाए.

मैं जब चाहूँ, घर से बाहर ये सोच कर निकल पाऊं कि हाँ मैं सही सलामत, बिना किसी परेशानी के वापस आ जाउंगी और अगर किसी परेशानी मैं फंस भी जाऊ तो पुलिस के पास जाने में मुझे हिचकिचाहट न हो.

एक ऐसा समाज चाहिए जहाँ मुझे गर्व महसूस हो कि मैं लड़की हूँ. हर बार मुझे ये विचार न कचोटे कि काश में एक लड़का होती. मेरे माता पिता को मेरी शादी के लिए अपना बैंक अकाउंट खाली न करना पड़े और इतना खर्च करने के बाद फिर भी दहेज़ की बलि मुझे न चढ़ाया जाए.

मेरी ज़रुरत सिर्फ नवरात्रों तक ही न हो और मेरे हुनर का दायरा सिर्फ रसोईघर और घर गृहस्थी तक ही सीमित न माना जाए. देश और दुनिया से जुड़े मुद्दों पर मेरी राय को सिर्फ इसलिए न नकारा जाए क्यूंकि मैं एक लड़की हूँ और लड़कियां तो बोलती ही रहती हैं.

अपनी पसंद का करियर चुनने में मुझे अपने लड़की होने को ध्यान में न रखना पड़े. रोज़गार के अवसरों में मेरे लड़की होने को नहीं वरन काबिल होने को ध्यान में रखा जाए.

ट्रेन या बस में शहर से बाहर जाते वक़्त मेरे माता पिता को कभी ये फिकर न करनी पड़े कि मेरी बेटी सही वक़्त और सही तरीके से पहुंची होगी कि नहीं.

आशा करती हूँ कि आप इस आम भारतीय लड़की की इन उम्मीदों को पूरा करने के लिए ईमानदारी से प्रयास करेंगे और मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि अपने आपको साबित करने में कोई कसर नहीं छोडूंगी.


Apr 1, 2014

बेख़बर आज़ाद जीना है मुझे...



































फिल्मों में ये देखकर कि किस तरह हीरो बना  एक आम आदमी इतने सारे बुरे लोगो पर भारी पड़ता है. बहुत अच्छा लगता है जब वो भ्रष्ट राजनेताओं के खिलाफ लड़ता है. अपने परिवार की रक्षा करता है जाहिर है किसी भी आम आदमी को ये देखकर अच्छा ही लगेगा कि कोई तो है जो अच्छा सोचता है और करता है. फिल्म में ही सही.नहीं नहीं मैं फिल्म समीक्षक नहीं हूँ. मैं बस आप सभी से अपने कुछ ओब्ज़र्वेशन शेयर करना चाहती हूँ. जो काम अक्सर  फिल्म मैं एक एक हीरो करता है  अगर वही काम एक एक आम लड़की करना चाहे, मसलन लॉन्ग ड्राइव पर जाना दोस्तों के साथ देर रात यूँ ही मटरगश्ती करना,अपने फैसले खुद लेना और जिन्दगी अपनी शर्तों पर जीना.न नहीं कर सकती.
कहा जाता है कि फिल्मे समाज का आइना होती है. बहुत याद करने पर याद आता है कि उँगलियों पर गिनी जानी वाली कुछ फ़िल्में ही ऐसी बनी हैं जिसमे किसी महिला चरित्र को पुरुषों से लड़ते दिखाया गया हो. अब बलात्कार को ही लें किस तरह फ़िल्में जेंडर स्टीरियो टाइपिंग को बढ़ावा देती हैं और हम उसे समाज का सच मान लेते हैं.किसी भी समाज में बलात्कार की जगह नहीं होनी चाहिए और दुर्भाग्य से ऐसा होता भी है तो दोषी स्त्री मानी जाती है और वास्तविक दोषी अपनी मर्दानगी का डंका पीटते हैं. महिला चरित्र खुदखुशी कर लेती है या फिर समाज के तानो का शिकार तब तक होती है जब तक कोई सहृदय पुरुष उसकी ज़िम्मेदारी नहीं उठा लेता या उससे शादी नहीं कर लेता.
अब सवाल ये है कि हम अभी भी ऐसे ही समाज का हिस्सा ही  क्यों हैंक्यों अभी भी महिलाओं के ख़ुशी से जीने के अधिकार एक पुरुष के हाथ में हैं.बात केवल इतनी सी है कि महिलाओं के लिए प्रथाओ और परम्पराओं को बनाने वाले पुरुष ही हैंमहिलाओं के लिए सभी तरह के कानून बनाने वाले पुरुष हैं. परिवार में उनकी जगह का निर्णय लेने वाले भी पुरुष हैं. महिलाओ के अधिकारों की आवाज़ सुनने वाले भी पुरुष हैं.गवर्नेंस में महिलाओं की भागीदारी समाज में महिलाओं की संख्या के मुकाबले नगण्य है जो हैं भी उनके बारे में आमतौर पर माना जाता है कि वो किसी पुरुष की कृपा पर ही राजनीति में आयी हैं . यानि एक आम महिला को अपने आप को साबित करने के लिए पुरुषों के मुकाबले बार बार अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है .संसद में महिलाओं के लिए ३३ प्रतिशत आरक्षण की मांग भी चौदहवीं लोकसभा में अनसुनी रह गयी  जब समाज में महिलाओं के लिए निर्णय लेने का अधिकार पुरुषों के पास होगा तो किस प्रकार के बदलाव  की उम्मीद करें.अभी महिला दिवस पर एक दिन के लिए महिलाओं को सम्मान दिया गया. पर क्या वाकई महिलाऐं केवल सिर्फ इस एक दिन के सम्मान कि हकदार हैं?हर दिन महिलाओं से हर बात पर अग्नि परीक्षा की उम्मीद की जाती है. रामायण काल से चला आ रही है ये परंपरा. अकेले चलना चाहा तो अग्निपरीक्षालीजिये हमने एवरेस्ट फ़तेह करके दिखा दिया. पढ़ना चाहा तो अग्निपरीक्षा,लीजिये हमने हर बार बोर्ड के पेपरों में लड़कों से अव्वल आकर दिखा दिया. उड़ना चाहा तो भी अग्निपरीक्षातो लीजिये हमने अंतरिक्ष तक पहुँच कर दिखा दिया. आत्मनिर्भर होना चाहा तो अग्निपरीक्षालीजिये हमने सभी शीर्ष कंपनियों का सरताज बनकर दिखा दिया. एक छोटी सी बात समझने में इस समाज को कितने वर्ष और लगेंगे कि अब वो दौर गया जब भगवान्समाजपरिवारदुनियां और इज्ज़त का डर दिखाकर लड़कियों को उनकी मंजिलों तक नहीं  पहुँचने दिया जाता था . बदलाव हो भी रहा है और आगे भी होगा.
चुनावों की गूँज अब हमारे गलियारों में दस्तक दे रही है. इस बार हम अपना सशक्तिकरण खुद करने की ठान लें. ज्यादा से ज्यादा महिलाएं वोट दें और अपने लिए बेहतर कल का चुनाव करें.
बेख़बर आज़ाद जीना है मुझे,  बेख़बर आज़ाद रहना है मुझे.